Srishti Khanda Extracted Page 708

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-708

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Sanskrit Original

हरिरुवाच नदीनां जाह्नवी श्रेष्ठा प्रमदानां पतिव्रता । मनुष्याणां प्रजापालो देवानां च जनार्दन: ॥४९॥ पतिव्रता च या नारीपत्युर्नित्यं हिते रता। कुलद्वयस्य पुरुषानुद्धरेत्सा शतंशतम् ॥५ ०॥ स्वर्ग भुनक्ति तावच्च यावदाभूतसंप्लवम् । स्वर्गाद्वष्टो भवेद्वास्याः सार्वभौमो नृपः पतिः ॥५१॥ अस्यैव महिषी भूत्वा सुखं विंदेदनंतरम् । पुनः पुनः स्वर्गराज्यं तस्य तस्या न संशयः ॥५२॥ एवं जन्मशतं प्राप्य अंते मोक्षो भवेद् श्रुवम्। विप्र उवाच पतिब्रता भवेत्का वा तस्याः किं वा च लक्षणम् ॥५३॥ ब्रूहि मे द्विजशार्दूल यथा जानामि तत्त्वतः। हरिरुवाच पुत्राच्छतगुणं स्नेहाद्राजानं च भयादथ ॥५४॥ आराधयेत्पतिं शौरिं या पश्येत् सा पतिव्रता । कार्ये दासी रतौ वेश्या भोजने जननी समा॥५५॥ विपत्सु मंत्रिणी भर्तुः सा च भार्या पतिव्रता । भर्तुराज्ञां न लंघेद्या मनोवाक्कायकर्मभिः ॥५६॥ भुक्ते पत्यौ सदा चात्ति सा च भार्या पतिव्रता । यस्यां यस्यां तु शय्यायां पतिः स्वपिति यत्नतः ॥५७॥ तत्र तत्र च सा भर्तुरर्चा करोति नित्यशः। नैव मत्सरमायाति न कार्पण्यं न मानिनी ॥५८॥ मानेऽमाने समानं च या पश्येत्सा पतिब्रता । सुवेषं या नरं दृष्टवा भ्रातरं पितरं सुतम् ॥५९॥ मन्यते च परं साध्वी सा च भार्या पतिव्रता । तां गच्छ द्विजशार्दूल वद कामं यथा तव॥६०॥ है और देवताओं में भगवान् जनार्दन श्रेष्ठ हैं ॥४९॥। जो नारी पतिव्रता होती है, वह सदा पति का कल्याण करती रहती है । वह अपने पिता तथा पति दोनों कुलों के सौ पीढी के पूर्वजों का उद्धार कर देती है ॥५०। वह प्रलयकाल पर्यन्त स्वर्ग का भोग भोगती हैं" जब उसका पति स्वर्ग से गिरता है तो वह सार्वभौम राजा होता है ॥५१॥ वह उसी की पटरानी होकर सुख को प्राप्त करती है । उसको तथा उसके पति को बार-बार स्वर्ग का राज्य प्राप्त होता हे॥५२॥ इस तरह सौ जन्म प्राप्त करने के बाद उसकी मुक्ति हो जाती है । विप्र ने कहा-- कौन सी नारी पतिव्रता होती है ? उसका लक्षण क्या होता है ? हे द्विजश्रेष्ठ मुझे आप इन सारी बातों को बतायें जिससे कि मैं उसे तत्त्वत: जान सकूँ । श्रीहरि ने कहा-- जो पुत्र की अपेक्षा पति से सौ गुना स्नेह करती हो, वह राजा से भी अधिक अपने पति से डरती हो ॥५३-५४॥ तथा पति को भगवान् का रूप समझकर उसकी आराधना करती हो, वही प्रतिव्रता है। वह दासी के समान पति के कर्मों को करती है तथा रतिकाल में वेश्या के समान व्यवहार करती है तथा माता के समान वह पति को भोजन कराती है ॥५५॥ विपत्ति में पति को सलाह देती है, ऐसी ही पत्नी पतिव्रता है । जो मन, वाणी तथा शरीर से कभी भी पति की आज्ञा का उल्लंघन नहीं करते है ॥५६॥ पति के भोजन कर लेने पर ही भोजन करती है, ऐसी पत्नी पतिव्रता होती है । जिस-जिस शय्या पर पति सोते हैं ॥५७॥ वहाँ जाकर पति की पूजा करती है, वह पति से न तो इर्ष्या करती है, न तो कृपणता करती हौ और न तो मान करती है ॥५८॥ पति के द्वार किए जाने वाले मान तथा अपमान को जो एक समान मानती है, वही पत्नी पतित्रता होती है । वह सुन्दर वेष धारण किए पुरुष को देखकर उसे भाई, पिता और पुत्र मानती हैं ॥५९॥ वही स्त्री पतिव्रता है । हे द्विजश्रेष्ठ ! उसके पास जाइये और उससे अपने कल्याण की बातें पूछिये ॥६०॥ उसकी कई सौते हैं, उन सबों में वह सुन्दरी रूप एवं

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