Srishti Khanda Extracted Page 803

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-803

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Sanskrit Original

प्रासादा यत्र सौवर्णास्सर्वलोकोर्ध्वगाश्शिवा: । इष्टद्रव्यैः सुसंपूर्णाः स्त्रियो यत्र मनोरमाः ॥२२॥ पारिजातः समाः पुष्पवृक्षाः कल्पद्रुमोपमाः । गंगातीरे तपस्तप्त्वा तत्रैश्वय॑ लभंति हि॥२३॥ । पुरुदानैर्गतिर्याच गंगां संसेवतां च सा ॥२४॥ जारजं पतितं दुष्टमंत्यजं गुरुघातिनम् । सर्वद्रोहेण संयुक्तं सर्वपातकसंयुतम् ॥२५॥ त्यजंति पितरं पुत्राः प्रियं पत्न्यः सुहद्रणाः। अन्येच बांधवाः सर्वे गंगा तु नपरित्यजेत्॥२६॥ यथा माता स्वयं जन्ममलशौचं च कारयेत्। क्रोडीकृत्य तथा तेषां गंगाप्रक्षालयेन्मलम् ॥२७॥भवंति ते सुविख्याता भोग्यालंकारपूजिताः । दर्शने क्रियते गंगासकृद्भक्त्यानरैस्तु यैः ॥२८॥ तेषां कुलानां लक्षं तु भवात्तारयते शिवा। स्मृतार्तितत्रीयैर्ध्याता संस्तुता साधुमोदिता॥२९॥ गंगा तारयते नृणामुभौ वंशौ भवार्णवात् । संक्रांतिषु व्यतीपाते ग्रहणे चंद्रसूर्ययोः ॥३०॥ पुण्ये स्नात्वा तु गंगायां कुलकोटिं समुद्धरेत्। शुक्लपक्षे दिवामर्त्या गंगायामुत्तरायणे ॥३९॥ धन्या देहंविमुंचंति हृदिस्थे च जनार्दने । अनेन विधिना यस्तु भागीरथ्या जले शुभे ॥३२॥ प्राणांस्त्यक्त्वा ब्रजेत्स्वर्ग पुनरावृत्तिवर्जितम् । यो गंगानुगतो नित्यं सर्वदेवानुगो हि सः ॥३३॥ सर्वदेवमयो विष्णुर्गगाविष्णुमयी यतः । गंगायां पिंडदानेन पितृणां वै तिलोदकैः ॥३४॥ नरकस्था दिवं यांति स्वर्गस्था मोक्षमाप्नुयुः । परदार परद्रव्यबाधाद्रोहपरस्य च ॥३५॥ द्वारा अपने रत्नों से भरे गृहों में स्वर्ग में जाकर अभी तक नहीं लौटे ॥२१॥ वहाँ सुवर्ण निर्मित महल हैं, वे सभी लोकों के ऊपर तथा कल्याणमय हैं । वे सब अभिप्रेत द्रव्यों से भरे हुए हैं । वहाँ की स्त्रियां सुन्दर हैं ॥२२॥ पारिजात के समान पुष्पों के वृक्ष है, तथा कल्पवृक्ष वहाँ विद्यमान हैं । गङ्गा के तट पर तपस्या करके वे स्वर्ग में ऐश्वर्य को प्राप्त करते हैं ॥२३॥ तपस्याओं के करने से तथा अनेक प्रकार के यज्ञों के करने तथा अनेक प्रकार के दानों को करने से जिस फल की प्राप्ति होती है, उस फल की प्राप्ति गङ्गा के सेवन से होती है ।।२४।। जारज, पतित, दुष्ट, शूद्र, गुरु से घात करने वाले, सभी प्रकार के द्रोहों से युक्त तथा सभी पातकों वाले ॥२५॥ इन सभी पापों से युक्त को माता-पिता, पुत्र, प्रिय पत्नी मित्रगण तथा दूसरे बांधव सभी त्याग देते हैं, किन्तु गङ्गाजी उसे नहीं त्यागती हैं ॥२६॥ इन सबों से युक्त पुरुष को भी अपनी गोद में लेकर गङ्गाजी उसके पापों का प्रक्षालन कर देती हें॥२७॥ वे भी जीव भोग्य पदार्थो से युक्त होकर अत्यन्त विख्यात हो जाते हैं ।पुरुषों को गङ्गाजी भक्ति पूर्वक दर्शन किए जाने मात्र से पवित्र बना देती हैं ॥२९॥ उन सबों के लाखों पूर्वजों को कल्याणकारिणी गङ्गाजी संसार से तार देती हैं । स्मरण करने मात्र से कष्ट को दूर करने वाली गङ्गाजी का जो लोग ध्यान करते हैं तथा अच्छी तरह से प्रसन्नता पूर्वक स्तुति करते हैं ॥२९॥ उन लोगों के माता तथा पिता दोनों के वंशों को संसार सागर से वे तार देती हैं । संक्रान्ति के समय, व्यतीपात के समय, चन्द्रग्रहण तथा सूर्यग्रहण के समय ॥३०॥ पुण्य समय में गङ्गा में स्नान करके मनुष्य अपने करोड़ों वंशों का उद्धार कर देते हैं । उत्तरायण के समय शुक्लपक्ष में दिन में गङ्गा में जाकर जो मनुष्य अपने प्राणों का परित्याग भगवान् जनार्दन का चिन्तन करते हुए करते हैं । इस विधि से गङ्गाजी के पवित्र जल में ॥३१-३२॥ आपने प्राणों का परित्याग करके जीव स्वर्ग चले जाते हैं और वे पुन: इस संसार में नहीं आते हैं । जो मनुष्य प्रतिदिन गङ्गाजी में स्नान करने के लिए जाता है, उसके पीछे सभी देवता जाते हैं ॥३३॥ क्योंकि भगवान् विष्णु सर्वदेवमय हैं और गङ्गा विष्णुमयी हैं । गङ्गाजी में तिलोदक से तर्पण करने से तथा पिण्डदान करने से ॥३४॥ दूसरों की पत्नी तथा दूसरों के धन को लेने वाले भी पुरुषों के नरक में विद्यमान पितृगण र ...

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