Srishti Khanda Extracted Page 855

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-855

padma-puranasrishti-khandacreation-cosmologypartialpage-extract

Sanskrit Original

अन्नपानं च शयनमन्थकारेषु_ रोचते । कदाचित्स्वस्थता नास्ति क्वचिद्वाशुचिता तनौ ॥३९॥ लक्षणं नरलोकेषु प्रेतानामीदृशं किल । हिताहितं न जानंति मित्रामित्रं गुणागुणम् ॥३२॥ पापपुण्यादिकं स्थानं स्नानं देवद्विजार्चनम् । अरिमित्रमुदासीनं नविंदंति स्वभावतः ॥३३॥ मर्त्यस्थाः पशवस्ते च ज्ञायंते बुद्धिसंमतैः । बुद्ध्या नानात्व भावाश्च भ्रमंति च मृषा भुवि॥३४॥ यक्षरूपा नरास्ते च सर्वकर्मबहिष्कृताः । एषां भेदं प्रवक्ष्यामि लक्षणं धरणीतले ॥३५॥ विजाता मर्त्यलोकेषु पापस्यैवानुरूपतः । मलीमसभुविप्रस्थं नागरं छटद्मरूपिणम्॥३६॥ विघसादिप्रभोक्तारं काकमाहुर्मनीषिणः । अभक्ष्ये निरतः पापः कुकुरः पूतिसंप्रियः ॥३७॥ प्रवृत्तस्सर्वगृहोषु भक्ष्याभक्ष्यसजीवनः । भूम्यां पश्चादियोनीनां कुलेषु प्राप्तसंभवाः ॥३८॥ शुनो विगृह्य हस्तेन म्लेच्छनां भक्षणप्रियाः । विशेषात्सूकराणां च तथाचरणयोधिनाम् ॥३९॥ पोषणे भक्षणे प्रीताः पूतिगर्होष्वसाधुषु । पर्वते करणाद्दह्लेः काष्ठसंचयसंग्रहे ॥४०॥ विज्ञेयास्ते सदाम्लेच्छाः क्षत्रियाणां भयाकुलाः । लोकानां नष्टधर्मे च सदाशौच विवर्जिते ॥४१॥ कुलीनानां तदाम्लेच्छा भविष्यंति च दस्यवः । तेषां संसर्गतोन्ये च संबंधादन्नरभोजनात् ॥४२॥ मैथुनात्तस्ययोषासु तद्भावं तु व्रजंति ते । तस्मिन्काले जनास्सर्वे दुः खरोगप्रतापिताः ॥४३॥ दुर्भिक्षान्रपरा मूढाः सदा राजप्रपीडिताः। तत्रासत्ये रता मर्त्याः सर्वशौचविवर्जिताः ॥४४॥ नश्रूयंते जनैरेव पुराणागमसंहिताः । मद्यमांसप्रियाः पापास्सर्वभक्षास्सुदारुणाः ॥४५॥ वन में जाकर रहने लगते हें । वासी अन्न, जूठा अत्र तथा दुर्गन्धि युक्त अत्र को खाते हैं । वे अन्धकार में ही खाते हैं, पानी पीते हैं तथा सोते हैं उनका शरीर कभी न तो स्वस्थ रहता है और न तो पवित्र रहता है ॥३०-३१॥ ये मनुष्य लोक में रहने वाले प्रेतों के लक्षण हैं विज्ञ पुरुष उन सबों को मनुष्य रूप में रहने वाले पशु जानते हैं जिन लोगों को कल्याण, अकल्याण, मित्र, अमित्र (शत्रु) गुण-दोष पाप तथा पुण्य के स्थान, स्नान करना, देवता तथा ब्रह्मण की पूजा करना, शत्रु, मित्र तथा उदासीन इत्यादि का ज्ञान नहीं होता है । जो बुद्धि पूर्वक अनेक भावों (रूपों) को बनाते है तथा व्यर्थ ही प्राथवी पर घूमते रहते है ॥३२-३४॥ ऐसे मनुष्य यक्ष स्वरूप हे और वे सभी कर्मो से वहिस्कृत हें । इन सबों का में अलग-अलग लक्षण तथा भेद बतलाता हूँ ॥३५॥ जारजात (सङ्कर) मर्त्यलोक में अपने पूर्वकृत पापों के अनुसार मलिन पृथिवी पर छलपूर्वक नागरिक रूप बनाये हुए, अपवित्र वस्तुओं को खाने वाले कोए होते हैं, यह मनीषियों ने कहा है । अभक्ष्य पदार्थो को खाने वाले पापी, दुर्गन्धि युक्त वस्तुओं को खाने वाले कुकुर होतें है ॥३७॥ जो सभी गृह संबन्धी कार्यो में लगे रहने तथा भक्ष्य-अभक्ष्य वस्तुओं को खाकर जीने वाले पृथिवी पर पशु आदि की योनि में जन्म लेते हैं ॥३८॥ जो म्लेच्छों के कुतों को हाथ से पकड़कर भोजन करते है, विशेष रूप से सूकरों के समान आचरण करने वाले, उनका (कुत्तों तथा सूकरों का) पालन तथा भक्षण करने वाले, वासी, निन्दित तथा अपवित्र वस्तुओं को खाने वाले, पर्वत पर विद्यमान काष्ठ समूह में आग लगाने वाले ।३९-४०॥ सदा म्लेच्छ ही रहते हैं । क्षत्रियों में भयभीत रहने वाले, लोगों के धर्म के नष्ट हो जाने पर तथा सदा अपवित्र रहने पर ॥४१॥ वे म्लेच्छ कुलीनों के लिए लुटेरे हो जाते हैं । उन सबों के साथ संबन्ध होने तथा उनका अन्न खाने से॥४२॥ तथा उन सबों की स्वियों के साथ मैथुन करने से लोग भी वैसे ही हो जाते हें । उससे सभी लोग दुःख तथा रोग से सन्ताप्त हो जाते हैं ॥४३॥ वे मूर्ख दुर्भिक्ष के कारण अन्न चाहने वाले तथा सदा राजा से पीडित होते रहते हैं । उस समय मनुष्य मिथ्याभाषी तथा सभी प्रकार की पवित्रता से रहित हो जाते हैं ॥४४॥ कोई भी मनुष्य पुराणों,

No translation available yet.

Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know