Srishti Khanda Extracted Page 822
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-822
Sanskrit Original
कालकेय इति ख्यातः सेनानीदैत्यपस्य च । स्यन्दनस्थो महावीर्यो धनुरादाय तत्र च॥९९॥ जघानसुरसंघास्तान्नर्तयामास भूतले । निरंतरशरौघेन च्छादितं गगनं तदा॥१००॥ निपतंति शराः सैन्ये कोटिकोटिसहस्रशः । निपतंति ततो देवाः संयुगेष्वनिवर्तिनः ॥१०९॥ रुधिरोद्रारिणस्सर्वे सिद्धगंधर्वकिन्नराः । विशिखैः पीडिता देवा निपेतुर्धरणीतले॥१०२॥ केचिच्छरशतै्भिन्नास्सहस्रैर युतैस्तथा । पेतुरुर्व्यां महावीर्या ये रणे सुरपुंगवाः ॥१० ३॥ व्यथिताश्चाभवन्सर्वे स्यंदनस्था दिवौकसः। शरैः प्रव्यथितास्ते तु स्थातुं शक्ता न संमुखे। १० ४॥ तेनावगाहितं सैन्यं गजेनेव सरोवनम् । शरैस्तस्यार्दिता देवा वत्रानलसमप्रभैः ॥१०५॥ न शेकुः समरेस्थातुं मघवंतं ययुस्तदा । चित्ररथ इति ख्यातो देवश्शस्त्रभृतां वरः॥९०६॥ ययौ स्यंदनमारुह्ा युद्धं प्रतिधनुर्घरः। अब्रवीद्ृचनं सोऽपि सेनान्यं तु महासुरम्॥९०७॥ यथाहंसि महाशूर सुरसेनां मुदान्वितः । स त्वं प्रशंसनीयश्च शूरोऽसि सुरसंमतः ॥१०८॥ हिरण्याक्षप्रियं कर्म कृतं युद्धे त्वयाधुना । इदानीं मम बाणैश्च गच्छस्व यममंदिरम् ॥१०९॥ ततश्च कालकेयस्तु स्मितो वचनमब्रवीत् । पुरैव विजितो देवगणः सर्वः प्रलीलया ॥१९०॥ इदानीं तु स्थितं युद्धे बलं सर्व तु हेलया। यदि ते निथने प्रीतिरस्तीह सुरपुंगव ॥१११॥ एभिस्त्वां निशितैर्बाणैर्नयामि यममंदिरम् । इत्युक्त्वा परमक्कुद्धो बाणमंतकसन्निभम् ॥११२॥ जघानसमरे वीरस्त्रिभिश्चिच्छेदसोंबरे । पुनर्बाणांश्च समरे योजयित्वा द्रुतं रुषा॥११३॥ परमर्षि गण उनकी प्रशंसा करने लगे । उसी समय महातेजस्वी मुख्य महाबलवान् ॥९७-९८॥ तथा दैत्यराज का सेनापति कालकेय रथ पर बैठकर ॥९९॥ देव समूह को मारकर पृथिवी पर गिरा दिया । उसने लगातार बाणों के प्रहार से आकाश को ढँक दिया ॥१००॥ उस समय देवसेना पर करोड़ों हजार बाण गिर रहे थे और युद्ध से कभी पराडमुख नहीं होने वाले देवता पृथिवी पर गिरने लगे ॥१०१॥ सभी, सिद्ध गन्धर्व तथा किन्नर खून वमन करने लगे । बाणों से पीडित होकर धरती पर गिरने लगे ॥१०२॥ कुछ बड़े-बड़े देवता, सैकड़ों हजारों तथा दश हजार बाणों से पीडित होकर पृथिवी पर गिर पड़े ॥१०३॥ रथों पर विद्यमान सभी देवता पीडित हो गये । बाणों से पीडित होने के कारण वे सामने ठहर न सके ॥१५०४॥ उसने उसी तरह देवसेना को मथ दिया जिस तरह कोई हाथी सरोवर को मथ देता है । वब्राग्नि के समान कान्ति वाले कालकेय के बाणों से पीडित हो गये ॥१०५॥ वे युद्ध में रुक न सके और इन्द्र के पास गये । चित्ररथ नामक गन्धर्व जो शाखधारीयों में श्रेष्ठ था ॥१०६॥।। वह धनुष धारण करके रथ पर बैठकर युद्ध करने गया । उसने महासुर सेनापति से कहा ॥१०७॥ हे महासुर जिस तरह तुम प्रसन्नता पूर्वक सेना को मार रहे हो उससे तुम प्रशंसनीय पराक्रम वाले बीर हो, देवता तुम्हारी प्रशंसा करते हैं ॥१०८॥ तुमने इस समय हिरण्याक्ष का प्रिय कार्य किया है । अब मेरे बाणों से यमलोक जाओ ।॥१०९॥ उसके बाद मुस्कुराते हुए कालकेय ने कहा पहले ही मैंने आसानी से देवसमूह को जीत लिया है ॥११०॥ इस समय मैंने सम्पूर्ण सेना को आसानी से जीत लिया है । हे देवपुत्र ! यदि तुम यहाँ मरना चाहते हो ॥१११॥ तो तुम्हें में इन बाणों से यमलोक भेज देता हूँ । यह कहकर अत्यन्त क्रोध करके उसने काल के समान बाण का ॥११२॥ प्रहार किया; किन्तु चित्ररथ ने उन सबों को आकाश में ही काट दिया । उसके बाद शीघ्र ही बाणों को क्रोध पूर्वक चढकार ॥११३॥ अनेक
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