Srishti Khanda Extracted Page 790
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-790
Sanskrit Original
प्रियंते पातिता ये च स्थिरैर्युद्धपराड्मुखा: । साहसैः पातिता भीता वत्राग्निकाष्ठपीडिताः ॥३८॥ सिंहव्यघ्रहता मर्त्या व्याप्रै वा जलजंतुभिः । जलस्थलस्थिताः प्रेताः वृक्षपर्वतपातिताः ॥३९॥ पशुपक्षिहता ये च कारागारे गरे मृता:। आत्मघातमृता ये च श्राद्धादिकर्मवर्जिताः ॥४०॥ गूढकर्ममृता धूर्ता गुरुविप्रनृपद्विषः । पाषंडाः कौलिकाः क्रूरा गरदाः कूटसाक्षिणः ॥४९॥ आशौचान्नस्य भोक्तारः प्रेतभोग्या न संशयः । ममायमितिभाषन्तो नेतुं तं च न शक्रुमः ॥४२॥ आदित्य इव दुष्प्रेक्ष्यः कि वा कस्य प्रभावतः । मुनय ऊचुः अनेन भक्षितं प्रेताः पक्वं चामलकीफलम् ॥४३॥ तत्संगं यांति तस्यैव फलानि प्रचुराणि च । तेनैव कारणेनायं दुष्प्रेक्ष्यो भवतां ध्रुवम् ॥४४॥ वृक्षाग्रपतितस्याथ प्राणः स्नेहान्नच त्यजेत्। नायं चारेण सूर्यस्य न चान्ये पापकारिणः ॥४५॥ घात्रीभक्षणमात्रेण पापात्पूतो व्रजेद्दिवम् । प्रेता ऊचुः पृच्छामो वो ह्वविज्ञानान्न वयं निंदकाः क्वचित् ॥४६॥ विष्णुलोकाद्विमानं तु यावन्नैवात्र गच्छति । उच्यतां मुनिशार्दूला वो द्रुतं मनसि स्थितम्॥४७॥ यावद्द्विजा न घोषंति वेदमंत्रादिकल्पितम्। घोष्यंते यत्र वेदाश्च मंत्राणि विविधानि च ॥४८॥ पुराणस्मृतयो यत्र क्षणं स्थातुं न शक्कुमः । यज्ञहोमजपस्थानदेवतार्चनकर्मणाम् ॥४९॥ पुरतो वै नतिष्ठामस्तस्माद्वृत्तं समुच्यताम्। किं वै कृत्वा प्रेतयोनिं लभंते हि नरा द्विजा: ५ ०॥ तथा काठ की अग्नि से पीड़ित होकर, मर जाते हैं.॥३८॥ सिंह तथा व्याघ्र से मारे गये लोग अथवा जल-जंतुओं से मारे गये, जल तथा स्थल पर रहने वाले मृत व्यक्ति, वृक्ष तथा पर्वत से गिरे हुए ॥३९॥ जिन सबों को कोई पशु या पक्षी मार देते हैं, या जो जेल में मर जाते हैं, आत्महत्या करने वाले, जिनका श्राद्ध आदि कर्म नहीं होता है॥४०॥ गृहकर्म में मरे हुए धूर्त, ब्राह्मण तथा राजा से द्वेष करने वाले, पाखण्डी, कौलिक (औघड़) विष देने वाले, क्रूर व्यक्ति, झूठी गवाही देने वाले ॥४१॥ अपवित्र अन्न को खाने वाले ये सबके सब प्रेतों के ही भोग्य होते हैं । हमलोग यह मेरा है यह मेरा है यह कहते हैं, किन्तु इसे ले नहीं जा पा रहे है ॥४२॥ यह किसके प्रभाव से तथा क्यों सूर्य के समान दुष्प्रेक्ष्य हैं ? मुनियों ने कहा-- हे प्रेतों इसने पके हुए आँवला के फल को खा लिया है॥४३॥ उसके ही साथ वहाँ बहुत अधिक आँवला के फल भी गिरे हुए हैं, उसीके कारण तुमलोगों के लिए यह दुष्णेक्ष्य हो गया है ॥४४॥ पेड़ के ऊपर से गिरने के कारण या प्रेम से प्राणों का परित्याग नहीं किया है यह सूर्य के चार के कारण अथवा किसी दूसरे कारण से नहीं मरा है ॥४५॥ आँवला के फल को खाने के कारण पापों से मुक्त होकर यह विष्णु लोक में जायेगा । प्रेतों ने कहा-- हम अज्ञानी होने के कारण आपलोगों से पूछ रहे हैं किसी की निन्दा नहीं कर रहे हैं ॥|४६॥ जब तक विष्णुलोक से इसके लिए विमान नहीं आता है तब तक हे मुनियों ! आपलोग हमारे प्रश्नों का उत्तर शीघ्र दे दें ॥४७॥ जब तक ब्राह्मण वेद के मन्त्रों का उद्घोष नहीं करते हैं तब तक आपलोग हमारे प्रश्नों का उत्तर दे दें । जहाँ विविध वेद मंत्रों का उद्घोष होता है ॥४८॥ तथा पुराणों तथा स्मृतियों का उद्घोष होता है वहाँ पर हमलोग नहीं रुक सकते हैं । यज्ञ, होम, जप स्थान तथा देवताओं की पूजा करने वालों के समक्ष हमलोग नहीं ठहरते है । अतएव आपलोग हमलोगों को बतलायें । हे ब्राह्मणों ! आपलोग बतलायें कि किन कर्मों को करके
No translation available yet.
Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know