Srishti Khanda Extracted Page 777
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-777
Sanskrit Original
परे श्रीपद्ममहापुराण नृत्यगीतादिशास्त्रेण गंधर्वाणां पतिर्भवेत् । दासीदासयुतः स्वर्गे धनैः स्त्रीभिर्वरैर्युतः ॥७९॥ तथैव गोप्रदानेन तावत्कालं वसेद्दिवि। लिंगे दुग्धप्रदानाच्च नरः कल्पं वसेद्दिवि ॥८०॥ दध्ना स्नानेन द्विगुणं घृतेन तु शताधिकम्। अन्नं षड्ससंयुक्तं दत्वाक्षिति पतिर्भवेत् ॥८१॥ तथैव पायसं दत्वा मुनीनां प्रवरो भुवि । हविष्यान्नं मुदा दत्वा वेदशास्तरार्थयारगः ॥८ २॥ निरामिषप्रदानाच्च ब्रह्मचारी व्रती भवेत्। मधुदानाच्च सौभाग्यं गुडेन लवणेन च॥८३॥ शर्करादिभिर्लावण्यं सर्वलोकेषु गीयते। देवानां शंभुलिंगानामर्चा कृत्वा विधानतः ॥८४॥ अनुक्रमेण स्वर्गादौ लोकानां स पतिर्भवेत् । लोकानां चाहितार्थाय देवास्तिष्ठंति संमुखाः ॥८५॥ सकृत्प्रदक्षिणां कृत्वा शंभुलिंगेषु पंडितः । दिव्यं वर्षशतं पूर्ण स्वर्गमेति नरोत्तमः ॥८६॥ एवमेव क्रमेणैव नमस्कारैः स्वयंभुवः । लोकवंद्यो ब्रजेत्स्वर्गं तस्मान्नित्यं समाचरेत् ॥८७॥ लिंगरूपस्य देवस्य यो धनं हरते नरः । स च रौरवमासाद्या हरणात्कीटतां व्रजेत् ॥८८॥ दातुः पूजां च लिंगार्थे हरेश्चाप्याददाति यः । कुलकोटिसहस्रेण नरकान्न निवर्तते ॥८९॥ जलपुष्पादिदीपार्थे वसुचान्यद्दृहीतवान् । पश्चान्न दीयते लोभादक्षयं नरकं व्रजेत् ॥९०॥ दासीं हत्वा तु लिंगस्य नरकान्न निवर्तते । कामार्तो मातरं गच्छेन्न गच्छेच्छिवचेटिकाम्॥९१॥ वाला पृथिवी पर उत्पन्न होकर धनेश्वर होता है । उसीतरह भृत्य दान करने वाला स्वर्गलोक में अनेक भृत्यों वाला होता है ॥७७॥ उसकी पृथिवी पर प्रत्येक जन्म में अक्षय समृद्धि होती है । देवताओं को हर प्रकार का वाद्य दान करने वाला मनुष्य लोकविख्यात गुणवान् होता है ॥७८॥ नृत्य गीत आदि शास्त्रों का दान करने वाला गन्धर्व का स्वामी होता है । स्वर्ग में दासी, दास, धन तथा श्रेष्ठ स्त्रियों से सम्पन्न होता है ॥७९॥। उसीतरह गौ प्रदान करने वाला उतने ही समय तक स्वर्गलोक में निवास करता है । शिवलिङ्ग पर दुग्धाभिषेक करने वाला मनुष्य एक कल्प तक स्वर्गलोक में निवास करता है ॥८०॥ शिवलिङ्ग का दधि से अभिषेक करने वाला उसके दो गुना (दो कल्प तक) स्वर्गलोक में निवास करता है । तथा घृताभिषेक करने वाला सौ गुना (सौ कल्प तक) स्वर्ग में निवास करता है । षड्रस से युक्त अन्नदान करने वाला पृथिवी का स्वामी होता है । उसीतरह पायस (खीर) का दान करने वाला श्रेष्ठ मुनि होता है । प्रसन्नता पूर्वक हविष्य दान करने वाला वेदशास्त्र में पारङ्गत होता है ॥८ २॥ निरामिष (शाकाहारी) अन्न दान करने वाला ब्रती ब्रह्मचारी होता है । मधु (शहद) गुड तथा नमक दान करने वाला सौभाग्य प्राप्त करता है॥८३॥ चीनी आदि दान करने से लोक विख्यात सौन्दर्य होता है । देवताओं तथा शिवलिङ्गों की सविधि अर्चना करके ॥८४॥ मनुष्य क्रमशः स्वर्ग आदि लोकों का स्वामी होता है ।संसारी जीवों का कल्याण करने के लिए देवता उसके सामने रहते हैं ॥८५॥ शम्भु लिङ्ग की एक बार प्रदक्षिणा करके ज्ञानी मनुष्य देवताओं के सौ वर्ष तक स्वर्ग में निवास करता है । इसीतरह क्रमश: शङ्करजी को नित्य नमस्कार करने वाला लोकवंद्य होकर स्वर्ग में जाता है । अतएव प्रतिदिन शङ्करजी को नमस्कार करे ॥८६-८७॥ लिङ्ग स्वरूप देवता का जो धन चुराता है वह पहले रौरव नरक में जाता है उसके बाद कीड़ा होता है ॥८८॥ दान के द्वारा शिवलिङ्ग की पूजा के लिए दी गयी वस्तु से जो पूजा नहीं करता है । उसके करोड़ो वंशज नरक में चले जाते हैं और फिर नरक में ही पड़े रहते हैं ॥८९॥ दूसरे द्वारा जल, पुष्प तथा दीप के लिए दिए गये धन लेकर जो लोभ के कारण उसे ले लेता है किन्तु वह देवता को समर्पित नहीं करता है वह अक्षय नरक में जाता है ॥९०॥ शिव लिङ्ग की दासी का हरण करने वाले का नरक से कभी उद्धार नहीं होता है ।कामार्त व्यक्ति अपनी माता के साथ भले ही सङ्गम कर ले किन्तु शिवदासी के साथ सङ्गम
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