Srishti Khanda Extracted Page 796

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-796

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Sanskrit Original

यो मंजरीदलैरेब तुलस्या विष्णुमर्चयेत् । तस्य पुण्यफलं स्कन्द कथितुं नैव शाक्यते ॥१९७॥ तत्र केशवसान्निध्यं यत्रास्ति तुलसीवनम् । तत्र ब्रह्मा च कमला सर्वदेवगणैः सह ॥९१८॥ तस्मात्तां संनिकृष्टे तु सदादेवीं प्रपूजयेत्। स्तोत्रमंत्रादिकं यद्वा सर्वमानंत्यमश्नुते ॥९९९॥ थे च प्रेताश्च कूष्मांडाः पिशाचा ब्रह्मराक्षसा:। भूतदैत्यादयस्तत्र पलायन्ते सदैव हि ॥१२०॥ अलक्ष्मीर्नाशिनी घूर्णा या डाकिऱ्यादिमातरः । सर्वाः संकोचितां यांति दृष्ट्वा तु तुलसीदलम्॥१२१॥ ब्रह्महत्यादयः पापव्याधयः पापसंभवाः। कुमंत्रिणा कृता ये च सर्वे नश्यंति तत्र वै॥१२२॥ भूतले वापि तं येन हर्यर्थ तुलसीवनम्। कृतं क्रतुशतं तेन विधिवत्तप्रियदक्षिणम् ॥१२३॥ हरिलिंगेषु चान्येषु सालग्रामशिलासु च । तुलसीग्रहणं कृत्वा विष्णोः सायुज्यमाब्रजेत्॥९२४॥ नंदति पुरुषास्तस्य माधवार्थे क्षितौ तु यः । तुलसी रोपयेद्धीरः स याति माधवालयम् ॥१२५॥ पूजयित्वा हरिं देवं निर्माल्यं तुलसीदलम् । धारयेद्यः स्वशीर्षे तु पापात्पूतो दिवं ब्रजेत् ॥१२६॥ पूजने कीर्तने ध्याने रोपणे धारणे कलौ । तुलसीदहते पापं स्वर्ग मोक्षं ददाति च ॥१२७॥ उपदेशं दिशेदस्याः स्वयमाचरते पुनः। स याति परमं स्थानं माधवस्य निकेतनम् ॥१२८॥ हरेः प्रियकरं यच्च तन्मे प्रियतरं भवेत् ॥१२९॥ सर्वेषामपि देवानां देवीनां च समंततः । श्राद्धेषु यज्ञकार्येषु पर्णमेकं षडानन ॥१३०॥ तस्मात्सर्वप्रयत्मेन तुलसीसेवनं कुरु । तुलसीसेविता येन तेन सर्व तु सेवितम् ॥१३९॥ गुरुं विप्रं देवतीर्थं तस्मात्सेवय षण्मुख । शिखायां तुलसीं कृत्वा यस्तु प्राणान्परित्यजेत्॥१३२॥ भगवान् विष्णु की अर्चना करता है, हे स्कन्द ! उसके पुण्य फल का वर्णन नहीं किया जा सकता है ॥११७।। जहाँ पर तुलसी का वन होता है, वहाँ पर भगवान् केशव का सान्निध्य होता है । वहाँ पर ब्रह्माजी तथा लक्ष्मीजी अपने गणों के साथ सदैव स्थित रहते हैं ॥११८॥ .अतएव सन्निकट में विद्यमान तुलसीदेवी की सदैव पूजा करनी चाहिए तुलसी के सन्निक्ट स्तोत्र पाठ तथ मन्त्र जप सब कुछ अनन्त फल प्रदान करने वाले होते हैं ॥११९॥ जो प्रेत तथा कुष्माण्ड, पिशाच, ब्रह्मराक्षस, भूत, तथा दैत्य आदि हैं, वे वहाँ से दूर भग जाते हैं ॥१२०॥ तुलसीदल को देखकर, अलक्ष्मी, नाश करने वाली घूर्णा तथा जो डाकिनी आदि मातृकाएँ हैं वे सब संकुचित हो जाती हैं ॥१२१॥ ब्रह्महत्या आदि पाप व्याधियाँ जो पाप से उत्पन्न होती हैं, तथा कुत्सित मंत्र के द्वारा किए गये सब कुछ, वहाँ पर सब नष्ट हो जाते हैं ॥१२२॥ जो श्रीभगवान् की पूजा के लिए पृथिवी पर तुलसी का वन लगाता है, वह सैकड़ों विधि तथा दक्षिणा के साथ यज्ञ करने का फल प्राप्त करता है ॥१२३॥ श्रीहरि की मूर्ति पर, सालग्राम शिला पर तुलसी चढाकर मनुष्य भगवान् विष्णु के सायुज्य को प्राप्त करता है ॥१२४॥ जो धीर पुरुष पृथिवी पर श्रीभगवान् के लिए तुलसी लगता है, उसके पितृगण प्रसन्न होते हैं और मृत्यु के बाद वह श्रीहरि के लोक में जाता है ॥१२५॥ श्रीहरि की पूजा करके जो मनुष्य भगवान् पर चढायी हुयी तुलसी को अपने शिर पर धारण करता है, वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है और स्वर्ग जाता है ॥१२६॥ कलियुग में तुलसी पूजन करने से, ध्यान करने से, रोपने से तथा धारणकरने से सभी पापों को भस्म करके स्वर्ग तथा मोक्ष को प्रदान करती हैं ॥१२७॥ जो इस तुलसी अर्चना का उपदेश करता है तथा स्वयं तुलसी अर्चना करता है ॥१२८॥ वह भगवान् माधव के श्रेष्ठ लोक में जाता है । जो श्रीहरि को प्रिय है वही मुझको सर्वाधिक प्रिय है ॥१२९॥ हे षडानन कार्तिकेय ! सभी देवताओं तथा देवियों के यज्ञों में तथा श्राद्धों मेंतुलसी का एक भी पत्ता श्रेष्ठ होता है ॥१३०।। अतएव सभी प्रयासों के द्वारा तुम तुलसी का सेवन करो।

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