Srishti Khanda Extracted Page 782
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-782
Sanskrit Original
ईश्वर उवाच एकवक्त्रः शिवः साक्षाद्वह्महत्यां व्यपोहति ॥९४६॥ तस्मात्तु धारयेद्देहे सर्वपापक्षयाय च। शिवलोकं सगच्छेच्च शिवेन सह मोदते ॥१४७॥ महता पुण्ययोगेन हरानुग्रहकारणात् । एकवक्त्रं लभेन्मर्त्यों कैलासं च षडानन ॥१४८॥ देवदेवो द्विवक्त्रं च यस्तु धारयते नरः । सर्व पापक्षयं याति यहुद्य॑ गोवधादिकम् ॥१४९॥ स्वर्ग चाक्षयमाप्रोति द्विवक्त्रधारणात्ततः । त्रिवक्त्रमनलस्साक्षाद्यस्य देहे प्रतिष्ठति ॥१५०॥ तस्य जन्मार्जितं पापं दहत्यभ्रिरिवेंधनम् । स्त्रीहत्याब्रह्महत्याभ्यां बहूनां चैव हत्यया ॥१५९॥ यत्पापं लभते मर्त्यः सर्व नश्यति तत्क्षणात् । यत्फलं वह्लिपूजायामग्निकार्ये घृताहुतौ ॥१५२॥ तत्फलं लभते धीरः स्वर्ग चानंतमश्नुते। त्रिवक्त्रं धारयेद्यस्तु स च ब्रह्मसमो भुवि ॥१५३॥ निचितं दुष्कृतं सर्व दहेज्जन्मनि जन्मनि । न चोदरे भवेद्रोगो न चैवापटुतां ब्रजेत् ॥१५४॥ पराजयं न लभते नाग्निना दह्यते गृहम् । एतान्यन्यानि सर्वाणि वञ्रादेश्च निवारणम् ॥१५५॥ नाशुभं विद्यते किंचित्त्रिवक्त्रस्य तु धारणात् ।चतुर्वक्त्रः स्वयं ब्रह्मा यस्य देहे प्रतिष्ठति ॥१५६॥ स भवेत्सर्वशास्त्रज्ञो द्विजो वेदविदांवरः । सर्वधर्मार्थतत्त्वज्ञः स्मार्तः पौराणिको भवेत् ॥१५७॥ यत्पापं नरहत्यायां बहुसत्त्वेषु वेश्मसु । तत्सर्वं दहते शीध्रं चतुर्वक्त्रस्य धारणात् ॥९५८॥ मुखों के देवता कौन है, इसे आप बतलायें, उन सबां का गुण क्या है अथवा दोष क्या है ? हे जगदीश्वर ! उसे आप वतलायें ॥१४५॥ यदि आप की मुझ पर कृपा है तो उसे यथार्थ रूप से मुझे बतलाइये । शङ्करजी ने कहा-- एकमुखी रुद्राक्ष स्वयं शिव स्वरूप होता है और वह ब्रह्महत्या को दूर करता है ॥१४६॥ अतएव अपने शरीर पर उसको सभी पापों का नाश करने के लिए धारण करना चाहिए । उसको धारण करने वाला शिवलोक में जाता है और भगवान् शिव के साथ आनन्दानुभव करता है ॥१४७॥ हे षडानन ! जब महान पुण्य उदित होता है तथा उस पर शङ्करजी की कृपा होती है । एक मुखी रुद्राक्ष तथा कैलास की प्राप्ति होती है ॥१४८॥ दो मुखी रुद्राक्ष देवदेव शिव स्वरूप होता है उसको जो धारण करता है उसके गोप्य गोवध आदि जन्य पाप भी नष्ट हो जाते हैं ॥१४९॥ अतएव दो मुखी रुद्राक्ष धारण करने वाला अक्षय स्वर्ग को प्राप्त करता है । तीन मुखी रुद्राक्ष साक्षात् अग्नि स्वरूप है । वह जिसके शरीर पर रहता है ॥१५०॥ वह उसके पापों को उसी तरह विनष्ट कर देता है जिस तरह अग्नि इन्धन को जला देती है । स्री हत्या, ब्रह्महत्या तथा अनेक लोगों की हत्या करने से ॥१५१॥ जो पाप होता है उन सभी पापों को वह विनष्ट कर देता है । अग्निहोत्र के समय अग्नि में घी की आहुति देने से जिस फल की प्राप्ति होती है॥१५२॥ धीर पुरुष उस फल को तथा अनन्त स्वर्ग को रुद्राक्ष धारण करके प्राप्त करता है । जो मनुष्य तीन मुखी रुद्राक्ष धारण करता है वह ब्रह्माजी के समान हो जाता है ॥१५३॥ उसके जन्म जन्मान्तर में अर्जित पापों को वह भस्म कर देता है । उसके पेट में कोई रोग नहीं होता है और वह मूर्ख भी नहीं होता हे ॥१५४॥ उसका कभी पराजय नहीं होता है तथा उसके घर में कभी आग भी नहीं लगती है । इन सबों के अतिरिक्त उसके घर पर कभी बिजली नहीं गिरती है ॥१५५॥ तीन मुखी रुद्राक्ष धारण करने वाले का अकल्याण होता ही नहीं है । चतुर्मुखी रुद्राक्ष स्वयं ब्रह्मा स्वरूप होता है, वह जिसके शरीर पर रहता है ॥१५६॥ वह ब्राह्मण सभी शास्त्रों का ज्ञाता और वेदज्ञों में श्रेष्ठ होता है । वह सभी धर्मा और अर्था के तत्त्व को जानने वाला तथा स्मार्त पौराणिक होता है ॥१५७॥ मनुष्य को मारने से, तथा घर में बहुत से जीवों को मारने से होने वाले पापों को वह वह शीघ्र ही भस्म कर देता है,
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