Srishti Khanda Extracted Page 786

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-786

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Sanskrit Original

मंत्रा यथाक्रमं न्यस्तव्या: । शिरस्युरसि मालां च गृहीत्वा यो व्रजेत्रः ॥ पदे पदेऽश्वमेधस्य फलमाप्रोति नान्यथा ॥२००॥ सर्वेषामपि वक्त्राणां धारणे मत्समो भवेत् । तस्मात्सर्वप्रयत्मेन रुद्राक्षं पुत्र धारय ॥२०९॥ धारयित्वा तु रुद्राक्षं म्रियते यःक्षितौ नरः । सयाति मत्पुरं रम्यं सर्वदेवैः प्रपूजितः ॥२० २॥ मरुदेशे पुरा वत्स वाणिज्याय किल स्थले। गच्छन्वणिकसुतस्तात तरौ प्रेता प्रपीडितः ॥२०३॥ ररीनर्ति ततः प्रेता द्विजेन परमैक्षि च । द्विज उवाच का त्वं नृत्यसि दीनासि संवृता जीर्णवाससा ॥२०४॥ ईश्वर उवाच आह सा च हिजं प्राह देवदूतान्मया श्रुतम् । अस्य चारुनरस्यैव वद्रपातेन सांप्रतम् ॥२०५॥ निश्चितं निधनं विप्र मद्भर्ता तु भविष्यति। एतस्मिन्नंतरे नाकाइज्रं तस्य शिरोपरि ॥२०६॥ अपतत्स पपातोर्व्यां रुद्राक्षस्यार्धखंडके । ततो मम पुरात्पुत्र विमानं चापतद्द्रुतम् ॥२०७॥ समारुह्य ततः श्रीमांस्तत्र तिष्ठति संचिरम्। ममांशकं समासाद्य ईश्वरः कौ धनी भवेत् ॥२०८॥ एवं रुद्राक्षखंडे च मृतस्य सुगतिः सुत । ज्ञानेन धारिणः पुंसः फलं वक्तुं न शक्रुमः॥२०९॥ हः है छह मुखी रुद्राक्ष का मंत्र ॐ हुम् है । सप्तमुखी रुद्राक्ष का मन्त्र ॐ हूः है । अष्टमुखी रुद्राक्ष का मंत्र ओम् कम् है । नवमुखी रुद्राक्ष का मन्त्र ऊँ जूं है । दशमुखी रुद्राक्ष का मन्त्र ओम् क्षम् है । एकादश मुखी रुद्राक्ष का मन्त्र ओम् श्रीम् है, द्रादशमुखी रुद्राक्ष का मन्त्र ओम ह्रीम् है । त्रयोदशमुखी रुद्राक्ष का मन्त्र ओम क्षौम् है और चतुर्दशमुखी रुद्राक्ष का मन्त्र ओमब्रां है । इसरह से क्रमानुसार मन्त्रों का न्यास करना चाहिए । जो मनुष्य अपने शिर पर या वक्ष: स्थल पर रुद्राक्ष माला को धारण करके कहीं जाता है । वह पग-पग पर अश्वमेध याग का फल प्राप्त करता है ॥२००॥ सभी मुखों वाले रुद्राक्ष को धारण करने वाला मनुष्य मेरे समान हो जाता है । अतएव हे पुत्र ! सभी प्रयत्नों के द्वारा रुद्राक्ष को धारण करो ॥२०१॥ भूलोक में रुद्राक्ष को धारण करके जो मनुष्य मर जाता है, वह अत्यन्त मनोहर मेरे नगर में जाता है वह सभी देवताओं से पूजित होता है ॥२०२॥ हे वत्स ! प्राचीनकाल में व्यापार करने के लिए जाते हुए किसी वणिक, पुत्र को किसी प्रेतिनी ने पीडित किया । उसके बाद वह प्रेतनी खूब नृत्य करने लगी । उसे द्विज ने देखा तो द्विज ने कहा-- अरे तुम दीन, फटे वस्रों को पहनी हो, क्यों नृत्य कर रही हो ?॥॥२०३-२०४॥ ईश्वर ने कहा-- उसके बाद वह प्रेतिनी बोली मैने देवदूत के मुख से सुना है कि इस सुन्दर मनुष्य का इस समय वज्रपात से मृत्यु निश्चित है और वही मेरा पति होगा । उसी समय आकाश से उसके शिर पर व्रपात हुआ ॥२०५-२०६॥ उसके कारण वह रुद्राक्ष के आधे टुकड़े के ऊपर गिर पड़ा । हे पुत्र ! उसी समय मेरे लोक से शीघ्र ही वहाँ विमान आया ॥२०७॥। उसके बाद उस विमान पर चढकर वह मेरे लोक में आया और दीर्घकाल से यहाँ है । मेरे अंश को प्राप्त करके वह पृथिवी पर धनिकों का स्वामी होगा ॥२०८॥ हे पुत्र ! रुद्राक्ष के टुकड़े पर गिरने से सुन्दर गति होती है और जो जानकार रुद्राक्ष धारण करता है उसके फल का वर्णन नहीं किया जा सकता है ॥२०९॥ जो रुद्राक्ष की माला अथवा एक रुद्राक्ष को धारण करके मर जाता है, वह शैव

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