Srishti Khanda Extracted Page 643

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-643

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Sanskrit Original

ते सर्वे गगने हृष्टाव्यचर श्च यथासुखम् । अयोगतश्चाप्यचरद्योगं निशि निशाचरः ॥१२५॥ सग्रहः सहनक्षत्रैस्तारापतिररिंदम । विवर्णतां च भगवान् गतो दिवि दिवाकरः ॥१२६॥ कृष्णः कबंधश्च तदा लक्ष्यते सुमहान् दिवि । असृजच्चासिता सूर्यो धूमवत्तां विभावसुः ॥१२७॥ गगनस्थश्च भगवानभीक्ष्णं परिविष्यते । सप्तधूमनिभाधोराः सूर्या दिवि समुत्थिताः ॥१२८॥ सोमस्य गगनस्थस्य ग्रहास्तिष्ठंति श्रृंड़गा: । वामे च दक्षिणेचैव स्थितौ शुक्रबृहस्पती ॥१२९॥ शनैश्चरो लोहितांगो लोहितांगसमद्युतिः। समंसमधिरोहंत सर्वे वै गगनेचराः॥१३०॥ शृंगाणि शनकैर्घोरा युगांतावर्ततनग्रहाः । चंद्रमाश्च सनक्षत्रो ग्रहैः सह तमोनुदः ॥१३१॥ चराचरविनाशाय रोहिणीं नाभ्यनंदत। गृहीतो राहुणा चन्द्र उल्काभिरभिहन्यते ॥९३२॥ उल्काः प्रज्वलिताश्चंद्रे व्यचरंत यथासुखम्। देवानामधिपो देवः सोप्यवर्षत शोणितम् ॥१३३॥ अपतद्गगनादुल्का विद्युद्रूपा महास्वना। अकाले च द्टुमास्सर्वे पुष्प्यंति च फलंति च॥१३४॥ लताश्च सफलाः सर्वा या आहुर्दैत्याशिकाः । फलेफलान्यजायन्त पुष्पे पुष्पं तथैव च॥१३५॥ उन्मीलंति निमीलंति हसंति प्ररुदंति च । विक्रोशंति च गंभीरं धूमायंते ज्वलंति च ॥१३६॥ प्रतिमास्सर्वदेवानां कथयंत्यो महद्भयम् । आरण्यैः सह संसृष्टा ग्राम्याश्च मृगपक्षिणः ॥९३७॥ चुक़ुशुभैरव॑ तत्र मृगयुद्ध उपस्थिते । नद्यश्च प्रतिकूलानि वहंति कलुषोदकाः ॥१३८॥ न प्रकाशंत च दिशो रक्तरेणुसमाकुलाः । वानस्पत्या नपूज्यंते पूजनार्हा कथंचन ॥१३९॥ वायुवेगेन हन्यंते भज्यंते प्रणमंति च। तथा च सर्वभूतानां छाया न परिवर्त्तते ॥९४०॥ में विचरण करते हुये दिखायी देने लगे । विना योग के ही रात्रि में निशाचर संचरण करने लगे ।।१२५॥ हे अरिंदम भीष्म ! तारा गणों तथा ग्रहों के साथ चन्द्रमा तथा सूर्य विवर्ण (निष्प्रभ) हो गये ॥१२६॥ आकाश में बहुत बड़ा काला कबन्ध दिखने लगा । सूर्य में कालिमा दिखने लगी तथा अग्नि में अत्यधिक धूम युक्तता ॥१२७॥ आकाश में विद्यमान भगवान् सूर्य बार-बार परिवेष्टित होने लगे । आकाश में सूर्य की ज्योति सात प्रकार के धूम जैसा दिखायी देने लगी ॥१२८॥ आकाशस्थ चन्द्रमा के ग्रहों के शृङ्ग उन्नत हो गये । उनके बायें तथा दाहिने भाग में क्रमश: शुक्र और बृहस्पति हो गये ॥१२९॥ शैनेश्वर और भौम की कान्ति लाल हो गयी । सभी ग्रह एक ही साथ उच्च हो गये॥ १३०॥ प्रलयकाल में उदित होने वाले भयङ्कर ग्रहों के शृंग उद्भूत हो गये । अन्धकार को विनष्ट करने वाले चन्द्रमा सभी ग्रहों तथा नक्षत्रों के साथ ॥१३१॥ चराचर का विनाश करने के लिए रोहिणी को अभिनंदित नहीं किए। राहु ने चन्द्रमा को पकड़ लिया और उन पर उल्कापात करने लगा ॥१३२॥ चन्द्रमा पर प्रज्जवलित उल्का चारो ओर विचरण करने लगे । देवेन्द्र भी खून की वर्षा करने लगे ॥१३३॥ विद्युत् स्वरूप उल्काएँ जोर-जोर से शब्द करती हुयी आकाश से गिरने लगीं । बिना समय के ही सभी वृक्ष पुष्पित और फलित होने लगे ॥१३४॥ फल युक्त होकर सभी लताएँ दैत्यों के विनाश को सूचित करने लगीं । फलों में फल लग गये तथा पुष्पों में पुष्प निकलने लगे॥१३५॥ महान् भय को बतलाती हुयी देवताओं की सभी प्रतिमायें आँखें खोलने लगी और बन्द करने लगी । हँसने और रोने लगीं । गम्भीर ध्वनि करने लगीं और धूम प्रकट करने लगी । प्रज्वलित होने लगीं । जंगली पक्षी और पशुओं के साथ ग्राम्य पशु-पक्षी मिल गये ॥१३६-१३७॥ उस मृग युद्ध के समय वे घोर शब्द करने लगे । नदियों का जल कलुषित हो गया और वे प्रतिकूल बहने लगीं ॥१३८॥ रक्त और धूलि से भरी दिशाएँ प्रकाशित होती थी । पूज्य वनस्पतियाँ प्रकाशित नहीं होती थीं ॥१३९॥ वे वायु के वेग से टूटकर विनष्ट हो जाती थीं और गिर

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