Srishti Khanda Extracted Page 720

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-720

padma-puranasrishti-khandacreation-cosmologypartialpage-extract

Sanskrit Original

तस्मात्तेन सह प्रीत्या तिष्ठामि तस्य मंदिरे । पुनःपुनः कथालापं करोमि द्विजनंदन ॥१९२॥ तस्य वै मानसे नित्यं वर्तेऽहंभूत भावनः। स॒ तज्जानाति त्वद्दत्तं तथा पतिव्रतादयः ॥१९३॥ तेषां वृत्तं वदिष्यामि शृणु त्वं चानुपूर्वशः । यच्छुत्वा सर्वथा मर्त्यो मुच्यते जन्मबंधनात्॥१९४॥ पितुर्मातुः परं तीर्थ देवदेवेषु नैव हि । पित्रोरर्चा कृता येन स एव पुरुषोत्तमः ॥१९५॥ पित्रोराज्ञा च देवस्य गुरोराज्ञा समं फलम् । आराधनाद्विवो राज्यं बाधया रौरवं व्रजेत् ॥१९६॥ स चास्माकं हदिस्थोऽपि तस्याहं हृदये स्थितः । आवयोरंतरं नास्ति परत्रेह च मत्समः ॥१९७॥ मदग्रे मत्पुरे रम्ये सर्वैश्च बांधवैः सह । सभुञ्जीताक्षयं भोगमंते मयि च लीयते॥१९८॥ अतएवहि मूकोऽसौ वार्त्ता त्रैलोक्यसंभवाम् । जानाति नरशार्दूल एष ते विस्मयः कुतः ॥१९९॥ द्विज उवाच मोहादज्ञानतो वापि न कृत्वा पितुरर्चनम् । ज्ञात्वा वा किंच कर्तव्यं सदसज्जगदीश्वर ॥२००॥ दिनैकं मासपक्षौ वा पक्षार्थ वाथवत्सरम् । पित्रोर्भक्तिः कृता येन स च गच्छेन्ममालयम्॥२ ० ९॥ कारयित्वा मनःकष्टमवश्यं नरकं ब्रजेत् । न कृता वा कृता वा स्यात्तपित्रोरर्चा परं पुरा ॥२० २॥ वृषोत्सर्गं नरः कृत्वा पितृभक्ति फलं लभेत् । अन्नं वस्रं तथा गव्यं सामिषं च निरामिषम् ॥२०३॥ सर्वलक्षगुणं प्रोक्तं ज्ञातिभ्यो यत्प्रदीयते । सर्वस्वेन कृतं श्राद्धं येन पुत्रेण धीमता ॥२०४॥ पापियों को जानते हैं ॥१८९-१९०॥ पुण्यवान होने के ही कारण तथा मेरी कृपा के कारण तुमने भी मेरा दर्शन किया है । अपनी माता-पिता की सेवा करने के कारण शुद्ध होकर चाण्डाल देवता बन गया है ।॥१९१॥ इसीलिए मैं उसके साथ उसके घर में प्रेम पूर्वक रहता हूँ, हे द्विजनन्दन ! मैं उसके साथ बार-बार बातें करता हूँ ॥१९२॥ लोक कल्याणकारी मैं सदैव उसके मन में निवास करता हूँ । उसी के कारण वह तुम्हारे वृत्त को जानता है । तथा पतिव्रता इत्यादि भी जानते हें ॥१९३॥ में उन सबों का वृत्त बतलाता हूँ उसे तुम क्रमश: सुनो । उसका श्रवण करने मात्र से मनुष्य जन्म के बन्धन से मुक्त हो जाता है ॥१९४॥ माता-पिता से बढकर कोई तीर्थ नहीं हैं; देवताओं में मी नहीं है । जो पिता की पूजा कर लिया है वही पुरुषोत्तम है ॥१९५॥ पिता की आज्ञा गुरुदेव की आज्ञा के समान फलद होती है । पिता की आज्ञा का पालन करने से स्वर्ग मिलता है और पिता की आज्ञा का उल्लंघन करने से रौरव नरक मिलता है ॥१९६॥ वह हमारे हृदय में विद्यमान रहकर भी, मैं उसके हदय में विद्यमान हूँ । लोक और परलोक में हम दोनों में कोई अन्तर नहीं है वह मेरे ही समान है ॥१८७॥ वह मेरे सामने, मेरे मनोहर लोक में अपने समस्त बान्धवों के साथ अक्षय भोग को भोगता है और अन्त में मुझमें लीन हो जाता है ॥१९८॥ इसीलिए वह मूक त्रैलोक्य में होने वाली बातों को जानता है । हे नरशार्दूल इस विषय में तुम्हें आश्चर्य क्यों है ?॥ १९९॥ द्विज ने कहा-- मोह अथवा अज्ञान के कारण यदि कोई माता-पिता की पूजा न करके अब उसे जानकर मुझे अच्छा या बुरा क्या करना चाहिये 2॥२००॥ श्रीभगवान् ने कहा-- जो व्यक्ति एक दिन, या मासभर या पक्षभर, या आधा पक्ष, या एक वर्ष तक अपने माता-पिता की भक्ति करता है, वह मेरे लोक में जाता है ॥२०१॥ अपने माता-पिता के मन को दुःखी बनाने वाला अवश्य ही नरक में जाता है, जिसने पहले अपने माता-पिता की सेवा किया हो या नहीं किया हो ॥२०२॥ मनुष्य वृषोत्सर्ग करके पिता की भक्ति का फल प्राप्त कर लेता है । अन्न, वस्त्र, गव्य, सामिष या निरामिष ॥२०३॥ ये सभी जो अपने ज्ञाति जनों द्वारा पितरों को दिया जाता है, वह लाख गुना फल देने वाला होता है। जो बुद्धिमान् पुत्र अपना सर्वस्वदान करके श्राद्ध करता है ॥२०४॥ वह जाति स्मरत्व तथा पितृभक्ति के फल को

No translation available yet.

Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know