Srishti Khanda Extracted Page 804

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-804

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Sanskrit Original

गतिर्मनुष्यमात्रस्य गंगैव परमा गतिः । वेदशास्त्र विहीनस्य गुरुनिंदापरस्य च ॥३६॥ समयाचारहीनस्य नास्ति गंगा समा गतिः। किंयज्ञैर्बहुवित्ताढ्यैः किंतपोभिः सुदुष्करैः ॥३७॥ स्वर्गमोक्षप्रदा गंगा सुखसौभाग्यपूजिता। नियमैः परमैर्नित्यं किं योगैश्चित्तरोधकैः ॥३८॥ भुक्तिमुक्तिप्रदा गंगा सुखमोक्षाग्रतः स्थिता। अनेकजन्मसंघातपापं पुंसां विनश्यति ॥३९॥ स्नानमात्रेण गंगायां सद्य: स्यात्पुण्यभाङ्नरः। प्रभासे गोहस्रस्य राहुग्रस्ते दिवाकरे ॥४०॥ लभते यत्फलं दाने गंगास्नानादिनेदिने। दृष्ट्वा तु हरते पापं स्पृष्ट्वा तु लभते दिवम्॥४९॥ प्रसंगादपि सा गंगा मोक्षदा त्ववगाहिता । सर्वेन्द्रियाणां चापल्यं वासनाशक्तिसंभवम् ॥४२॥ निर्घृणत्वं ततो गंगादर्शनात्प्रविनश्यति । परद्रव्याभिकांक्षित्वं परदाराभिलाषिता ॥४३॥ परधर्मेरुचिश्चैव दर्शनादेव नश्यति । यदूच्छालाभसंतोषस्स्वधमेषु प्रवर्तते ॥४४॥ सर्वभूतसमत्वं च गङ्गायां मज्जनाद्धवेत् । यस्तु गंगां समाश्रित्य सुखं तिष्ठति मानवः ॥४५॥ जीवन्मुक्तस्स एवेह सर्वेषामुत्तमोत्तमः। गंगां संश्रित्यस्तिष्टेत्तस्यकार्यं नविद्यते ॥४६॥ कृतकृत्यस्स वैमुक्तो जीवन्मुक्तश्च मानवः । यज्ञोदानं तपोजप्यं श्राद्धं च सुरपूजनम् ॥४७॥ गंगायां तु कृतं नित्यं कोटिकोटिगुणं भवेत् । अन्यस्थाने कृतं पापं गंगातीरे विनश्यति ॥४८॥ गंगातीरेकृतं पापं गंगास्नानेन नश्यति । आत्मनो जन्मनक्षत्रे जाह्ववीसङ्गते दिने ॥४९॥ स्वर्ग चले जाते हें और स्वर्ग में रहने वाले पितृगण मुक्त हो जाते हैं ॥३५॥ सभी मनुष्यों की परमगति गङ्गाजी ही हैं। चाहे वेद शास्त्र विहीन तथा गुरुजनों की निन्दा करने वाला ही क्यों न हो ॥३६॥ सदाचार का पालन नहीं करने वाले के लिए गङ्गा के समान कोई भी दूसरी गति नहीं है । बहुत अधिक धन से किए जाने वाले यज्ञों तथा दुष्कर तपस्याओं से कोई लाभ नहीं है ॥३७॥ सुख तथा सौभाग्य से पूजित गङ्गाजी ही स्वर्ग तथा मोक्ष प्रदान करने वाली हैं । चित्त के निरोध रूपी योग तथा श्रेष्ठ नियमों का नित्य पालन करने से क्या लाभ है ?॥३८॥ सामने विद्यमान गङ्गाजी ही सुख तथा मोक्ष प्रदान करती है । उन्हीं से मनुष्यों द्वारा अनेक जन्मों में किए गये पाप समूह का गङ्गाजी नाश कर देती हें ॥३९॥ गङ्गाजी में जाकर मनुष्य शीघ्र ही पुण्य का पात्र बन जाता है । सूर्यग्रहण की बेला में प्रभास क्षेत्र में जाकर हजारो गायों का दान करने से जिस फल की प्राप्ति होती है, उस फल की प्राप्ति गङ्गा स्नान करने वाले को प्रतिदिन होती है । गङ्गाजी का दर्शन करने से वे उसके पापों को हर लेती हैं और जो गङ्गाजल का स्पर्श करता है, वह स्वर्ग को प्राप्त करता है ॥४०-४१॥ केवल प्रसंग मात्र से भी स्नान करने वाले को गङ्गाजी मोक्ष प्रदान कर देती हैं । वासना तथा आसक्ति जन्य सभी इन्द्रियों की चञ्चलता ॥४२॥ निष्ठुरता ये सबके सब गङ्गाजी के दर्शन मात्र से विनष्ट हो जाते हैं । दूसरे की सम्पत्ति को प्राप्त करने की कामना तथा दूसरे की पत्नी को प्राप्त करने की इच्छा ॥४३॥ तथा दूसरे धर्म में होने वाली अभिरुचि गङ्गाजी के दर्शन मात्र से समाप्त हो जाते हैं । उसकी अपने धर्म में रुचि हो जाती है, ओर स्वाभाविक रूप से प्राप्त वस्तुओं से संतोष हो जाता है ॥४४॥। गङ्गाजी में स्नान करने से सभी भूतों के प्रति समभाव होता है । जो मनुष्य गङ्गाजी के तट पर जाकर वहीं सुखपूर्वक निवास करता है॥४५॥ सभी लोकों में उत्तमोत्तम वह पुरुष इस लोक में ही जीवन्मुक्त हो जाता है जो जाकर गङ्गातट पर ही निवास करता है, उसके लिए कुछ भी करने के लिए अवशिष्ट नहीं रह जाता है ॥४६॥ वह मनुष्य जीवन्मुक्त, कृतकृत्य तथा मुक्त है । गङ्गा तट में यज्ञ, दान, तप तथा मन्त्रजप श्राद्ध तथा देवपूजन ॥४७॥ जो कुछ भी किए जाते हैं, उन सबों का करोड़ गुना फल होता है । दूसरे स्थानों में किए गये पाप का विनाश गङ्गा के तट पर हो जाता

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