Srishti Khanda Extracted Page 693

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-693

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Sanskrit Original

एकं च दशभिर्दद्यात्सहस्राण॑ शतं फलम् । तस्यानुसारतो वेद्यं फलं नारद यत्नत: ॥१८९॥ पितृनुद्दिश्य यः पुत्रो वृषं च मोक्षयेद्धुवि। पितरोविष्णुलोकेषु महीयंते यथेप्सितम् ॥१८२॥ चतस्त्रो वत्सतर्यश्च एकस्यैव वृषस्य च । मोक्ष्यते सर्वतः पुत्र विधिरेष सनातनः ॥१८३॥ यावंति चैव रोमाणि तस्य तासां च सर्वशः । तावद्वर्षसहस्राणि स्वर्ग भुंजति मानवाः ॥१८४॥ लांगूलेन वृषो यच्च जलंचोत्क्षिपति ध्रुवम् । तत्तोयं तु सहस्राब्दं पितृणाममृतं भवेत् ॥१८५॥ खुरेण कर्षयेद्धमिं ततोलोष्ठं च कर्द॑मः। पितृभ्यश्च स्वधा तत्र लक्षकोटिगुणं भवेत् ॥१८६॥ विद्यमाने च जनके यदि माता विनश्यति । चंदनेनांकिता धेनुस्तस्या: स्वर्गाय दीयते ॥१८७॥ दाता चैव पितृणां च ऋणं चैव प्रमुंचति । अक्षयं लभते स्वर्गं पूजितो मघवा यथा ॥१८८॥ सर्वलक्षणसंयुक्ता तरुणा गौः पयस्विनी। समा प्रसूतिका भद्रा सा च गौः पृथिवीस्मृता॥१८९॥ तस्य दानेन मंत्रस्य पृथ्वीदानसमं फलम् । शतक्रतुसमो मर्त्यः कुलमुद्धरते शतम् ॥१९०॥ गवां च हरणं कृत्वा मृते गोरथ वत्सके । क्रिमि पूर्णे सकूपे च तिष्ठेदाभूतसंप्लवम् ॥९९१॥ गवां चैव वधं कृत्वा पितृभिः सह पच्यते। रौरवे नरके घोरे तावत्कालं प्रतिक्रिया ॥१९२॥ गोप्रचारप्रभग्नश्च षंडवाहनबंधनः । अक्षयं नरकं प्रायान्पुनर्जन्मनि जन्मनि ॥१९३॥ उन दोनों का फल एक समान होता है इस बात को ब्रह्माजी ने बतलाया है ॥१८०॥ दश गायों के साथ एक सांड दान देने वाले को सैकड़ों हजार गोदान का फल होता है ।हे नारद ! उसी के अनुसार होने वाले फल को जानना चाहिए ॥१८१॥ हे नारद ! पितरों की प्रसन्नता के लिए जो पुत्र सांड छोड़ता है, उसके पितृगण भगवान् विष्णु के लोक में अपनी इच्छानुसार आनन्दानुभव करते हैं ॥१८२॥ चार बछिया तथा एक बैल सर्वत्र छोड़े जाते हैं । यही सर्वत्र सनातन विधि है ॥१८३॥ उस बैल तथा उन बछियों के जितने रोम होते हें, उतने हजार वर्ष पर्यन्त वे दाता मनुष्य स्वर्ग में निवास करते हैं ॥१८४॥ बैल अपनी पूंछ से जो ऊपर जल फेंकता है, वह जल पितरों के लिए एक हजार वर्ष पर्यन्त अमृत के समान तृप्तिप्रद होता है ॥१८५॥ जहाँ पर बैल अपने खूर से पृथिवी को खनता है, उसके लोष्ठ और कर्दम (कीचड़) के स्थान पर किया गया श्राद्ध लाख गुना अधिक फलप्रद होता है ॥१८६॥ यदि पिता के रहते ही माता की मृत्यु हो जाय तो माता की स्वर्गप्राप्ति के लिए चन्दन से धेनु को अलङ्कृत करके दान देना चाहिए ॥१८७॥ दान देने वाला पितृऋण से मुक्त हो जाता है वह अक्षय स्वर्ग को प्राप्त करता है और वहाँ वह इन्द्र के समान पूजित होता है ॥१८८॥ सभी लक्षणों से सम्पन्न, तरुण दूध देने वाली, वर्ष में एक बार बच्चा देने वाली, कल्याणकारिणी गौ पृथिवी के समान कही गयी है ॥१८९॥ उसका मन्त्र पूर्वक दान करने से पृथिवी दान करने के समान फल होता है । वह मनुष्य इन्द्र के समान हो जाता है, और अपने सौ पीढी के पूर्वजों का उद्धार कर देता है ॥१९०॥ गौ को चुरा लेने से यदि गौ के बछड़ा मर जाते हैं तो चुराने वाले को कीड़ों से युक्त कुएं में प्रलय काल पर्यन्त निवास करना पड़ता है ॥१९१॥ जो गौओं का वध करता है, वह अपने पितरों के साथ पकाया जाता है और वह रौरव नरक में प्रलय काल पर्यन्त निवास करता है ॥१९२॥ गौ के प्रचार करने में यदि गौ मर जाती है तो उस सांड़ को वाहन बनाने वाले और बाँधने वाले के प्रत्येक जन्म में अक्षय नरक में जाना पड़ता है ॥१९३॥

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