Srishti Khanda Extracted Page 589
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-589
Sanskrit Original
कृते तु बंदने तस्या माता सखिमुखेन तु । चोदयामास शनकैस्तस्याः सौभाग्यद्शिताम् ॥१३७॥ शरीरलक्षणानां च परिज्ञानाय कौतुकात्। स्रीस्वभावात्स्वदुहितुश्जितं हृदि समुद्दहन्॥१३८॥ ज्ञात्वा तदिंगितं शैलो महिष्या हृदयेन तु। अनुदीर्णाकृतिर्मेने रम्येतदुपस्थितम् ॥९३९॥ चोदितः शैलमहिषी सख्या मुनिवरस्ततः । स्मिताननो महाभागो वाक्यं प्रोवाच नारदः ॥१४०॥ नारद उवाच न जातोस्याः पतिर्भद्रे लक्षणैश्च विवर्जितः । उत्तानहस्ता सततं चरणैर्व्यभिचारिभिः ॥१४१॥ सुच्छायास्याभविष्येयं किमन्यद्ृहुभाष्यते । श्रुत्वैतत्संभ्रमाविष्टो ध्वस्तधैरयो हिमाचलः ॥१४२॥ नारदं प्रत्युवाचाथ साश्रुकंठो महागिरिः । हिमवानुवाच संसारस्यातिदोषस्य॒ दुर्विज्ञेया गतिर्यतः ॥९४३॥ सृष्ट्या चावश्यभाविन्या केनाप्यतिशयात्मना। कर्न्रा प्रणीता मर्यादा स्थिता संसारिणामियम्॥९४४॥ यो जायते हि यद्दीजाज्जनितुः सोर्थसाधकः। जनिता चापि जातस्य नं कश्चिदिति च स्फुटम्॥१४५॥ स्वकर्मणैव जायंते विवधा भूतजातयः । अंडजो ह्यांडजाज्जात; पुनजयित मानवः ॥१४६॥ मानुषोपि सरीसृप्यां मानुषत्वेन जायते । तत्रापि जातौ श्रेष्ठायां धर्मस्योत्कर्षणेन तु ॥१४७॥ अपुत्रजन्मनः शेषाः प्राणिनः समवस्थिताः। मनुजास्तत्र सुतरां नयेन सहधर्मिणः ॥१४८॥ क्रमेणाश्रमसंप्राप्ति ब्रह्मचारिब्रतादनु । तस्य कर्तुर्नियोगेन संसारो येन वर्धितः॥९४९॥ संसारस्य हि नोत्पत्तिः सर्वे स्युर्यदि निर्गृहाः । कर्त्रा तु शास्रेषु सदा सुतलाभः प्रशंसितः ॥९५०॥ वन्दना की ॥१३६॥ वन्दना कर लेने के पश्चात् उसकी माता ने सखी को उस बालिका के सौभाग्य आदि के विषय में पूछने के लिए प्रेरित किया ॥१३७॥ तथा कौतुक वशात् उसके शरीर तथा लक्षण आदि के विषय में स्त्री स्वभाव वाली होने के कारण उस बालिका को हृदय से लगाकर जानना चाहा ॥१३८॥ बिना कहे ही पत्नी की इशारे को जानकर हिमवान् ने सोचा यह बहुत अच्छा अवसर आ गया है ॥१३९॥ हिमवान् की पत्नी की सखी के द्वारा पूछे जाने पर मुस्कुराते हुए देवर्षि नारद ने कहा ॥१४०॥ नारद ने कहा-- भद्रे ! इसका पति उत्पन्न नहीं हुआ है । इसका जो पति होगा उसमें कोई भी लक्षण नहीं है । इसके हाथ सदा ऊपर की ही ओर उठे रहेंगे । इसके चरण सुच्छाय और व्यभिचारी हें ॥१४१। इससे अधिक इसके विषय में क्या कहा जाय ? यह सुनकर हिमवान् घबरा गये, उनका धैर्य टूट गया ॥१४२॥ भरे हुए कण्ठ से हिमवान् ने नारदजी से कहा हिमवान् ने कहा-- संसार अत्यन्त दोषमय है । इसकी गति को जानना कठिन है ॥१४३॥ यह सृष्टि किसी सवों से श्रेष्ठ कर्त्ता के द्वारा बनायी हुयी है। सृष्टि अवश्य भाविनी है । यही संसारी जीवों की मर्यादा है ॥१४४॥ जो जिस बीज से उत्पन्न होता है, वह उत्पन्न होने वाले के प्रयोजन को सिद्ध करने वाला होता है । उत्पन्न करने वाला भी उत्पन्न हुए के किसी प्रयोजन का साधक नहीं होता है ॥१४५॥ अनेक प्रकार के जीवों की जातियाँ अपने कर्मो से होती हें । अण्डज अण्डज से उत्पन्न होता है फिर वह मानव हो सकता है ॥१४६॥ इसीतरह मनुष्य भी अपने कर्मो के अनुसार सर्पादि योनियों में उत्पन्न होता है । उसमें भी श्रेष्ठ जाति के होने में धर्म की उत्कृष्टता कारण होती है ।दूसरे जीव पुत्र जन्म से रहित होते हैं किन्तु मनुष्य नीति के अनुसार सहधर्मी होते हैं ॥१४७॥। उसे ब्रह्मचारी त्रत के पश्चात् गार्हस्थ्य इत्यादि आश्रमों की प्राप्ति; जिसने जगत् को बढाया उस जगत् के कर्ता की आज्ञा के अनुसार ही होती है ॥१४८॥ यदि सबलोग गृह का
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