Srishti Khanda Extracted Page 798
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-798
Sanskrit Original
एकसठवाँ अध्याय द्विजा ऊचुः तुलसीपुष्पमाहात्स्यं श्रुतं त्वत्तो हरेः शुभम् ।तस्याः स्तोत्रं कृतं पुण्यं श्रोतुमिच्छामहे वयम् ॥१॥ व्यास उवाच पुरा स्कंदपुराणे य यन्मया कीर्तितं द्विजाः। कथयामि पुराणं च पुरतो मोक्षहेतवे ॥२॥ शतानंदमुनेः शिष्याः सर्वे ते संशितव्रताः । प्रणिपत्य गुरुं व्रिपाः पप्रच्छुः पुण्यतो हितम् ॥३॥ पूर्व ब्रह्ममुखान्नाथ यच्छुतं तुलसीस्तवम् । तद्वयं श्रोतुच्छामस्त्वत्तो ब्रह्मविदां वर ॥४॥ शतानंद उवाच नामोच्चारे कृते तस्याः प्रीणात्यसुरदर्हा। पापानि विलयं यांति पुण्यं भवति चाक्षयम् ॥५॥ सा कथं तुलसी लोकैः पूज्यते वंद्यते नहि । दर्शनादेव यस्यास्तु दानं कोटिगवां भवेत् ॥६॥ धन्यास्ते मानवा लोके यद्गृहे विद्यते कलौ । सालग्रामशिलार्थं तु तुलसी प्रत्यहं क्षितौ ॥७॥ तुलसीं ये विचिन्वंति धन्यास्ते करपल्लवाः । केशवार्थं कलौ ये च रोपयंतीह भूतले॥८॥ कि करिष्यति संरुष्टो यमोऽपि सह किंकरैः । तुलसीदलेन देवेशः पूजितो येन दुःखहा ॥९॥ तीर्थयात्रादिगमनैः फलैः सिध्यति किन्नरः । स्नाने दाने तथा ध्याने प्राशने केशवार्चने ॥१०॥ तुलसी दहते पापं कीर्तने रोपणे कला। तुलस्यमृतजन्मासि सदात्वं केशवप्रिये ॥१९॥ केशवार्थ चिनोमि त्वां वरदा भव शोभने । त्वदंग संभवैर्नित्यं पूजयामि यथाहरिम् ॥१२॥ तुलसीस्तोत्र तथा उसका माहात्म्य वर्णन ब्राह्मणों ने कहा-- आपने तुलसी तथा उसके पुष्प का माहात्म्य बतलाया अब हमलोग तुलसी स्तोत्र को सुनना चाहते हैं ॥१॥ व्यासजी ने कहा-- मैंने पहले स्कन्द पुराण में जिस स्तोत्र का वर्णन किया है, उसे ही आप लोगों को सुनता हुँ जिससे मुक्ति की प्राप्ति हो ॥२॥ शतानन्द मुनि के सभी शिष्य ब्रत के लिए प्रख्यात थे । उन लोगों ने अपने गुरु को प्रणाम करके पवित्र कल्याण के विषय में पूछा ॥३॥ हे नाथ पहले ब्रह्माजी के मुख से जिस तुलसी स्तोत्र को सुना गया था हे ब्रहाज्ञानियों में श्रेष्ठ ! उसे ही हमलोग आपके मुख से सुनना चाहते हैं ॥४॥ शतानन्द ने कहा-- तुलसी को नमस्कार करने मात्र से असुरों के दर्प को मिटाने वाले भगवान् प्रसन्न होते हैं उसके समी पाप विनष्ट हो जाते हैं और अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है ॥५। उस तुलसी का पूजन और वंदन लोगों द्वारा क्यों न किया जाय ? तुलसी का दर्शन करने मात्र से सैकड़ों गायों का दान करने का फल होता है ॥६॥ वे लोग धन्य हैं जिनके घर में कलियुग में तुलसी का निवास होता है । सालग्राम शिला के लिए प्रतिदिन तुलसी अपेक्षित होती हैं॥७।। जिन हाथों से तुलसी दल तोड़ा जाता है, वे हाथ धन्य है । कलियुग में जो लोग भगवान् केशव की पूजा के लिए तुलसी गोपते हैं ॥८॥ उनलोगों का अपने दूतों के साथ रुष्ट होकर भी यमराज क्या बिगाड़ सकते हैं ? जो व्यक्ति दुःखों को दूर करने वाले श्रीहरि की पूजा तुलसी दल से करता है ॥९॥ तीर्थ यात्रा आदि करने से मनुष्य को क्या लाभ होता है ? स्नान, दान, ध्यान करने तथा श्रीभगवान् की पूजा करने से ॥१०॥ तुलसी का नाम संकीर्तन करने से तथा तुलसी को रोपने से तुलसी सभी पापों को भस्म कर देती हैं । हे तुलसी ! तुम अमृत से उत्पन्न हुयी हो तथा तुम भगवान् केशव को सदैव प्रिय हो ॥११॥ मैं भगवान् केशव की पूजा के लिए तुम्हें लेता हूँ, अतएव हे
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