Srishti Khanda Extracted Page 730
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-730
Sanskrit Original
साध्व्युवाच उन्मनास्त्वं कथं नाथ नि: श्वासस्ते कथं विभो ॥९२॥ ब्रूहि मे यच्चकर्तव्यमकर्तव्यं च यत्प्रियम्। दयितं ते करिष्यामि त्वमेको मे गुरुः प्रियः ॥१३॥ अभीष्टं वद् मे नाथ यथाशक्ति करोम्यहम्। भगवानुवाच इत्युक्ते तामुवाचेदं वृथा कि भाषसे प्रिये ॥९४॥ न शक्ता त्वं न चैवाहं मोधं वक्तु न युज्यते । प्रष्टुं नाधिकरोषीति यथादीर्घतरोः फलम् ॥१५॥ भूमौ स्थित्वा तु खर्वात्मा समुद्धर्तृ प्रवाञ्छति। तथा मे रमणी लोभान्मोहाद्यदभिवांछितम् ॥१६॥ दंपत्योरपि दुःसाध्यमपयानं वदाम्यहम्। पतिब्रतोवाच ज्ञात्वा तु त्वन्मनोवृत्तं शक्ताहं कार्यसाधने ॥९७॥ आदेशं कुरु मे नाथ कर्तव्यं येन केनचित्। यदि ते दुर्लभं कार्य कर्तु शक्रोमि यत्नत: ॥९८॥ तदा मे त्वतिकल्याणं फलिष्यति परेत्विह । इत्युक्ते परमः. प्रीतः स्थितो वचनमब्रवीत् ॥९९॥ पापाभ्यासाच्च पाप्मानं पृच्छतीति विनिश्चयः । कुष्ठ्युवाच पथ्यस्मिन्संप्रगच्छती वेश्यां परमसुंदरीम् ॥२०॥ सर्वतश्चानवद्यांगीं दृष्ट्वा मे दह्यते मनः । यदि तां त्वत्प्रासादाच्च प्राप्रोमि नवयौवनाम् ॥२९॥ तदा मे सफलं जन्म कुरु साथ्वि हितं मम । यदि मां कुष्ठिनं दीनं पूतिगंधं नवव्रणम्॥२२॥ न गच्छति वरारोहा तदा मे निधनं हितम् । आप उदास क्यों हैं ? आप लम्बी श्वास क्यों ले रहे हैं । आपका प्रिय चाहे कर्तव्य हो या अकर्तव्य हो, उसे आप मुझे बतलाइये, आपके प्रिय कार्य को मै करूंगी, केवल आप ही मेरे प्रिय गुरु हैं ॥१३॥ हे नाथ ! आपको जो अभीष्ट हो उसे मुझे बतलाइये उसे मैं करूंगी । श्रीभगवान् ने कहा-- इस तरह से कहने पर उसने कहा-- हे प्रिये! व्यर्थ क्यों बोलती हो 2॥१४॥ उसे न तो तुम कर सकती हो और न तो में कर सकता हूँ, व्यर्थ बोलना ठीक नहीं है । उसके विषय में पूछना ठीक नहीं । जैसे ऊंचे वृक्ष के फल को ॥१५॥ कोई बौना तोड़ लेना चाहे उसी तरह आज मेरा मन लोभवशात् किसी रमणी को प्राप्त करना चाहता है ॥१६॥ वह हमदोनों के लिए दुःसाध्य है, अतएव उसको कहना व्यर्थ है । पतिब्रता ने कहा--- आपके मन की वृति को जानकर में उसे पूरा कर सकती हुँ ।।१७॥। हे नाथ ! आप आदेश दें और मैं उसे किसी भी प्रकार से करूंगी ॥१८॥ यदि में आपके दुर्लभ कार्य को प्रयत्नपूर्वक कर सकूँगी ॥१८॥ तो वह मेरे लिए परलोक में अत्यन्त कल्याणकारी होगा । भगवान् ने कहा-- इसतरह से अत्यन्त प्रसन्न होकर कोढी पति ने कहा-- क्योंकि पाप करने के अभ्यास के कारण पापी पाप को ही करना चाहता है । इस मार्ग से जाती हुयी परम सुन्दरी वेश्या को मैंने देखा ॥१९-२०॥ उसके सारे अङ्ग निर्दोष हैं, उसको देखकर मेरा मन उसे प्राप्त करना चाहता है । यदि में तुम्हारी कृपा से उस नवयौवना को प्राप्त कर लूँ ॥२१॥ तो मेरा जन्म सफल हो जाय, अतएव हे साध्वि ! तुम मेरा कल्याण करो । यदि वह, दीन, दुर्गधि युक्त, नवीन घावों वाले कोढी मुझको ॥२२॥ नही मिलती है तो निश्चित है कि मैं मर जाऊंगा । श्रीभगवान् ने कहा--
No translation available yet.
Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know