Srishti Khanda Extracted Page 821
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-821
Sanskrit Original
ये चान्ये कातरा: पापा हंतारो विमुखान् रणे । अन्यायै र्ये च योद्धारस्ते यान्ति यममंदिरम्॥८ ३॥ त्रिदिवस्था गजारोहा: सैन्धवस्थास्तथा परान् । रथस्थांश्च रथारोहाः पदगांश्च पदातयः ॥८४॥ परस्परं विनिध्नंति शूरा युद्धाभिकांक्षिणः । मुदिताः सत्त्वसंपन्ना धर्मिष्ठा बलसंवृताः॥८५॥ केषांचिद्वाहवश्चिछन्ना मुसलैर्भिन्नमस्तकाः । केशाश्शिरांसि वस्त्राणि निपेतुर्धरणीतले ॥८६॥ मध्यच्छिन्नास्तथा भिन्नाः पितुरुव्या महाबलाः । खड्गपातैस्तथाचोग्रैश्चिछन्नभिन्नाः परश्वः ॥८७॥ गामेव पतिता धीरा दिव्यालंकार भूषिताः । प्रदीप्तोभूद्धरादेशो वीरै नागै ् हयै रथैः ॥८८॥ विविधाभरणै ष्टः पताकाभिश्च केतुभिः। ततो वसुन्धरा सर्वा सशैलवनकानना ॥८९॥ रुधिरौघप्लुता तत्र विबुधासुरयोर्युध । क्रव्यादैर्बहुभिस्तत्र खादितो द्रव्यसंचयः॥९०॥ लोहितं प्रचुरं पीतं रक्षोभिश्च वृकादिभिः । अन्वैर्महागणैरेव क्षतजं पवनान्वितम्॥९९॥ खादितं प्रीतिमद्भिश्च फेरुगृध्रगणैर्मुदा । एतस्मिन्नंतरे सूरिः सुरपूज्यो बृहस्पति: ॥९२॥ मृतसंजीवनीविद्यां सुराणां संजजाप ह । विशल्यकरणीं दिव्यां ब्रह्मविद्यां महाबलाम् ॥९३॥ ततोधन्वंतरिर्विद्वान्सुरवैद्यो मनोजवः । औषधैस्तत्प्रयोगैश्च रणे पर्यटते मुदा ॥९४॥ तत्र देवाश्च जीवंति ये मृताश्च महाहवे । अब्रणा बलसंपन्नाः प्रयुध्यंति भृशं पुनः ॥९५॥ एवं शतसहस्रं तु गणं दैत्यस्य चोद्धतम् । पतितं पुण्ययोगाच्च शरैर्निर्भिन्नकंधरम् ॥९६॥ ततस्तु जयशब्देन नंदंति सिद्धचारणाः । ऋषयः खेचराश्चान्ये ये चैवाप्सरसां गणाः ॥९७॥ गीतिं गायंति गंधर्वाः शशंसुः परमर्षयः । अथ क्रुद्धो महातेजा दैत्यमुख्यो महाबलः ॥९८॥ वाले वीर युद्ध में सामने ही गिर पड़े निर्भय रहने वाले वे अपने स्वामी के लिए देवलोक में जा रहे थे ॥८२॥ दूसरे जो कायर तथा पापी थे,युद्ध में पलायन करने वाले को मारने वाले थे, जो अन्याय पूर्वक युद्ध करते थे, वे यमलोक में जा रहे थे ॥८३॥ स्वर्ग में रहने वाले हाथी पर युद्ध करने वाले को, घुड़सवार दूसरे घुड़सवारों को, रथी रथियों को तथा पैदल सेना पदातियों को मार रही थी ॥८४॥ युद्ध करने की इच्छा वाले वीर एक दूसरे को मार रहे थे । बल सम्पन्न वीर प्रसन्न थे, धर्म पूर्वक युद्ध कर रहे थे ॥८५॥ कुछ बीरों की भुजाएँ कट गयीं, शिर मुसल से फूट गया, उनके केश, शिर तथा वस्र पृथिवी पर गिर पड़े ॥८६॥ जो बीच से ही कट पिट गये थे वे महाबलवान् परथिवी पर गिर पड़े, वे खड्ग प्रहार तथा भयङ्कर फरसे से छिन्न-भिन्न हो गये थे ॥८७॥ दिव्य अलङ्कारो से अलङ्कृत धीर वीर पृथिवी पर ही गिरे हुए थे । वह पृथिवी का प्रदेश वीरों, हाथियों, घोड़ों तथा रथों से चमक रहा था ॥८८॥ अनेक आभरण, कटी हुयी पताकाओं, ध्वजों, पर्वत तथा वन से युक्त सारी पृथिवी ॥८९॥ देवों तथा असुरों के रक्त समूह से भींग गयी । मांसभक्षी बहुत से जीव मांस खा रहे थे तथा मांस एकत्रित कर रहे थे ॥९०॥ राक्षसों तथा वृकों ने खूब खून पिया दूसरे महागणों ने स्यारिनों तथा गृध्रं ने प्रसन्नता पूर्वक, वायु युक्त खून को तथा मांस को खाया । उसी समय विद्वान् एवं देवपूज्य बृहस्पति ने ॥९२॥ देवताओं के लिए मृतसंजीवनी विद्या का जप किया । उन्होंने घाव रहित बनाने वाली महाविद्या का भी जप किया ॥९३॥ उसके बाद मन के समान वेग वाले धन्वन्तरि वैद्य अपने औषधियों से सबों को निरोग करने लगे ॥९४॥ उसके कारण जो देवता मर गये थे वे जीवित हो गये । वे व्रण रहित तथा सम्पन्न होकर युद्ध करने लगे ॥९५॥ इस तरह से दैत्यों के लाखों बड़े-बड़े योद्धा बाणों से जिनके कण्ठ कट गये थे पुण्य योग के कारण गिरकर मर गये ॥९६॥ उस समय जय-जयकार करते हुए सिद्ध तथा चारणगण प्रसन्न हो गये । ऋषिगण, दूसरे आकाशचारी तथा अप्सराएँ नृत्य करने लगीं और गन्धर्व गीत गाने लगे।
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