Srishti Khanda Extracted Page 641
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-641
Sanskrit Original
श्रीपद्ममहापुरण प्रजापतिश्चात्र मनुर्महात्मा ग्रहाश्च योगाश्च महीनभश्च । उत्पातकालश्च धृतिर्मतिश्च रतिश्च सत्यंच तपोदमश्च ॥९४॥ सनत्कुमारश्च महानुभावो विश्वे च देवा ऋषयश्च सर्वे । क्रोधश्च कामश्च तथैव हषों दर्पश्च मोहः पितरश्च सर्वे ॥९५॥ प्रह्मादस्य वचः श्रुत्वा हिरण्यकशिपुः प्रभुः। उवाच दानवान् सर्वान् गणांश्च सगणाधिपः॥९६॥ मृगेंद्रो गृह्यतामेष अपूर्वा तनुमास्थितः । यदि वा संशयःकश्चिद्ठध्यतां वनगोचरः ॥९७॥ ते दानवगणास्सवें मृगेद्रं भीमविक्रमम् । परिक्षिपंतो मुदितासत्रासयामासुरोजसा ॥९८॥ सिंहनादं विमुच्याथ नरसिंहो महाबलः । बभंज तां सभां सर्वां व्यादितास्य इवांतकः ॥९९॥ सभायां भज्यमानायां हरिण्यकशिपुः स्वयम्। चिक्षेपासत्राणि सिंहस्य रोषव्याकुललोचनः ॥९००॥ सर्वा्राणामथश्रेष्ठं दंडमस्त्रं सुदारुणम् । कालचक्रं तथा घोरं विष्णुचक्रं तथापरम् ॥९०१॥ पैतामहं महत्युग्रं त्रैलोक्यनिर्मितं महत् । विचित्रामशनिं चैव शुष्कार्द्र चाशनिद्वयम् ॥१०२॥ रौद्रं तथोग्रशूलं च कंकालं मुसलं तथा । अस्त्रं ब्रह्मशिरश्चैव ब्राह्ममस्त्रं तथैव च॥१०३॥ नारायणास्त्रमैन्द्रं च आग्नेयं शैशिरं तथा । वायव्यं मथनं चैव कपालमथकिकरम् ॥९०४॥ तथा प्रतिहतां शक्ति क्रौचमस्त्रं तथैव च । मोहनं शोषणं चैव संतापनविलापने ॥१०५॥ कंपनं शातनं चैव महास्त्रं चैव रोधनम् । कालमुह्ूरमक्षोभ्यं तापनं च महाबलम् ॥१०६॥ संवर्तनं मोहनं च तथा मायाधरं वरम्। गान्धर्वमस्त्रं दयितमसिरत्मंच नंदकम् ॥१०७॥ प्रस्वापनं प्रमथनं वारुणं चा्तरमुत्तमम् । अस्त्रं पाशुपतं चैव यस्याप्रतिहता गतिः ॥१०८॥ एतान्यस्त्राणि दिव्यानि हिरण्यकशिपुस्तदा । असुजन्नरसिंहस्य दीप्तस्याग्नेरिवाहुतिम् ॥१०९॥ सूचक काल, धृति, मति, रति, सत्य, तपस्या तथा दम ॥९४॥ महानुभाव सनत्कुमार, विश्वेदेव, सभी ऋषिगण, क्रोध, काम, हर्ष, दर्प, मोह तथा समस्त पितृगण इन नृसिंह के ही शरीर में दिखते हैं ॥९५॥ प्रह्लाद की वाणी को सुनकर दैत्यों के स्वामी हिरण्यकशिपु ने सभी दानवों को कहा ॥९६॥ इस अपूर्व शरीरधारी मृगेन्द्र को पकड़ लो यदि इसको पकड़ पाने मे किसी प्रकार का संशय हो तो इस जानवर को मार डालो ॥९७॥ वे सभी दानवों के गण प्रसन्नता पूर्वक उस भयङ्कर मृगेन्द्र पर प्रहार करते हुए अपने तेज से उसे डरा रहे थे ॥९८।। महाबलवान् भगवान् नृसिंह ने भी सिंहनाद करके मुंह खोले हुए यमराज के समान उस सभा को ही विनष्ट कर दिया ॥९९॥ जब सभा विनए हो रही थी उस समय कुद्ध हिरण्यकशिपु ने नरसिंह भगवान् के ऊपर आस्रं से प्रहार किया ।॥।१००॥ सभी अखों में श्रेष्ठ भयङ्कर ब्रह्मदण्ड, कालचक्र, भयङ्कर विष्णुचक्र, महान् त्रैलोक्य का निर्माण करने वाले ब्रह्माजी के अस्त्र (ब्रह्मात्र) शुष्क तथा आर्द्र दोनों प्रकार की अद्भुत अशनियों (वज्रो) ॥ १० १-१०२॥ भयङ्कर रुद्रशूल, कालचक्र, मुसलास्र, ब्रह्मशिरः अस्त्र, तथा ब्रह्म्र का प्रयोग किया ॥१०३॥ उसने नारायणास्त्र, ऐन्द्रासत्र, आग्नेया शिशिरारू, वायव्यास्र, मथनास्न, कपालास्र, किंकराख्र का भी प्रयोग किया ॥१०४॥ उसीतरह अप्रतिहता शक्ति, क्रौञ्चा्र, मोहनास्त्र, शोषणास्त्र, संतापनास्र, विलेपनास्र ॥१०५॥। कंपनास्र, शातनास्त्र, रोधनास्त्र, अक्षोभ्य कालमुद्रर तथा महाबलवान तापनाख से प्रहार किया ॥१०६॥ हिरण्याक्ष के द्वारा प्रयुक्त ये सभी अस्तर भगवान् नृसिंह के समक्ष घी में डाली गयी आहुति के ही समान सिद्ध हुए ॥१०९॥ प्रज्वलित इन अखों के द्वारा हिरण्यकशिपु ने नरसिंह भगवान् को ढंक दिया । उस समय भगवान् ऐसे लग रहे थे जैसे हिमालय सूर्य की किरणों से ढँक जाता
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