Srishti Khanda Extracted Page 809

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-809

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Sanskrit Original

धर्मद्रवा परिव्याता जलरूपा कमंडलौ। बलियज्ञेषु संभूता विष्णुना प्रभविष्णुना॥१०६॥ छड्ााना छलित: पूर्व बलिर्बलवतांवर: । तत:पादद्दयेनैव क्रांतसर्वमहीतलम् ॥९०७॥ नभःपादश्च ब्रह्माण्डं भित्वा मम पुरःस्थितः। मया संपूजितः पादः कमण्डलुजलेन वै॥१०८॥ ऽ पतज्जलम् । तत्कूटाच्छंकरं प्राप्य भ्रमते सा जटास्थिता ॥१०९॥ ततो भगीरथेनैव समाराध्य शिवं भुवि। आनीयाराधितो नित्यं तपसा गजपुंगवः॥९११०॥ तेन भित्वा नगं वीर्यात्रिभिर्दतैः कृतं बिलम् । ततस्न्रिबिलगा यस्मात्रित्रता लोकविश्रुता ॥१११॥ हरिब्रह्महरयोगात्पूता लोकस्य पावनी। समासाद्य च तां देवीं सर्वधर्मफलं लभेत् ॥११२॥ पाठयज्ञपरैः सरवै म॑त्रहोमसुरार्चनैः । सागतिर्नभवेज्जंतोर्गगासंसेवया च या ॥११३॥ धर्मस्य साधनोपायो ह्यतः परो न विद्यते। त्रैलोक्यपुण्यसंयोगात्तस्मात्तां व्रज नारद ॥११४॥ गंगातोयास्थि संयोगात् सुतास्ते सगरस्य च । स्वर्गताः पितृभिश्चैव स्वपूर्वापरजैः सह॥११५॥ ततो ब्रह्ममुखाच्छुत्वा नारदो मुनिपुंगवः । गंगाद्वारे तपः कृत्दा ब्रह्मणा सदृशो भवत् ॥११६॥ सर्वत्रसुलभा गंगा त्रिषु स्थानेषु दुर्लभा । गंगाद्वारे प्रयागे च गंगासागरसंगमे॥९९७॥ त्रिरात्रेणैकरात्रेण नरो याति परां गतिम्। तस्मात्सर्वप्रयत्नेन सद्यो मुक्तिं विचितयेत् ॥९१८॥ ततो गच्छत धर्मज्ञाः शिवां भागीरथीमिह। अचिरेणैव कालेन स्वर्गमोक्षं प्रगच्छथ ॥११९॥ विशेषकलिकाले च गंगामोक्षप्रदा नृणाम् । कृच्छाच्च क्षीणसत्वानामनंतः पुण्यसंभवः ॥९२०॥ स्वरूपा प्रकृति जलरूप से मेरे कमण्डलु में भर गयी । उसको राजा बलि के यज्ञ में भगवान् विष्णु ने प्रकट किया।।१०६।। महाबलवान् बलि को श्रीभगवान् ने छद्मरूप से छला । उन्होंने दो डगों में सम्पूर्ण पृथिवी को नाप लिया ॥१०७॥ भगवान् का चरण आकाश का भेदन करके मेरे सामने उपस्थित हुआ । मैंने कमण्डलु के जल से भगवान् के चरणों की पूजा की ॥१०८॥ मैंने भगवान् के चरणों को धोकर पूजा की उससे वह जल हेमकूट पर्वत पर गिरा । हेमकूट से वह भगवान् शङ्करजी की जटा में आकर उसी में भ्रमण करने लगा ॥१०९॥ उसके बाद भगीरथ ने शिव की आराधना करके उसे पृथिवी पर लाकर तपस्या के द्वारा पर्वत श्रेष्ठ की पूजा की ॥११०॥ उसने अपने पराक्रम से तीन दाँतों से छिद्र बना दिया । उसके कारण तीन छिद्रों से जाने के कारण गङ्गा त्रैलोक्य में त्रिस्नोता के नाम से प्रख्यात हुयीं ॥१११॥ श्रीहरि, ब्रह्मा और शङ्करजी के साथ संयोग होने से गङ्गा पवित्र तथा संसार को पवित्र बनाने वाली हुयीं ।गङ्गा देवी को प्राप्त करके सभी धर्मो का फल प्राप्त हो जाता है ॥११२॥ पाठ, यज्ञ तथा सभी मंत्रों के द्वारा होम करने एवं देवताओं की अर्चना करने से उस गति की प्राप्ति नहीं होती है, जिस गति की प्राप्ति गङ्गाजी का सेवन करने से होती है ॥११३॥ गङ्गाजी से बढकर धर्म का दूसरा कोई भी साधन नहीं है । गङ्गा में त्रैलोक्य के पुण्यों का संयोग होने से नारद तुम गङ्गातट पर जाओ ॥११४॥ हड्डी से गङ्गा के जल का संयोग हो जाने से राजा सगर के पुत्र अपने पिठृगणों के साथ स्वर्ग चले गये ॥११५॥ उसके बाद ब्रह्माजी के मुख से इस आख्यान को सुनकर नारदजी गङ्गाद्वार मं तपस्या करके ब्रह्माजी के समान हो गये ॥११६॥ गङ्गा सर्वत्र सुलभ हैं किन्तु तीन स्थानों में वे दुर्लभ हैं । गङ्गद्वार में, प्रयाग में तथा गङ्गासागर संगम स्थल पर ॥११७॥ इन स्थानों में तीन रात अथवा एक रात निवास करने से मनुष्य मोक्ष को प्राप्त कर लेता है । अतएव सारे प्रयत्नो के द्वारा सद्य: मुक्ति प्राप्त करना चाहिए ॥११८॥ अतएव हे धर्मज्ञों आपलोग यहाँ के कल्याणकारिणी भागीरथी के तट पर चले जायँ । ऐसा करके आपलोग शीघ्र ही मुक्ति प्राप्त कर लेंगे ॥११९। विशेष रूप से कलियुग में गङ्गा ही मोक्ष प्रदान

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