Srishti Khanda Extracted Page 645
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-645
Sanskrit Original
पत्तनं कोशकारणां कशिं च रजताकरम् । मगधाश्र महाग्रामाः पुण्ड़ा उग्रास्तथैव च ॥१५७॥ खुध्ना मल्ला विदेहाश्च मालवा: काशिकोसला:। भवनं वैनतेयस्य दैत्येद्रेणाभिकंपितम्॥१५८॥ कैलासशिखराकारं यत्कृतं विश्वकर्मणा । रत्मतोयो महाभीमो लौहित्यो नामसागरः ॥१५९॥ उदयश्च महाशैल उच्छितः शतयोजनम् । सवर्णवेदिकः श्रीमान्मेघपंक्तिनिषेवितः ॥१६०॥ भ्राजमानोर्कसद्शै र्जातरूपमयैद्दमेः । सालैस्तालैतमालैश्च कर्णिकारैश्च पुष्पितैः ॥१६९॥ अयोमुखश्च विख्यातः सर्वतो धातुमंडितः । तमालवनगंधश्च पर्वतो मलयः शुभः॥१६२॥ सुराष्ट्राश्च सबाह्णीकाश्शूद्राभीरास्तथैव च । भोजाः पांण्ड्याश्च वंगाश्च कलिंगास्ताप्रलिप्तकाः॥९६३॥ तथैव पौड़ा: शुभ्राश्च वामचूडास्सकेरलाः । क्षोभितास्तेन दैत्येन देवाश्चाप्सरसांगणाः॥१६४॥ अगस्त्यभवनं चैव यदगस्त्यकृतं पुरा सिद्धचारणसंघैश्च विप्रकीर्ण मनोहरम् ॥१६५॥ विचित्रनानाविहगं सपुष्पितमहाद्टुमम्। जातरूपमयैः श्रृगैरप्सरोगणसेवितम् ॥१६६॥ गिरिः पुष्पितकश्चैव लक्ष्मीवान्म्रियदर्शनः । उत्थितः सागरं भित्वा विश्रामश्च॑द्रसूर्ययोः ॥१६७॥ रराज समहाथृंगै र्गगनं विलिखन्निव । चंद्रसूर्याशु संकाशैः सागरांबुसमावृतैः ॥१६८॥ विद्यु््वान्पर्वतः श्रीमानायतः शतयोजनम् । विद्युतां यत्र संपाता निपात्यंते नगोत्तमे ॥१६९॥ ऋषभः पर्वतश्चैव श्रीमानृषभसंस्थितः । कुंजरः पर्वतः श्रीमानगस्त्यस्य गृहं शुभम् ॥९७०॥ विमलाख्या च दुर्धर्षा सर्पाणां मालतीपुरी । तथा भोगवती चापि दैत्येंद्रेणाभिकपिता ॥१७९॥ महासेनगिरिंश्चैव पारियात्रश्च पर्वतः । चक्रवांश्च गिरिश्रेष्ठो वाराहश्चैवपर्वतः ॥९१७२॥ पर्वत ॥१५६॥ कोशकारों की नगरी तथा चाँदी का खजाना कशि, महाग्राम मगध, पुण्ड़ तथा उग्र ॥१५७॥ सुध्न, मल्ल, विदेह, मालवा, काशि, कोसल तथा जिसको विश्वकर्मा ने कैलास शिखर के समान उन्नत बनाया था उस गरुड के भवन; इन सबों को हिरण्यकशिपु ने कँपा दिया । रत्न के समान जल वाले, अत्यन्त भयङ्कर लौहित्य नामक सागर ॥१५९॥ महान् पर्वत उदयाचल जो सौ योजन ऊँचा है उसको, मेधों की पंक्ति से सेवित ऐश्वर्य सम्पन्न सुवर्ण वेदिक को ॥१६०॥ जो सूर्य के समान शाल, ताल, तथा विकसित पुष्पों वाले तमाल वृक्षों के द्वारा सुशोभित है॥ १६१॥ सर्वत्र धातुओं से मण्डित है, उस अयोमुख पर्वत को, तमाल वन की सुगन्धि वाले मलय पर्वत को (उसने कँपा दिया) ॥१६२॥ सुराष्ट्र बह्णीक में रहने वाले शूद्रों तथा अभीरो को भोजकट प्रदेश, पाण्ड्य, बंगप्रदेश, कलिङ्ग तथा ताम्रलिप्तक को भी उसने कॅपा दिया ॥१६३॥ उसी तरह शुभ्र पोण्डू प्रदेश, वाभचूड, केरल प्रदेश को उस दैत्येन्द्र ने स्वर्ग तथा अप्सराओं के गण को क्षुब्ध बना दिया ॥१६४॥। जिसको पहले महर्षि अगस्त्य ने बनाया था उस आगस्त्य महर्षि के सिद्धों और चारणों के गणों से भरे हुए तथा मनोहर भवन को भी उसने क्षुब्ध कर दिया॥१६५।। सौ योजन विस्तृत जो अनेक प्रकार के अद्भुत पक्षियों से युक्त था, जिस पर बड़े-बड़े वृक्ष पुष्पित रहते हैं, जिसके शिखर सुवर्णमय हैं, जिस पर अप्सराएँ निवास करती हैं, पुष्पों से युक्त, लक्षण सम्पन्न, देखने में प्रिय, जो सागर का भेदन करके निकला था तथा जो चन्द्रमा और सूर्य का विश्राम स्थल है वह अपने बड़े-बड़े शिखरों से सुशोभित जैसे आकाश का स्पर्श कर रहा हो, चन्द्रमा और सूर्य के सदृश सागर के जल से धिरे हुए शिखरों वाला विद्युत्तान पर्वत भी काँप गया । उस पर विद्युतों का समूह गिरता रहता हे ॥१६६-१६९।। जिस पर ऋषभ का निवास था वह ऋषभ पर्वत, अगस्त्य महर्षि का भवन और कुञ्जर पर्वत भी काँप गया ॥१७०॥ सर्पो की दुघर्ष विमला नाम की मालती पुरी तथा भोगवती नगरी को भी हिरण्यकशिपु ने कँपा दिया ॥१७१॥ उसने महासेन पर्वत,
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