Srishti Khanda Extracted Page 702
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-702
Sanskrit Original
न तिष्ठेच्च क्षणं धीरो दीपच्छाये कलिद्रुमे। अस्पृश्यैस्सह चालापं पतितैः कुपितैः सह ॥९९०॥ न कुर्यात् क्षणमात्रं तु कृत्वा गच्छेच्च रौरवम् । कनिष्ठं नाभिवंदेत पितृव्यं मातुलं तथा ॥१११॥ उत्थाय चासनं दद्यात्कृतांजल्यग्रतः स्थितः । तैलाभ्यक्तं तथोच्छिष्टमार्द्र॑वस्त्रं च रोगिणम् ॥१९२॥ पारावारगतोद्विग्ं वहंतं नाभिवादयेत् । यज्ञस्यांतर्गतं नष्टं क्रीडंतं स्त्रीजनैः सह ॥१९३॥ बालक्रीडागतं चापि पुष्पयुक्तं कुशैर्युतम् । शिरः प्रावृत्य कर्णौ वा अप्सु मुक्तशिखोपि वा॥९१४॥ अकृत्वा पादयोः पूजां नाचामेद्दक्षिणामुखः । उपवीतविहीनश्च नग्रको मुक्तकच्छकः ॥९९५॥ एकवस्त्रपिधानश्च आचांतो नैव शुध्यति । मध्यमाभि मुखं पूर्व तिसृभिः समुपस्पृशेत् ॥११६॥ अंगुष्ठदेशिनीभ्यां च नासां च तदनंतरम् । अंगुष्ठानामिकाभ्यां च चक्षुषी समुपस्पृशेत् ॥११७॥ कनिष्ठांगुष्ठतश्श्रोत्रे नाभिमंगुष्ठकेन तु । तलेनहृदयं न्यस्य सर्वाभिमस्तकोपरि ॥११८॥ बाहू चाग्रेण संस्पृश्य ततःशुद्धोभवेन्नरः । अनेनाचमनं कृत्वा मानवः प्रयतो भवेत् ॥११९॥ सर्वपापैर्विनिर्मुक्तः स्वर्ग चाक्षयमश्चुते। प्राणास्त्रिपुट शृग्याच व्यानोपानश्रमुद्रया ॥१२०॥ समानस्तु समस्ताभि रूदानस्तर्जनींविना। नागः कूर्मश्च कृकरो देवदत्तो धनंजयः ॥१२१॥ उपप्रीणन्तु ते प्रीता येभ्यो भूमौ प्रदीयते । शयनं चार्द्रपादेन शुष्कपादेन भोजनम् ॥९२२॥ नांधकारे च शयनं भोजनं नैव कारयेत् | पश्चिमे दक्षिणे चैव नकुर्याद्दंतधावनम् ॥९२३॥ उत्तरे पश्चिमे चैव न स्वपेद्धि कदाचन। स्वप्रादायुः क्षयं याति ब्रह्महा पुरुषो भवेत् ॥९२४॥ साथ न क्षण भर भी ठहरे और न उनके साथ चले ॥१०९॥ ज्ञानी पुरुष कभी दीपक की छाया में तथा बहेड़े के वृक्ष के नीचे न रुके । वह अछूतों, पतितों, क्रोधियों के साथ ॥११०॥ क्षणभर भी बातें न करे, इनके साथ बातें करने वाला गौरव नरक में जाता है । अपने से छोटे उम्र वाले चाचा और मामा को प्रणाम न करे ॥१११॥ खड़ा होकर तथा उनके सामने हाथ जोड़कर उन्हें आसन प्रदान कर दे । तेल लगाये हुए, जूठे मुह, गीले वस्त्र पहने और रोगी, समुद्र में गये हुए, उद्विग्न तथा बोझ ढोने वाले को प्रणाम न करे ।यज्ञ कार्य करने वाले, स्त्रियों के साथ क्रीडा करने वाले ॥११२-११३॥ बालकों से क्रीडा करने वाले, फूल तथा कुश लिए हुए ऐसे व्यक्ति को प्रणाम न करे । मस्तक अथवा कानो को ढँककर, जल में खड़ा होकर, शिखा खोलकर, पैरों को बिना धोए हुए तथा दक्षिणाभिख आचमन न करे । यज्ञोपवित से रहित, नङ्गा होकर अथवा पछोटा खोले हुए ॥११४-११५। एक वस्त्र को धारण करके आचमन करने वाला शुद्ध नहीं होता है । पहले तर्जनी, मध्यमा और अनामिका इन तीन अङ्गुलियों से मुख का स्पर्श करे ॥११६॥ उसके बाद अङ्गूठे एवं तर्जनी से नासिका का स्पर्श करे । फिर अङ्गुठे से दोनों कानों का स्पर्श करे और नाभि का अङ्गूठे से स्पर्श करे । हथेली से हृदय का न्यास करके पाँचो अङ्गुलियों से मस्तक पर न्यास करे।। ११८॥ दोनों भुजाओं को अङ्गुलियों के अग्र भाग से स्पर्श करके मनुष्य शुद्ध हो जाता है । इसके द्वार आचमन करके मनुष्य सावधान हो जाय ॥११९॥ ऐसा करने वाला सभी पापों से मुक्त होकर अक्षय स्वर्ग को प्राप्त करता है। प्राण का त्रिपुट शृंगी मुद्रा से प्राण और व्यान तथा अपानका भी उसी मुद्रा से ॥१२०॥ समान का सभी अङ्गुलियों से तथा उदान का बिना तर्जनी अङ्गुलि के ही स्पर्श करे । नाग, कूर्म, कृकर, देवदत्त एवं धनंजय ॥१२१॥ ये सभी उससे प्रसन्न होएँ जिन सबों को भूमि पर अन्न दिया जाता है । भींगे पैर से सोना तथा सूखे पैर से भोजन करना निषिद्ध है ॥१२२॥ अन्धकार में न तो सोये और न भोजन करेः। पश्चिमाभिमुख तथा दक्षिणाभिमुख बैठकर दतौन न करे ॥१२३॥ उत्तर और पश्चिम की ओर शिर करके कभी सोना नहीं चाहिए । उन दोनों ओर शिर करके सोने से
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