Srishti Khanda Extracted Page 680

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-680

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Sanskrit Original

गत्वोवाच मुनिश्रेष्ठ वदास्माकं हितं वचः । याथापापाद्विमुच्येहं मुनिश्रेष्ठ तथा कुरु ॥२॥ तमुवाच महातेजा ईषद्धास्यः समंततः । कश्यप उवाच संदर्शनाच्च म्लेछानामुपशांतोसि वै स्वयम् ॥३॥ गायत्र्याश्च जपैहोमै्रतै श्रांद्रायणादिभिः । स्मर नित्यं हरेः पादमुपोष्य हरिवासरम् ॥४॥ अहर्निशं हरेर्ध्यानं प्रणामं कुरु तं प्रभुम् । तीर्थस्नानेन मंत्रेण पङ्कस्यांतं गमिष्यसि ॥५॥ ततः पापक्षयादेव ब्राह्मणत्वं च लप्स्यसे । व्रतैर्वृषाधिकैर्मोक्षं नाशयन्कल्मषं द्विज ॥६॥ मुनेस्तस्य वचः श्रुत्वा कृतकृत्यो भवत्तदा । पुण्यं स विविधं कृत्वा पुनर्ग्रह्मत्वमाप्तवान् ॥७॥ ततस्तप्त्वा तपस्तीव्रं स्वर्लोकं चिरमभ्यगात् । सद्वृत्तस्याखिलं पापं क्षयं याति दिने दिने॥८॥ असद्वृत्तस्य पुण्यं हि क्षयं यात्यंजनोपमम् । अनाचाराद्धतो विप्र आचारात्सुरतां व्रजेत् ॥९॥ ततः कंठगतैः प्राणैराचारं कुरुते द्विजः । कर्मणा मनसांगेन सदाचारं सदा कुरु ॥१०॥ कश्यपस्योपदेशेन सविनीतोऽ भवदिद्दजः । आचारं तु पुनः कृत्वा तपस्तप्त्वा दिवं गतः॥९९॥ अनाचारी हतो विप्रः स्वर्गलोकेषु गर्हितः । आचारं तु पुनः कृत्वा सुरलोके महीयते॥१२॥ नारद उवाच प्राप्रुवंति गतिं लोकाः पूजयित्वा द्विजोत्तमान् । द्विजानां पीडनं कृत्वा गतिं गछन्ति कां प्रभो ॥१३॥ ब्रह्मोवाच क्षुधासंतप्तदेहानां ब्राह्माणानां महात्मनाम् । नार्चयेच्छक्तितोभक्त्या स याति नरकं नरः ॥९४॥ जाकर उसने निवेदन किया कि आप हमारे कल्याण का उपदेश करें । हे मुने जिसतरह से में पापों से मुक्ति प्राप्त कर सकूँ आप वैसा ही उपाय करें ॥२॥ ऋषियों ने कहा-- मन्दमुस्कान करते हुए महातेजस्वी महर्षि कश्यप ने उससे कहा कश्यप महर्षि ने कहा-- तुम स्वयं ही म्लेच्छों को देखकर उपशान्त हो गये हो ॥३॥ तुम गायत्री का जप, होम, चान्द्रायण इत्यादि व्रतों को करो । एकादशी के दिन उपवास करो श्रीहरि के चरणों का सदा स्मरण करो ॥४॥ रात-दिन श्रीभगवान् का ध्यान करो और उनको प्रणाम करो । तीर्थो में जाकर स्नान करने से तुम्हारे पापों का अन्त हो जायेगा ॥५॥ उसके बाद पापों के विनष्ट हो जाने से तुम ब्राह्मणत्व को प्राप्त कर लोगे । अधिक धार्मिक ब्रतों के द्वारा हे ब्राह्मण ! अपने पापों का नाश करो ॥६॥ ब्रह्माजी ने कहा-- मुनि के वचन को सुनकर वह ब्राह्मण कृतकृत्य हो गया । अनेक प्रकार के पुण्यों को करके उसने ब्रह्मत्व प्राप्त कर लिया ॥७॥ उसके बाद तीब्र तपस्या करके उसने स्वर्ग लोक को प्राप्त कर लिया । सद्वृत्त ब्राह्मण के सारे पाप प्रतिदिन विनष्ट होते रहते हे ।।८॥ सदाचार का पालन नहीं करने वाले के प्रतिदिन पुण्य विनष्ट होते जाते है अनाचार से ब्राह्मण का विनाश हो जाता है और सदाचार का पालन करने से उसको देवत्व की प्राप्ति हो जाती हे ॥९॥ इसीलिए मरणासन्न भी ब्राह्मण आचार का पालन करते हैं । तुम मन, कर्म तथा वाणी से सदैव सदाचार का पालन करो ॥१०॥ महर्षि कश्यप के उपदेश से वह ब्राह्मण विनीत हो गया । उसके बाद सदाचार का पालन करके तथा तपस्या करके वह स्वर्ग लोक चला गया॥ १ १॥ अनाचार के द्वारा मारा गया ब्राह्मण स्वर्गलोक में निंदित होता है, उसके बाद सदाचार का पालन करके वह स्वर्गलोक में पूजित होता है ॥१२॥ नारदजी ने कहा-- श्रेष्ठ ब्राह्मणों की पूजा करके मनुष्य सद्रति को प्राप्त करते है किन्तु ब्राह्मणों को पीडित करने वालों की कौन सी गति होती है ?॥१३॥ ब्रह्माजी ने कहा-- जो मनुष्य

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