Srishti Khanda Extracted Page 581

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-581

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Sanskrit Original

दंडेनालंबनेनेव कृष्टो येन पदे पदे । रजनीचरनाथ त्वां किंभीत इव भाषसे॥२३॥ राक्षसेन्द्र कृतादाने त्वमरातिक्षतो यथा । तनुस्ते वरुणोच्छुष्का परीतस्येव वह्निना ॥२४॥ विमुक्तरुधिरं चाथ पदं त्वं प्रविलोकय । वायो भवान् विचेतस्कः खड्गाग्रैरिव निष्कृतः॥२५॥ किं त्वं नतोऽसि धनद संत्यज्येव कुबेरताम् । रुद्रास्त्रिशूलिनः संतोऽविंदध्वं बहुशूरताम् ॥२६॥ भवतां केन चाक्षिप्ता तीब्रता नस्तदुच्यताम् । पुलस्त्य उवाच एवमुक्ताः सुरास्तन ब्रह्मणा ब्रह्मवर्तिना ॥२७॥ वाचां प्रधानभूतत्वात्तेमारुतमचोदयन् । अथ शक्रमुखैर्देवैः पवनः प्रतिचोदितः ॥२८॥ प्राह देवं चतुर्वक्त्रं भवान्वेत्ति चराचरम् । वायुरुवाच पुरहूतमुखाः सबला निमिषा विजिताः प्रसभं किल दैत्यशतैः ॥२९॥ ऋतवो विहिता भवता स्थितये जगतां च महाद्धुतचित्रगुणाः । अपि यज्ञकृतः श्रुतकामफलां विहिता ऋषयस्तत एव पुरः ॥३०॥ अपि नाकमभूत्किलयज्ञभुजां भवतो विनियोगवशात्सततम् । अपहत्य विमानगणं सकृतो दनुजेन महाकरभूमिसमः ॥३९॥ कृतवानसि सर्वगुणातिशयं यमशेषमहीधरराजतया । मखभूषितमंशुमतामवधिं सुरधामगिरिं गगनेपि सदा॥३२॥ अधिवास विहारविधानुचितो दनुजेन परिष्कृतश्ृंगतटः । प्रविलम्बितरत्नगुहानिवहो बहुदैत्यसमाश्रयतां गमितः ॥३३॥ लगता है कि तुम पग-पग पर दण्ड के सहारे चल रहे हो । हे राक्षसों के स्वामिन्. त्रिऋतिदेव ! आप डरे हुए के समान क्यों बोल रहे हैं ?॥२३॥ हे राक्षसेन्द्र ! लगता है कि तुमको किसी शत्रु ने क्षति पहुँचायी है हे वरुण ! तुम्हारा शरीर अग्नि से व्याप्त के समान तथा शुष्क के समान क्यों प्रतीत हो रहा है ?।।२४॥ देखो तुम्हारे पैर से खून निकल रहा है । वायु ! तुम निश्रेष्ट से हो गये हो लगता है किसी ने, खड्ग से काटा है ॥२५॥ हे कुबेर ! लगता है तुम अपने कुबेरत्व का परित्याग करके झुक से गये हो । हे त्रिशूलधारी रुद्रों ! तुम लोग तो प्रख्यात शूरवीर हो ॥२६॥ बतलाओं; तुमलोगों की तीब्रता को किसने छीन लिया है ? पुलस्त्य महर्षि ने कहा--- ब्रह्मनिष्ठ ! ब्रह्माजी के द्वारा इस तरह से कहे जाने पर ॥२७॥ बोलने वालों में प्रधान वायु देवता को बोलने के लिए देवताओं ने प्रेरित किया । उसके बाद इन्द्र आदि देवताओं से प्रेरित होकर वायुदेव ने ॥२८॥ चतुर्मुख ब्रह्माजी से कहा-- हे देव! आप तो सम्पूर्ण चराचर को जानते हैं । इन्द्र इत्यादि समस्त देवताओं को उनकी सेना के साथ सैकड़ों दैत्यों ने पराजित कर दिया है ॥२९॥ आपने यज्ञों का निर्माण जगत् की रक्षा करने के लिए किया है । वे यज्ञ विचित्र गुणों वाले हैं । ऐसा सुना जाता है कि यज्ञों के द्वारा अभिलषित फलों की प्राप्ति होती है, इसीलिए ऋषियों ने प्राचीनकाल में यज्ञों का विधान किया ॥३०॥ आपकी ही आज्ञा से स्वर्ग देवताओं का निवास स्थान हुआ । किन्तु उसे राक्षस तारक ने देवताओं के विमानों को छिन लिया है और स्वर्ग को पृथिवी के समान बना दिया है ॥३१॥ जिसको आपने पर्वतराज बनाया है । यज्ञों से समलङ्कृत, प्रकाशवानों में श्रेष्ठ तथा देवताओं के निवास स्थान रूप से आकाश में

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