Srishti Khanda Extracted Page 799
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-799
Sanskrit Original
न श्रीपद्ममहापुराण तथा कुरु पवित्रांगि कलौ मलविनाशिनि। मंत्रेणानेन यः कुर्याहिचित्य तुलसीदलम् ॥१३॥ पूजनं वासुदेवस्य लक्षकोटिगुणं भवेत् । प्रभावं तव देवेशि गायंति सुरसत्तमाः ॥१४॥ मुनयः सिद्धगंधर्वा: पाताले नागराद्स्वयम् । न॒ ते प्रभावं जानंति देवताः केशवादृते॥९५॥ गुणानां परिमाणं तु कल्पकोटिशतैरपि । कृष्णानंदात्समुद्धूता क्षीरोदमथनोद्यमे ॥ १ ६॥ उत्तमांगे पुरा येन तुलसी विष्णुना धृता । प्राप्यैतानि त्वया देवि विष्णोरंगानि सर्वशः॥९७॥ पवित्रता त्वया प्राप्ता तुलसीं त्वां नमाम्यहम् । त्वदंगसंभवैः पुत्रैः पूजयामि यथाहरिम् ॥१८॥ तथा कुरुष्व मेऽविघ्नं यतो यामि परां गतिम् । रोपिता गोमतीतीरे स्वयं कृष्णेन पालिता ॥१९॥ जगद्धिताय तुलसी गोपीनां हितहेतवे । बृंदावने विचरता सेविता विष्णुना स्वयम् ॥२०॥ गोकुलस्य विवृद्ध्यर्थं कंसस्य निधनाय च । वसिष्ठवचनात्पूर्वं रामेण सरयूतटे ॥२१॥ राक्षसानां वधार्थाय रोपिता त्वं जगत्त्रिये। रोपिता तपसोवृद्भ्यै तुलसीं त्वां नमाम्यहम्॥२२॥ वियोगे वासुदेवस्य ध्यात्वा त्वां जनकात्मजा । अशोकवनमध्ये तु प्रियेण सह संगता ॥२३॥ शङ्करार्थं पुरा देवि पार्वत्या त्वं हिमालये। रोपिता तपसो वृद्ध्यै तुलसीं त्वां नमाम्यहम् ॥२४॥ सर्वाभिर्देवपत्नीभिः किन्नरैश्ापि नंदने । दुःस्वप्रनाशनार्थाय सेविता त्वं नमोस्तुते ॥२५॥ धर्मारण्ये गयायां च सेविता पितृभिः स्वयम्। सेविता तुलसी पुण्या आत्मनो हितमिच्छता ॥२६॥ रोपिता रामचंद्रेण सेविता लक्ष्मणेन च। पालिता सीतया भक्तया तुलसी दंडके वने ॥२७॥ शोभने आप मेरे लिए वरदा हों । मैं जैसे तुम्हारे अङ्ग से उत्पन्न श्रीहरि की पूजा कर सकूँ ॥१२॥ हे कलियुग के दोषों को विनष्ट करने वाली मुझे वैसा ही बना दो । इस मन्त्र से तुलसी दल लेकर जो व्यक्ति ॥१३॥ भगवान् वासुदेव की पूजा करता है, उसकी पूजा करोड़ गुणा फलद होती है । हे देवेशि ! आपके प्रभाव का बड़े-बड़े देवता गायन करते हैं ।।१४।। मुनिजन, सिद्ध, गन्धर्व, पाताल में स्वयं नागराज शेष तुम्हारे प्रभाव का गायन करते हैं । ये लोग आपके पूर्णरूप से प्रभाव को नहीं जानते हैं । केवल भगवान् केशव ही आपके प्रभाव को जानते हैं ॥१५॥ आपके गुणों का परिणाम करोड़ों सौ कल्पों में नहीं जाना जा सकता है । क्षीरसागर के मन्थन के समय भगवान् विष्णु के आनन्द से तुलसी उत्पन्न हुयीं । जिन भगवान् विष्णु ने आपको अपने शिर पर धारण किया है हे देवि ! भगवान् विष्णु के अङ्गों को पूर्ण रूप से प्राप्त करके ॥१६-१७॥ आपने पवित्रय को प्राप्त किया । हे तुलसी ! मैं आपको नमस्कार करता हूँ । आपके अङ्ग से उत्पन्न पत्तों से मैं भगवान् विष्णु की पूजा करता हुँ ॥१८। आप मेरी पुजा को निर्विघ्न बना दें जिससे कर्मों से श्रेष्ठ गति प्राप्त कर सकूँ । हे तुलसी ! भगवान् विष्णु ने आपको गोमती नदी के तट पर रोपकर आपको ॥१९॥ गोपियों का कल्याण करने के लिए पाला वृन्दावन में विचरण करते हुए भगवान् कृष्ण ने स्वयं आपकी सेवा की ॥२०॥ उन्होंने गोकुल की समृद्धि तथा कंस की मृत्यु के लिए आपकी सेवा की है । हे जगत्प्रिये ! महर्षि वसिष्ठ के कहने से श्रीराम ने सरयू के तट पर ॥२१॥ राक्षसों का वध करने के लिए आपको रोपा था । हे तुलसी देवि ! मैं आपको नमस्कार करता हूँ । वासुदेव भगवान् (श्रीराम) का वियोग हो जाने पर जनकात्मजा जानकीजी ने आपका अशोक वाटिका में ध्यान किया उसके फल स्वरूप वे अपने पतिदेव से मिल गयीं॥२२-२३॥ शङ्करजी को प्राप्त करने के लिए पार्वतीजी ने आपको हिमालय पर अपनी तपस्या की वृद्धि के लिए रोपा था । हे तुलसी देवि मैं आपको नमस्कार करता हूँ ॥२४॥ सभी देव पत्नियों तथा किन्नरों ने दुःस्वप्न का नाश करने के लिए आपको नन्दन वन में रोपा और आपकी सेवा किया था, आपको मेरा नमस्कार है ॥२५॥ पितृगणों ने
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