Srishti Khanda Extracted Page 761
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-761
Sanskrit Original
सर्वमंगलदे देवि क्षेमंकरि नमोस्तुते । योगिनी साम्यं तेनैव संमुखाविमुखापि वा॥१५॥ दृष्ट्वा तां नाभिवंदेद्यस्तस्य युद्धे पराजयः । राजगृहेषु विद्यायां नमस्काराज्जयो भवेत् ॥१६॥ एवं कामस्य माहात्म्यं भवो मोहवशं गतः। अयं देवासुराणां च क्षमयां प्रभुतां गतः ॥१७॥ अस्यैव सदृशो लोके न भूतो न भविष्यति । रामामङ्कस्थितां रम्यां क्षमातल्पगतेन च ॥१८॥ त्यक्त्वैव साधिता लोकास्सुरासुरसुदुर्लभाः । एवं वैष्णवमुख्यश्च सुरासुरगणार्चितः ॥१९॥ यो नो ददातिभुक्त्याप्र्यं शेषं च स्वयमश्नुते । एवमभ्यास धैर्येण दीर्घकाले सुखं गते॥२०॥ प्राक्संगमात्स्वभार्या च दृष्ट्वा मां प्रददौ मुदा । द्वादशाब्दं प्रसंकल्प्य प्रागभोगो मयि वेशितः ॥२९॥ तेन तस्य गृहे नित्यं तिष्ठामि गृहरक्षणात्। तथा धात्री फलस्यापि सदा स्वरसमीहते ॥२२॥ तस्मादुक्तो मयान्येषां वैष्णवानां चवैष्णवः । पुरा ये विप्र मे भक्ता स्सुरा मत्पथगामिनः ॥२३॥ तैरेव न कृतं यच्च तदनेन कृतं परम् । तस्माद्वैष्णवसर्वस्वं नाम रम्यं मया कृतम् ॥२४॥ अस्य वेश्मनि तिष्ठामि मुहूर्त न चलाम्यहम् । अतो ये चैव मद्भक्तास्तेष्वहं सुलभो द्विज ॥२५॥ अस्माकं पदवी तेभ्यो हाद्य दद्िस्वकारणम् । आवयोर्विप्रसौजन्यं स्वप्रभोज्यादिकं समम्॥२६॥ सायुज्यं च सखित्वं च पश्यभूदेवनांतरम् । ततो मूकादयः सर्वे स्वागता हरिमीश्वरम् ॥२७॥ गंतुकामा दिवं पुण्यास्सदाराः सपरिच्छदाः । ये च तेषां गृहाभ्याशेप्यात्मनो गृहगोधिकाः ॥२८॥ नानाकीटादयो ये च तेषामनुययुः सुराः । देखकर प्रार्थना करना चाहिए । हे कुंकुम के समान रक्तवर्ण के सभी अङ्गो वाली तथा कुन्द एवं इन्दु के समान श्वेतमुख वाली ॥१४॥ सभी मङ्गलों को करने वाली देवेशि, क्षेमङ्करि आपको नमस्कार है । योगिनी के समान वह सामने हो या विमुख हो ॥१५॥ उसको देखकर जो उसे नमस्कार नहीं करता है उसका युद्ध में पराजय होता है । राजगृहों तथा विद्या में क्षेमङ्करी को नमसकार करने से विजय होता है ॥१६॥ इसतरह से काम की महिमा होने के कारण शङ्करजी उसके पराधीन हो गये । देवताओं और असुरों के क्षमा कर देने के कारण वे प्रभुत्व को प्राप्त कर लिए । कामदेव के समान न तो कोई प्रभावशाली हुआ और न होगा । अपनी-गोद में स्थित, शय्या पर सोयी हुयी रमणी का परित्याग करके इसने ने समस्त लोकों को जीत लिया है । इसीलिए श्रीवैष्णव आदि ये पाँचो देवताओं और असुरों से पूजित हैं ॥१७-१९॥ जो श्रेष्ठ भोगों को मुझे प्रदान करता है और मेरे प्रसाद को स्वयं खाता हैं । इसतरह के अभ्यास और धैर्य के कारण दीर्घकाल तक सुख प्राप्त होने पर ॥२०॥ उसने पूर्व सम्बन्ध के कारण मुझको देखकर मुझे अपनी पत्नी को बारह वर्ष के लिए सङ्कल्प करके मुझे प्रदान कर दिया ॥२१॥ इसीलिए उसके (श्रीवैष्णव के) घर की रक्षा करने के लिए मैं उनके घर में रहता हूँ । वह धात्री फल के स्वरस को प्राप्त करना चाहता है ॥२२॥ इसीलिए मैंने उसे सभी वैष्णवों में उत्तम वैष्णव कहा । हे विप्र ! पहले जो मेरे भक्त तथा देवतामेरे मार्ग पर चलने वाले हैं ॥२३॥ वे सब जिस कार्य को नहीं कर सके उस कार्य को इन सबों ने (पाञ्ों ने) किया है । इसीलिए इसका मनोहर नाम मैंने वैष्णव सर्वस्व रखा ॥२४॥ इसके घर में मैं सदैव रहता हूँ, मुहूर्त भर के लिए भी कहीं नहीं जाता हूँ । अतएव जो मेरे भक्त हैं उनको मैं सुलभ हूँ ॥२५॥ अपने ही कारण मैं उन सबों को मैं अपनी पदवी प्रदान करता हूँ । हे विप्र ! हमदोनों का सौजन्य, स्वप्न तथा भोज्य पदार्थ आदि एक समान है॥२६॥ हे भूदेव ! सायुज्य तथा सत्त्विकता में समानता है दोनों में कोई भी अन्तर नहीं है । उसके बाद मूक. आदि सभी स्वयं ही श्रीहरि के समीप आ गये ॥२७॥ वे अपनी पत्नियों तथा परिच्छदो के साथ जाना चाहते थे । उन सबों
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