Srishti Khanda Extracted Page 724

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-724

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Sanskrit Original

गृहस्याभ्यंतरे यस्य प्राणत्यागो भवेद् ध्रुवम्। यावद्वंथिगुहितिष्ठेत्तावद्दंधो भवेत्तनौ ॥२४८॥ हायने हायने चापि एकैकं परिहीयते। पश्यतां पुत्रबंधूनां बंधने नास्ति निष्कृति:॥२४९॥ पर्वते कानने दुर्गे स्थाने वा जलवर्जिते । मृतो दुर्गतिमाप्रोति कीटादौ जायते पुनः ॥२५०॥ संस्कारश्च भवेद्यस्य मृतस्य परवासरे । पष्टिर्वर्षसहस्राणि कुंभीपाके प्रतिष्ठति॥२५१॥ अस्पृश्यस्पर्शनादेव उच्छिष्टः पतितो मृतः । सुचिरं नरकेस्थित्वा म्लेच्छजातिषु जायते ॥२५२॥ तथैवबहुकीटेषु जायते सत्त्वजातिषु। तस्मान्न चिरकालेषु जानीयात्पुण्यपातकम् ॥२५३॥ पुण्यात्पुण्यप्रयोगैश्च सर्वेषां मर्त्यवासिनाम्। मरणे या गतिः पुंसां गतिर्भवति तादृशम् ॥२५४॥ पुण्यतीर्थे मृतो यस्तु विष्णोर्नामानि चिंतयन् । पापात्पूतो ब्रजेत्स्वर्ग सर्वैदोषैर्न लिप्यते ॥२५५॥ पितुर्मृतस्य देहं तु वहेद्यस्तु सुतो बली । पदे पदेऽश्वमेधस्य फलं प्रराप्रोत्यसंशयम्॥२५६॥ प्राक् चितौ च पितुर्देहे मुखाम्निं कारयेत्सुतः । विधिना मंत्रपूतेन पश्चाद्देहं दहेत्पुनः ॥२५७॥ लोभमोहसमायुक्तं पापपुण्यसमावृतम् । दहेयं सर्वगात्राणि दिव्यान् लोकान्स गच्छतु ॥२५८॥ दग्ध्वा च लंघयेत्पुत्रोप्यस्थिसंचयनं प्रति । दशाहे समनुप्राप्ते चार्द्रवस्त्र॑ परित्यजेत् ॥२५९॥ छित्वा च लोहितं चेलं वह्नौ चाथ जले क्षिपेत्। ततश्चैकादशाहे च श्राद्धं कुर्याद्विचक्षणः ॥२६०॥ प्रेतस्य देहपुष्ट्यर्थ ब्राह्मणैकं तु भोजयेत् । दानं दद्याच्च विधिवद्दसत्रं पीठं च पादुकाम् ॥२६९॥ है ॥२४६॥ हे द्विजोत्तम ! उसका ही (लौहित्य तीर्थ का ही) फल उर्वशी केश नामक पवित्र तीर्थ में मरकर उत्पन्न होने वाला प्राप्त करता है और वह सभी दोषों से मुक्त हो जाता है ॥२४७॥ जो व्यक्ति घर के भीतर रहकर अपने प्राणों का त्याग करता है, उस घर में जितनी ग्रंथियाँ होती है, उतनी ग्रंथियाँ उसके शरीर में बँध जाती हैं।॥२४८॥ एक-एक वर्ष में उसकी एक-एक ग्रंथि खुलती है । उसके पुत्र और बंधु उसे देखते रह जाते हैं, वे उस ग्रंथि को खोल नहीं सकते हैं ॥२४९॥ पर्वतपर, जङ्गल में, या दुर्गम स्थान में अथवा जलरहित स्थान में मरने वाला दुर्गतिक होता है और उसके बाद उसका जन्म कीट आदि योनियों में होता है ॥२५०॥ जिस मरे हुए व्यक्ति का दाह संस्कार मृत्यु के दूसरे दिन होता है, वह कुम्भीपाक नामक नरक में साठ हजार वर्ष तक पड़ा रहता है ॥२५१॥ जो अस्पृश्य का स्पर्श करके अथवा जूठे पर या पतितावस्था में मरता है, वही दीर्घ काल तक नरक में रहकर म्लेच्छ आदि जातियों में जन्म लेता है ॥२५२॥ उसी तरह से वह अनेक कीट योनियों में जन्म लेता है, अतएव बहुत समय बाद में पुण्य और पाप को नहीं जानना चाहिए ॥२५३॥ सभी मर्त्यवासियों की पुण्य करने से, पुण्य का प्रयोग करने से मरने पर जिस तरह की बुद्धि होती है उसी तरह की उसकी गति होती है ॥२५४॥। जो व्यक्ति भगवान् विष्णु के नामों का चिन्तन करता हुआ भगवान् विष्णु के पवित्र तीर्थो में प्राण त्याग करता है वह पाप से रहित पुरुष स्वर्गलोक में जाता है वह किसी भी दोष के बन्धन में नहीं बँधता है ॥२५५॥ जो बलवान् पुत्र मरे हुए अपने पिता के शव को अपने कन्धे पर ढोता है वह पग-पग पर अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है ॥२५६॥ पिता के शरीर को चिता पर रखकर उनके मुख में अग्नि देना चाहिए । उसके बाद मन्त्रोच्चारण पूर्वक पिता के शरीर को जलाये॥२५७॥ मन्त्र है लोभमोह ० इत्यादि अर्थात् लोभ और मोह से युक्त तथा पाप एवं पुण्य युक्त शरीर को मैं जला रहा हूँ मेरे पिता दिव्य लोक में चले जायँ ॥२५८॥ शरीर को जलाने के बाद पुत्र को चाहिए कि अस्थि संचय के लिए कुछ दिन प्रतीक्षा करे । उसके बाद दशाह के दिन स्नान करके गीले वस्र का परित्याग कर दे ॥२५८-२५९॥ लाल कपड़े को फाड़कर उसे जल में या आग में डाल दे । उसके बाद बुद्धिमान को चाहिए कि वह एकादशाह के

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