Srishti Khanda Extracted Page 780
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-780
Sanskrit Original
निर्योनि कीटविद्धं च भग्नलिंगं यथाक्रमम् । अन्योन्यं बीजलग्रं च मालायां परिवर्जयेत् ॥९१२०॥ स्वयं च ग्रथिता या च श्लथान्योन्य प्रसज्जिता । शूद्रादिग्रथिताऽ शुद्धा दूरात्तां परिवर्जयेत् ॥१२९॥ मध्यमा लग्नकं बीजं जप्तव्यं च यथाक्रमम् । हस्तसंभ्रमणेनैव मेर्वामर्शं पुनः पुनः॥९२२॥ संख्यातं यज्जपेन्मंत्रमसंख्यातं च निष्फलम्। सर्वेषामेव देवानां जपेन्मंत्रंस्वमालया॥९२३॥ प्रयतः सकले तीर्थे कोटिकोटिगुणं भवेत्। शुद्धायामेव भूम्यां तु मेध्यके वृक्षमूलके ॥१२४॥ गोष्ठे चतुष्पथागारे विष्णोर्मत्रं शिवस्य च। गणपतेश्च सूरस्य लिंगेनंतफलं लभेत्॥९२५॥ शून्यागारे शवस्याग्ने शमशाने च चतुष्पथे । देवीमंत्रं जपेद्यस्तु सद्यःसिध्यति साधकः ॥१२६॥ यावच्चावैदिकं मंत्रं पौराणं चागमोद्धवम् । सर्व रुद्राक्षमालायामीप्सितेष्टार्थदायकम् ॥ १ २७॥ रुद्राक्षत्रवजं शुद्धं जलं शिरसि धारयेत् । सर्वस्मात्कल्मषात्पूतः पुण्यं भवति चाक्षयम् ॥१२८॥ रुद्राक्षस्य च प्रत्येकं बीजं प्रत्येक निर्जरम् । धारयेद्यस्तनौ मर्त्यः सुराणां सत्तमो भवेत् ॥१२९॥ द्विजा ऊचुः रद्राक्षस्तु कुतो जातः कुतो वा मेध्यतां गतः। किमर्थं स्थावरो भूमौ केनैव च प्रचारितः॥९३०॥ व्यास उवाच पुरा कृतयुगे विप्रास्त्रिपुरो नाम दानवः । सुराणां च वधं कृत्वा अंतरिक्षपुरे हि सः ॥१३९॥ प्रणाशे सर्वलोकानां स्थिरो ब्रह्मवरेण च । शुश्राव शङ्करो भामं देवैरीशो निवेदितम् ॥१३२॥ का लक्षण बतलाता हुँ उसे आप लोग सुनें । उसके लक्षण को जानकर आपलोग शैव मार्ग को प्राप्त कर लेंगे॥१ १९॥ माला में योनिहीन, क्रीडों द्वारा खाये गये, जिसका लिङ्ग भग्न हो गया हो तथा जो दाना परस्पर में सटा हो ऐसे रुद्राक्ष का परित्याग कर देना चाहिए ॥१२०॥ जो माला स्वयं गूंथी गयी हो जो परस्पर में सटी हो, जिसको शूद्र आदि गुंथे हो ऐसी माला अशुद्ध होती है, उसका दूर से ही परित्याग कर देना चाहिए ॥१२१॥ माला के बीजों को मध्यमा अङ्गुलि से सटाकर जपना चाहिए । सुमेरु के पास आने पर हाथ से माला को धुमा ले, सुमेरु को पार न करे ॥१२२॥ जिस मंत्र का जप करे उसकी संख्या होनी चाहिए, बिना संख्या के जप करना निष्फल होता है । अपनी माला से किसी भी देवता का मन्त्र जपना चाहिए ॥१२३॥ सावधानी पूर्वक तीर्थ में जप करने से करोड़ों-करोड़ों गुना फल होता है । जप शुद्ध भूमि पर अथवा मेध्य वृक्ष की जड़ में बैठकर ॥१२४॥ गोशाला में अथवा चौराहे के घर में, भगवान् विष्णु या शिवजी के, या गणेशजी के या सूर्य के लिङ्ग (मूर्ति) के सन्निकट मन्त्र का जप करने से अनन्त फल की प्राप्ति होती है ॥१२५॥ जो साधक शून्य गृह में, शव के सामने, श्मशान में या चौराहे पर देवी के मन्त्र को जपता है उसकी सद्य: सिद्धि हो जाती है ॥१२६॥ सभी वैदिक मन्त्र, पौराणिक मन्त्र, आगमीय मन्त्र सबके-सब रुद्राक्ष की माला से जप करने के कारण अभीष्ट फल देते हैं ॥१२७॥ रुद्राक्ष से खुत जल को जोअपने शिर पर धारण करता है, वह सभी पापों से पवित्र हो जाता है तथा उसको अक्षय फल की प्राप्ति होती है॥१२८॥ रुद्राक्ष के प्रत्येक बीज के अलग-अलग देवता होते हैं । जो मनुष्य उसे अपने शरीर पर धारण करता है, वह देवताओं में श्रेष्ठ हो जाता है ॥१२९॥ ब्राह्मणों ने कहा-- रुद्राक्ष कैसे उत्पन्न हुआ ? कैसे पवित्र हो गया? वह भूमि पर क्यों स्थित है ? और उसका प्रचार किसने किया 2॥१३०॥ व्यासजी ने कहा-- हे विप्रो ! पहले एक त्रिपुर नामक दानव था, वह अनन्तरिक्ष में ही देवताओं का वध कर देता था ॥१३१॥ ब्रह्माजी के वरदान के कारण वह सम्पूर्ण लोकों का विनाश कर देना चाहता था । इस बात को शङ्करजी ने भी सुना और देवताओं ने
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