Srishti Khanda Extracted Page 768
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-768
Sanskrit Original
स्तात्वाश्वत्थं स्पृशेद्यस्तु सर्वपापैः प्रमुच्यते । अस्नातो यः स्पृशेन्मर्त्यो लभते स्नानजं फलम् ॥१४॥ दृष्ट्वा च नाशयेत्पापं स्पृष्ट्वा लक्ष्मीं प्रपद्यते । प्रदक्षिणे भवेदायुः सदाश्वत्थ नमोस्तुते॥९१५॥ चलद्दलाय वृक्षाय सदाविष्णुस्थिताय च । बोधिसत्वाय योग्याय सदाश्चत्थ नमोस्तुते ॥१६॥ अश्वत्थाय तु हव्यं तु पयोभैवेद्यमेव च । पुष्पं धूपं दीपकं च दत्वा स्वर्गान्न हीयते ॥१७॥ स पुत्रं चाक्षयं विद्धि धनवृद्धियशस्करम्। विजयं मानदं भद्रमश्चत्थस्य प्रपूजनम् ॥१८॥ यज्जप्तं च हुतं स्तोत्रं यन्त्रमंत्रादिकं च यत् । सर्व कोटिगुणं प्रोक्तं मूले चलदलस्य च॑॥१९॥ यस्य मूले स्थितो विष्णुर्मध्येतिष्ठति शङ्करः । अग्रभागेस्थितो ब्रह्मा कस्तं जगति नार्चयेत्॥२०॥ सोमवारे त्वमायां च स्नानं यन्मौनिना कृतम् । दानस्य गोसहस्रस्य फलं चाश्वत्थवंदने॥२१॥ सप्त प्रदक्षिणेनैव गवामयुतजं फलम् । प्रचुराल्लक्षकोटिश्च तस्मात्कार्या हि सा सदा ॥२२॥ यत्किचिद्दीयते तत्र फलमूलजलादिकम् । सर्व तच्चाक्षयफलं जन्मजन्मसु जायते ॥२३॥ अहोश्वत्थसमो नास्ति वृक्षरूपी हरिर्भुवि । यथापूज्यो द्विजो लोके यथा गावो यथामराः ॥२४॥ तथाश्वत्थवृक्षरूपी देवः पूज्यतमः स्मृतः । रोपणे रक्षणे स्पर्शे पूजाकर्मणि वै सदा॥२५॥ ददाति वित्तं पुत्रांश्च स्वर्ग मोक्षं पुनः क्रमात्। किंचिच्छेदं तु यः कुयदश्वत्थस्य तनौ नरः ॥२६॥ कल्पैकं निरयं भुक्त्वाचांडालादौ प्रजायते। मूलच्छेदेन तस्यैव स च यात्यपुनर्भवम् ॥२७॥ पुरुषास्तस्य तिष्ठंति रौरवे घोरदर्शने। अश्वत्थस्यैकवृक्षस्य रोपणे यत्फलं भवेत् ॥२८॥ में जाता है । ब्राह्मणों अश्वत्थ वृक्ष की पूजा करने से होने वाले फल को मैं बतलाता हूँ । बिना स्नान किए ही जो व्यक्ति अश्वत्य वृक्ष का स्पर्श करता है, वह स्नान करने का फल प्राप्त करता है ॥१२-१४॥ अश्वत्थ वृक्ष का दर्शन करने से पापों का नाश होता है, स्पर्श करने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है, प्रदक्षिणा करने से आयु की प्राप्ति होती है, हे अश्वत्थ वृक्ष आपको सदैव नमस्कार है ॥१५॥ जिसके पत्ते सदा हिलते रहते है, ऐसे वृक्ष जिसमें सदा भगवान् विष्णु का निवास होता है, बोधिसत्त्व नाम के योग्य अश्वत्थ वृक्ष आपको नमस्कार है ॥१६॥ जो मनुष्य अश्वत्थ वृक्ष को हविष्य, नैवेद्य, पुष्प, धूप और दीप प्रदान करता है, वह कभी भी स्वर्ग से पतित नहीं होता है ॥१७॥ उसको पुत्र रहित अक्षय जानो । उसके पूजन से, धन की वृद्धि होती है, यश बढता है, विजय, मान सम्मान मिलता है तथा कल्याण की प्राप्ति होती है ॥१८॥ पीपल के वृक्ष के नीचे बैठकर किया गया जप, होम, स्तोत्रपाठ, यन्त्र, मन्त्र इत्यादि सबके सब करोड़ गुणा होता है ॥१९॥ जिस पीपल के मूल में भगवान् विष्णु का, मध्य में शङ्करजी का, और ऊपर की ओर ब्रह्माजी का निवास होता है उस पीपल की पूजा कोन नहीं करेगा ॥२०॥ सोमवारी अमावस्या के दिन मौन होकर स्नान करके हजार गायो का दान करने का जो फल होता है, वही फल अश्वत्थ वृक्ष की वन्दना से प्राप्त होता है ॥२१॥ पीपल वृक्ष की सात प्रदक्षिणा करने से दश हजार गायों के दान का फल प्राप्त होता है । उससे अधिक प्रदक्षिणा करने से लाख करोड़ गोदान का फल मिलता है । अतएव पीपल के वृक्ष की प्रदक्षिणा सदैव करनी चाहिए ॥२२॥ पीपल वृक्ष के ऊपर फल, मूल तथा जल आदि जो कुछ भी चढाया जाता है उसका प्रत्येक जन्मों में अक्षय फल मिलता है ॥२३॥ अश्वत्थ वृक्ष के समान संसार में कोई भी वृक्ष रूपी श्रीहरि नहीं है । जिसरह संसार में ब्राह्मण पूज्य है, गायें पुज्य हैं, देवता पूज्य हैं ॥२४।। उसीतरह अश्वत्थ वृक्ष रूपी देव भी पूज्यातम हैं । अश्वत्थ रोपने, रक्षा करने, स्पर्श करने तथा पूजा करने से सदैव ।।२५॥ वित्त, पुत्र, स्वर्ग तथा मोक्ष क्रमश: प्रदान करते हैं। जो व्यक्ति पीपल वृक्ष को थोड़ा सा भी काटता है ॥२६॥ वह एक कल्प तक नरक भोगकर चाण्डाल आदि योनियों में जन्म लेता है । जो पीपल वृक्ष को जड़ से काटता है उसका तो कभी जन्म ही नहीं होता है ॥२७॥ उसके पूर्वज घोर
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