Srishti Khanda Extracted Page 703
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-703
Sanskrit Original
नकुर्वीत ततः स्वप्नं शस्तंच पूर्वदक्षिणम् । आयुष्यं प्राङ्मुखो भुंक्ते यशस्यं दक्षिणामुख:॥१२५॥ श्रियंप्रत्यङ्मुखोभुंक्ते यशोभुङ्कः उदङ्मुखः । प्राच्यां नरो लभेदायु र याम्यांप्रेतत्वमश्नुते ॥९२६॥ वारुणे च भवेद्रोगी आयुर्वित्तं तथोत्तरे । देवानामेकभुक्तं तु द्विभुक्तंस्यान्नरस्य च ॥१२७॥ त्रिभुक्तं प्रेतदैत्यस्य चतुर्थं कौणपस्य तु । निरामिषं हविर्देवा मत्स्यमांसादिमानुषाः ॥१२८॥ पूतिपर्युषितं दुष्टमन्ये भुंजंत्यनावृताः स्वर्गस्थितानामिहजीवलोके चत्वारि तेषां हृदये च संति ॥१२९॥ दानंप्रशस्तं मधुरा च वाणी देवार्चनं ब्राह्मणतर्पणं च । कार्पण्यवृत्तिः स्वजनेषु निंदा कुचेलता नीचजनेषु भक्तिः ॥१३०॥ अतीवरोषः कटुका च वाणी नरस्य चिह्वं नरंकागतस्य । नवनीतोपमा वाणी करुणाकोमलं मनः ॥१३१॥ धर्मबीजप्रसूतानामेतत्प्रत्यक्षलक्षणम् । दयादरिक्र्यहदयं वचःक्रकचकर्कशम्॥९३२॥ पापबीजप्रसूतानामेतत्प्रत्यक्षलक्षणम् । श्रावयेच्छृणुयाद्वापि सदाचारादिकं नरः ॥१३३॥ आचारादेः फलं लब्ध्वा पापात्पूतोऽ च्युतो दिवि ॥१३४॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे सदाचारवर्णनं नामैकोनपञ्चाशोऽध्यायः ॥४९॥ re आयु क्षीण होती है तथा मनुष्य ब्रह्मघाती होता है ॥१२४॥ अतएव पूर्व और दक्षिण की ओर ही शिर करके सोना चाहिए । पूर्व की ओर मुख करके भोजन करने से आयु बढती है । दक्षिण की ओर मुख करके भोजन करने से यश बढता है ॥१२५॥ पश्चिम की ओर मुख करके भोजन करने से लक्ष्मी बढती हैं और उत्तर की ओर मुख करके भोजन करने से यश बढता है । पूर्व की ओर मुख करके भोजन करने से आयु बढती है, दक्षिण की ओर मुख करके खाने से मृत्यु की प्राप्ति होती है ॥१२६॥ पश्चिम की ओर मुख करके खाने से रोग बढता है और उत्तर की ओर मुख करके भोजन करने से आयु और धन बढता है । एक बार भोजन करना देव भोजन है, दो बार भोजन मनुष्य करते हैं ॥१२७॥ तीन बार भोजन प्रेतों और दैत्यों का होता है और चार बार भोजन राक्षसों का होता है । मांस रहित देवताओं का भोजन है । मत्स्य एवं मांस का भोजन मानुष भोजन है ॥१२८॥ वासी और पूति (लस लसाहट जिसमें आ गया हो) ऐसा भोजन नग्नों का होता है । स्वर्ग से इस संसार में आये हुओं के चार लक्षण होते हैं प्रशस्त दान देना, मधुर वाणी बोलना, देवताओं की पूजा करना और ब्राह्मणों को तृप्त करना । कृपणता, अपने लोगों की निन्दा करना, फटे चिथड़े कपड़ा पहनना और नीच जनों की सेवा करना ॥१३०॥ अत्यन्त क्रोध करना, कठोर वाणी बोलना, ये सभी चिह्न नरक से आये हुए मनुष्यों के हैं । नवनीत के समान कोमल वाणी तथा करुणापूर्ण कोमल मन ॥१३१॥ ये सभी धर्म बीज से उत्पन्न मनुष्यों के प्रत्यक्ष लक्षण हैं । इसी तरह हृदय का दयाहीन होना अत्यन्त कर्कश वाणी ॥१३२॥ यह पाप बीज से उत्पन्न जीवों का लक्षण है ।मनुष्य को इस सदाचार के लक्षण को सुनना चाहिए तथा दूसरों को सुनाना चाहिए ॥१३.३॥ ऐसा करने वाला मनुष्य आचार आदि के फल को प्राप्त करके स्वर्गलोक में जाता है ।।१३४॥ इस तरह श्रीपद्ममहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के सदाचार वर्णन नामक उनचासवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।। ४९।। —— ie
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