Srishti Khanda Extracted Page 879

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-879

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Sanskrit Original

द्व श्रीपदामहापुराण सर्वसाक्षी भवेत्स्वर्गे वरदो भास्करप्रिय:। शृणोति संयतो मर्त्यः सोऽ भीष्टं फलमाप्नुयात् ॥३५॥ पारगः सर्वपापानां भास्करस्यैव संसदि । वावदूको भवेन्नित्यं श्रवणात्पुण्यवान् धनी ॥३६॥ इदं गुह्यतिगुह्यं च भास्करेण प्रचारितम् । इदं यमाय कथितं क्षितौ व्यासेन कीर्तितम् ॥३७॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे भद्रेश्वराख्यान नामैकोनाशीतितमोऽध्यायः ॥७९॥ te असीवाँ अध्याय वैशंपायन उवाच शरुतोग्रहेश्वरस्यैष प्रभावस्त्वत्प्रसादतः । रव्यादीनां ग्रहाणां च साधनं नो वद द्विज ॥९॥ के ते रव्यादयस्तेषां कथं तोषः कथं प्रियम्। काले देशे तु संप्राप्ते दर्शनं तच्छिवाशिवम्॥२॥ व्यास उवाच ग्रहादयो ये लोके तु भुंजंति पुण्यपातकम्। शिवाशिवं च कुर्वति विश्वकर्मक्षयाय वै ॥३॥ सूरः कालोंतको ज्ञेयो जनेषु च ग्रहेषु च। तिग्मसौम्याच्च योगात्स निग्रहानुग्रहे प्रभुः ॥४॥ ग्रहभावाच्च तस्यैव संतोषं निगदाम्यहम्। उदुम्बरपलाशाभ्यां पल्लवाभ्यां जुहोति यः ॥५॥ आकृष्णेनेति मंत्रेण मूलकेनाथ शांतये । जुहुयादाज्ययुक्ताभ्यामभीष्टफलहेतवे ॥६॥ होगा । जो मनुष्य सावधानी से इसका श्रवण करेगा वह अपने अभीष्ट फल को प्राप्त करेगा ॥३५॥ भगवान् सूर्य के ही लोक में वह सभी पापों को नष्ट करेगा । इसका श्रवण करने वाला वावदूक, पुण्यवान् और धनी होता है ॥३६॥ इस अत्यन्त गोपनीय तथा अत्यन्त पुण्यमय प्रसड़ का सूर्य ने अपने लोक में यमराज को उपदेश दिया और पृथिवी पर व्यासजी ने इसका प्रचार किया ॥३७॥ इस तरह श्रीपद्ममहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के भद्रेधर चरित वर्णन नामक उनासीवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।।७९।। te सूर्यपूजा विधि का वर्णन तथा चन्द्रपूजा विधि का वर्णन वैशम्पायन महर्षि ने कहा-- आपने कृपा करके मुझे ग्रहों के स्वामी श्रीसूर्य नारायण का प्रभाव सुनाया ।हे द्विज ! आप हमलोगों की सूर्य आदि ग्रहों की प्रसन्नता का साधन बतलायें ॥१॥ सूर्य आदि कौन है ? वे कैसे प्रसन्न होते हें तथा कल्याण करते हैं । किस काल तथा किस स्थान में उनक दर्शन कल्याणकारी तथा आकल्याणकारी होता है 2॥ २॥ व्यासजी ने कहा-- इसलोक में जो ग्रह आदि पुण्य तथा पाप का भोग करते हैं तथा कल्याण एवं अकल्याण वे सम्पूर्ण कर्मों का नाश करते हैं ॥३॥ ग्रहों तथा मनुष्यों में सूर कों कालान्तक जानना चाहिए । वह तिक्ष्णयोग में अकल्यणकारी तथा सौम्ययोग होने पर कल्याणकारी होते हैं ॥४॥ ग्रह रूप से उसे में सन्तोष कहता हूँ। गूलर और पलाश के दो पत्रों से अकृष्णेन रजसा इत्यादि मंत्र से या मूलमंत्र से जो घी द्वारा होम शान्ति के लिए करता है । उससे अभीष्ट फल की प्राप्ति के लिए उन दोनों पत्तों से घी से होम करना चाहिए ॥५६॥ सभी रोगों की

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