Srishti Khanda Extracted Page 836

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-836

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Sanskrit Original

बहत्तरवो अध्याय व्यास उवाच दिव्यं रथं समास्थाय धनुर्हस्तो बलैर्युतः | गत्वा च माधवं संख्ये देवासुरगणाग्रतः ॥१॥ क्रोधेन महताविष्टो मधुर्निर्जरमर्दनः । अब्रवीत्परुषं वाक्यमव्ययं हरिमीश्वरम् ॥२॥ नारायण न जानासि युद्धधर्ममितः कथम् । अन्यायाहुर्वधोपायं कृत्वा नष्टो न शोचसि ॥३॥ अनेन पंक्रयोगेन व्यवहाराकृतस्य च। सुरत्वं चोपनष्टं स्यादन्य सृष्टिं करोम्यहम् ॥४॥ त्वामेव निहनिष्यामि सह देवगणैरिह। इत्युक्त्वा धनुरादाय जघान विशिखैर्विभुम् ॥५॥ माधवस्तान्बिभेदाथ शरैर्वत्रसमप्रभैः । बहुभिस्सर्वगात्रेषु जघान च मधुं ततः ॥६॥ मायया छादितः सोभूद्दैत्यस्तं सुरसत्तमाः । ये वै शूराश्च रुद्राद्यास्त्रिदयशास्सत््वधारिणः ।॥।७॥ देव्यो नानाविधाश्चापि सायुधा वाहनान्विताः। सेनान्यो गणपा देवा लोकेशहरविष्णवः ॥८॥ अन्ये ग्रहादयो देवाः सर्वे युध्यन्ति संगता: विनष्टाश्च तदा देवा मधोर्वै मायया ध्रुवम् ॥९॥ संमुखे विमुखे चैव शरशक्तयृष्टिवृष्टिभिः । पतंति सहसा देवा भूमौ शस्त्राभिपीडिताः॥९१०॥ एतस्मिन्नंतरे विष्णुर्गृहीत्वा च सुदर्शनम्। असुरान् मायया देवान् जघान रणमूर्धनि ॥९९॥ अथते शिरांस्येषां छित्वा चैवसहस्रशः । पातयामास देवेशो दैत्यानां च सुरात्मनाम्॥१२॥ एवमन्यान् विभुर्दैत्यान् द्रावयामास संगरात् । तं दृष्ट्वा मुनयो देवाः सर्वे विस्मयमाययुः ॥१३॥ कर्णे कर्णे प्रजल्पंते देवा मुनिगणास्तथा। भगवान् विष्णु द्वारा मधु का वध व्यासजी ने कहा-- देवताओं का मर्दन करने वाला मधु नामक दैत्य सभी देवताओं तथा असुरों के आगे जाकर दिव्य रथ पर बैठकर हाथ में धनुष धारण किए हुए क्रोध पूर्वक भगवान् माधव तथा सम्पूर्ण जगत् के स्वामी अव्यय श्रीहरि से कठोर शब्दों में कहने लगा ।।१-२।। उसने कहा नारायण आप युद्ध धर्म को नहीं जानते हैं इसीलिए अन्याय पूर्वक दुर्वध का उपाय करके क्यों नहीं सोचते हैं ॥३॥ इस पाप के कारण तथा व्यवहार के नहीं करने के कारण आपका देवत्व नष्ट हो गया है, मैं दूसरी सृष्टि कर रहा हूँ ॥४॥ युद्ध में मैं दूसरे देवताओं के साथ तुम्हें मार दे रहा हूँ । यह कहकर धनुष धारण करके उसने श्रीभगवान् पर बाणों से प्रहार किया ॥५॥ श्रीभगवान् ने अपने वज्र के समान बाणों से उन बाणों को विनष्ट कर दिया और अनेक बाणों से मधु के सम्पूर्ण शरीर को छेद दिया ॥६॥ उसके बाद उसने वाहनों से युक्त अनेक देवियों, सेनापति, गणेश, शङ्कर तथा अनेक विष्णु सबके सब उसने माया से उत्पन्न कर दिया और वे सब देवता युद्ध करने लगे । उस समय मधु की माया से बहुत से देवता विनष्ट हो गये ॥७-९॥ देवताओं के आगे पीछे अपनी माया सब ओर से बाण, शक्ति तथा ऋष्टि की वर्षा होने से पीडित होकर देवता पृथिवी पर गिरने लगे ॥१०॥ उसी समय भगवान् विष्णु ने सुदर्शन चक्र को लेकर असुरों तथा माया से उत्पन्न देवताओं को मार दिया ॥११॥ उसके बाद उन सभी दैत्यों के जो देवता रूप हो गये थे शिरों को काटकर पृथिवी पर गिरा दिया ॥१२॥ इसतरह से भगवान् ने दूसरे दैत्यों को युद्धस्थल से खदेड़ दिया । उसको देखकर मुनिगण आश्चर्यित हो गये ॥१३॥ सभी देवता तथा मुनिगण एक-दूसरे से कहते थे मुनियों तथा देवताओं ने कहा-- देवताओं के एक मात्र रक्षक सबों के नियामक श्रीहरि ही हैं ॥१४॥ ये भगवान् सबों के साक्षी तथा

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