Srishti Khanda Extracted Page 852
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-852
Sanskrit Original
सर्व त्वमेवासि चराचराख्यं न भाति विश्रं त्वदृते च किंचित् । अस्तीति नास्तीति च भेदनिष्ठं त्वय्येव भातं सदसत्स्वरूपम् ॥९६॥ ततो भवंतं कतमोपि देव न ज्ञातुमर्हत्यविपक्वबुद्धिः । ऋते भवत्पादपरायणं जनं तेनागतास्मश्शरणं शरण्यम् ॥९७॥ व्यास उवाच ततो विष्णु प्रसन्नात्मा उवाच त्रिदिवौकसः । तुष्टोस्मि देवा भ्रं वो युष्मत्स्तोत्रेण सांप्रतम् ॥९८॥ य इदं प्रपठेद्धक्तया विजयस्तोत्रमादरात् । न तस्य दुर्लभं देवास्त्रिषु लोकेषु किंचन ॥९९॥ गवांशतसहस्रस्य सम्यग्दत्तस्य यत्फलम् । तत्फलं समवाप्रोति कीर्तनाच्छूवणान्नरः ॥१००॥ सर्वकामप्रदं नित्यं देवदेवस्य कीर्तनम् ।अतः परं महाज्ञानं न भूतं न भविष्यति ॥१०९॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे देवासुरसंग्रामसमाप्तौ विजयस्तोत्रं नामपंचसप्ततितमोऽध्यायः ॥७५॥ re छिहत्तरवाँ अध्याय संजय उवाच येऽसुराश्च मृता युद्ध संमुखे विमुखेपि वा । गतिं तेषामहं ब्रह्मन् श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥१॥ आपसे बढ़कर कोई जीव अथवा अजीव नहीं है जो कुछ भी, भूत कालिक, भविष्यत् कालिक तथा वर्तमान कालिक है; वह आपका ही रूप है ॥९६॥ चराचरात्मक सम्पूर्ण विश्व आप ही हैं, आप से भिन्न संसार नाम की कोई भी वस्तु नहीं है । सत् एवं असत् रूप भेदों से भी आप ही सत्ता तथा असत्ता रूप से प्रतीत होते हैं ॥९६॥ अतएव हे देव! कोई भी अपरिपक्व बुद्धि वाला व्यक्ति आप को नहीं जान पाता है । आपको तो आपके चरणों का कोई सेवक ही जान पाता है अतएव हमलोग आपके शरणागत हैं ॥९८॥ व्यासजी ने कहा-- उसके बाद प्रसन्न होकर भगवान् विष्णु ने देवताओं से कहा--- हे देवताओं मैं आपलोगों के स्तोत्र से प्रसन्न हूँ आपलोगों का कल्याण हो ॥९९॥ हे देवताओं ! जो कोई भी इस विजय स्तोत्र को भक्तिपूर्वक पढेगा उसके लिए संसार में कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं होगी॥१००।। एक लाख गायों को घास खिलाने से होने वाले फल को मनुष्य इस स्तोत्र का पाठ करके अथवा श्रवण करके कर लेता है ॥१०१॥ श्रीभगवान् का कीर्तन सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाला है । इससे बढकर कोई दूसरा ज्ञान न हुआ और न होगा ॥१०२॥ इस तरह श्रीपद्ममहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के पचहत्तरवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।।७५।। —— te युद्ध में मरे हुए दैत्यों की उत्तम गति की प्राप्ति का वर्णन, मनुष्य योनि में उत्पन्न दैत्यों के स्वाभाविक दैत्यत्व का वर्णन, दैत्यवंशीय प्रह्लाद आदि को भी देवत्व की प्राप्ति का वर्णन, एक वैष्णव पुत्र की कथा, मनुष्यों में उत्पन्न देवों तथा दैत्यों का लक्षण संजय ने कहा- युद्ध में जो दानव सामने अथवा विमुख होकर मारे गये; हे ब्रह्मन् ! मैं उन सबों को जो
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