Srishti Khanda Extracted Page 692

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-692

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Sanskrit Original

ब्रह्मोवाच श्वेतां गां ब्राह्मणे दत्वा मानवश्चेश्वरो भवेत् ॥१६७॥ प्रासादे वसते नित्यं भोगी च सुखमेधते । ध्रुप्रा तु स्वर्गकांतारसंसारे पापमोक्षिणी॥१६८॥ अक्षयं कपिलादानं कृष्णां दत्वा न सीदति। पांडुरा दुर्लभालोके गौरी च कुलनंदिनी ॥१६९॥ रक्ताक्षी रूपकामस्य धनका स्य नीलिका। एकां च कपिलां दत्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते॥९१७०॥ यत्तु बाल्येकृतं पापं यौवने वार्धके कृतम् । वाचा कृतं कर्मकृतं मनसा यत्प्रचिंतितम्॥१७९॥ अगम्यागमनं चैव मित्रद्रोहे च पातकम्। मानकूटं तुलाकूटं कन्यानृतं गवानृतम् ॥१७२॥ सर्व च नाशयेत्क्षिप्रं कपिलां यः प्रयच्छति । दशयोजनविस्तीर्णा महापारा महानदी ॥१७३॥ नाराचजलकांतारे प्रसृते चोदकार्णवे। यावद्वत्सस्य द्वौ पादौ मुखं यावन्न जायते ॥१७४॥ तावद्गौः पृथिवी ज्ञेया यावद्वर्भं न मुंचति। सुवर्णश्वृंगींवस्त्राढ्यां सर्वालंकार भूषिताम् ॥१७५॥ ताम्रपृष्ठीं रौप्यखुरां तथाकांस्योपदोहनाम् । शोभितां गंधपुष्पैश्च॒ सर्वालंकार भूषिताम् ॥१७६॥ ईदृशीं कपिलां दद्यदिद्ठजातौ वेदपारगे । सर्वपापक्षयस्तस्य विष्णुलोकेऽ च्युतो भवेत् ॥९७७॥ तस्यां तु दुह्णमानायां भूमौ पतंति विंदवः । आरामा दिवि जायंते बहुपुष्पफलोत्तमाः ॥९७८॥ यत्र कामफलावृक्षा नद्यः पायसकर्दमाः । प्रासादाश्चापि सौवर्णास्तत्र गच्छति गोप्रदाः ॥१७९॥ दशधेनूश्च यो दद्यादेके चैव धुरंधरम्। समानं तु फलं प्रोक्तं ब्रह्मणा समुदाहृतम् ॥१८०॥ निवास करता है; सभी भोगों को प्राप्त करता है और सुखी होता है । धूम वर्ण की गौ स्वर्ग के कान्तार रूपी संसार के समस्त पापों से मुक्ति देने वाली होती है ॥१६८॥ कपिला गौ के दान से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है । कृष्णा गौ का दान करने वाला कभी दु:खी नहीं होता है । पाण्डुर वर्ण की गौ संसार में दुर्लभ होती है और गौर वर्ण की गौ वंश की वृद्धि करने वाली होती है ॥१६९॥ रूप चाहने वाले को लाल आँखों वाली गौ का दान करना चाहिए, धन चाहने वाले को नीली गौ का दान देना चाहिए । एक कपिला गौ का दान करने वाला मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है ॥१७०॥ कपिला गौ का दान करने वाले के बालावस्था में किए गये, युवावस्था में किए गये तथा वृद्धावस्था में किए गये, वाणी, मन अथवा कर्म से किए गये पाप विनष्ट हो जाते हैं ॥१७१॥ अगम्यागमन जन्य, मित्रद्रोह जन्य, मानकूट जन्य, तुलाकूट जन्य, कन्या के विषय में मिथ्या भाषण जन्य गौओं के विषय में मिथ्या भाषण जन्य।।१७२॥ ये सभी पाप कपिला दान करने वाले के शीघ्र नष्ट हो जाते हैं । गौ दश योजन विस्तीर्ण पृथिवी जिसको पार करना कठिन हो ऐसी नदी के समान है । जब तक गौ के गर्भ से बछड़े के दो पैर सुख पूर्वक नहीं निकल जाते हैं ॥१७३-१७४॥ ऐसी गौ को पृथिवी के समान तब तक जानना चाहिए जब तक कि वह बच्चा नहीं दे देती है । ऐसी गौ के शृंग में सुवर्ण लगाकर, वस्र से ढॅककर तथा सभी अलङ्कारों से अलङ्कृत करके ॥१७५॥ उसके पीठ में ताम्बा तथा खूर में चाँदी मढाकर कांसे के दोहन पात्र के साथ, चन्दन, पुष्प तथा सभी अलङ्कारों से अलङ्कृत करके ॥१७६॥ इस प्रकार की कपिला गौ को वेदज्ञ ब्राह्मण को दान देना चाहिए । ऐसा करने वाले के सभी पाप विनष्ट हो जाते हैं और वह विष्णु लोक में जाता है ॥१७७॥ उस कपिला गौ को दूहते समय उसके दूध के जो विन्दु प्रथिवी पर गिर जाते हैं उससे स्वर्ग में अनेक प्रकार के पुष्पों और फलों से भरे उद्यान उद्भूत होते हैं ॥१७८॥ उन उद्यानों के वृक्ष इच्छानुसार फल देने वाले और दूध की नदियाँ वाले होते है । सुवर्ण निर्मित प्रासाद होते हैं । उसी में गोदान करने वाले मृत्यु के पश्चात् जाते हैं ॥१७९॥ जो दश धेनुओं का दान करता है, और एक साँड देता है।

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