Srishti Khanda Extracted Page 868
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-868
Sanskrit Original
यज्ञसूत्रं स सिंदूरं दत्वा चार्धं सुशोभनम् । सर्वपापं क्षयं याति सप्तजन्कृतं च यत् ॥६७॥ नरकैः पीड्यते तावद्रोगैः पापैश्च दुः खदैः । हविष्यं भोजयेदन्रं शुद्धमातपतंडुलैः ॥६८॥ वर्जयेच्च शिलाघृष्टं शृंगबेरं तु शाककम्। कोरदुषकपत्रं च रंभाच्छागीघृतं तथा ॥६९॥ केशकीटादिकं वर्ज्यमुष्णोदस्तानमेव च । अल्पबीजादिकं सर्व॑ व्रते सूरस्य वर्जयेत् ॥७०॥ अन्यच्च नाचरेत्तत्र धर्मचिंतां विना ब्रती । सौरव्रतं महापुण्यं पुराणैरभिनंदितम् ॥७१॥ वर्षकोटिसहस्राणि वर्षकोटिशतानि च। आदित्यस्य समं भोग्यं लभते दिवि शावूवतम्।७ २॥ एवं स्वर्गक्षयादेव राजा भूमौ 'महाधनी । मर्त्यलोके पुराभ्यासात्करोति भास्करब्रतम् ॥७३॥ तथा स्वयं सुखं भोग्यं लभते दिवि शाश्वतम्। आरोग्यं सम्पदं जन्मी भास्करस्य प्रसादतः ॥७४॥ रविवारे भवेद्या च सप्तमी माघशुक्लके। महाजयेति विख्याता अन्यत्र विजया स्मृता ॥७५॥ विजया कोटिलक्षं स्यादनंतं स्यान्महाजया। तत्रैकेन ब्रतेनैवमुच्यते जन्मबंधनात्॥७६॥ अश्वरत्मं सुवर्णं च रक्तव्रं च धान्यकम् । ददाति भास्करप्रीत्या स्वर्गमर्त्यपतिः कमात् ॥७७॥ एषां भेदं प्रवक्ष्यमि शृणु विप्र यथार्थवत् । उत्तमाभरणै्युक्तं सद्वाहं यो ददाति ह॥७८॥ समुद्रैस्सप्तभिर्जुष्टां भूमिमेत्यरिवर्जिताम्। लभेद्धवांतरे मर्त्यमेकेनैकाधिपो भवेत् ॥७९॥ अश्वहीनं च पत्रांगं वृषभैर्वाप्यलंकृतम् । हेममाषं द्विमाषं वा दक्षिणा विहिता बुधैः ॥८ ०॥ रलभांडंमहार्थ च हैमैरेव कृतं च यत् । स्वर्णवा केवलं दत्वा त्रिविष्टपधनेश्चवरः ॥८१॥ के साथ अर्ध्य प्रदान करने से सभी पाप क्षीण हो जाते है, जो पाप सात जन्मों में किये गये होते हैं ॥६७॥ मनुष्य तद तक नरकों में रोगों तवा दुखद पापों से पीडित होता है जब तक वह सूर्य का ब्रत नहो करता है । सूर्य के ब्रत में शुद्ध अगहनो के चावल से बने हविष्य, ब्राह्मणों को भोजन कराये । सूर्य के ब्रत में शिला पर रगड़े हुए शृंगबेर तथा शाक, कोद्रव का, केले का, बकरी के घी का ॥६८-६९॥ केश, कोड़ा, आदि तथा गर्म जल से स्नान आदि खा तथा थोड़े बीज कली सभी वस्तुओं का त्याग कर देना चाहिए ॥७०॥ ब्रती को केवल धर्म का हो चिन्तन करना चाहिए किसी दूसरी वस्तु की नहीं । सूर्य का ब्रत महान् पुण्यप्रद है । पुराणों में उसका समर्थन किया गवा है ॥७१॥ सूर्यत्रत करने वाला स्वर्ग में हजारों करोड़ वर्षों तक निरन्तर भोगों को प्राप्त करता है ॥७२॥ जब उस स्वर्ग का क्षय हो जाता है तो वह पृथिवी पर जन्म लेकर राजा होता है और मर्त्यलोक में आकर पहले के ही अभ्यास के कारण वह सूर्व का ब्रत करता हे ॥७३॥ और स्वयं स्वर्ग में शाद्चत भोगों को प्राप्त करता है । सूर्य को कृपा से वह जन्म से ही आरोग्य तथा सम्पत्ति को प्राप्त करता है ॥७४॥ यदि माघ शुक्ल सप्तमी को रविवार हो तो वह सप्तमी महाविजया सप्तमी होती है अन्यथा वह विजया सप्तमी कहलाती है ॥७५॥ विजया करोड़ लाख गुना फल देने वाली होती है तथा महाविजया अनन्त फलप्रद होती है । महाजया का एक ही ब्रत करके मनुष्य जन्मो के बन्धन से मुक्त हो जाता है ॥७६॥ जो उस दिन अश्वरत्न, सुवर्ण, रक्त वस्र, और अन्न सूर्य की प्रसन्नता के लिए दान करता है वह स्वर्गलोक तथा मर्त्यलोक का स्वामी क्रमश: होता है ॥७७॥ हे विप्र ! सुनो इन सबों का भेद में ठीक-ठीक बतलाता हूँ । उस दिन जो उत्तम अलङ्करों से युक्त अच्छे वाहन का दान करता है ॥७८॥ वह सातो समुद्रों वालो तथा शत्रु से रहित पृथिवी का स्वामी होता है । उसी के द्वारा वह जन्मान्तर में पृथिवी का अकेला स्वामी होता है ॥७९॥ जो घोड़े से रहित पत्राङ्ग को अथवा वृषभों से अलङ्कृत एक मासे अथवा दो मासे को सुवर्ण दक्षिण के साथ दान करता है। अथवा अत्यन्त मूल्यवान् रत्नों का घड़ा जो सुवर्ण से ही निर्मित हो उसका दान करता है, या केवल सुवर्ण हो दान
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