Srishti Khanda Extracted Page 573

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-573

padma-puranasrishti-khandacreation-cosmologypartialpage-extract

Sanskrit Original

hs श्रीपद्ममहापुराण रौद्रेण देवराजेन नष्टनाथेन भूरिशः । दुःखस्यांतमपश््यंती प्राणांस्त्यक्तुं व्यवस्थिता ॥४१॥ पुत्रं मे तारकं देहि तस्मादुःखमहार्णवात्। एवमुक्तस्तु दैत्येद्रः कोपव्याकुललोचनः ॥४२॥ शक्तोपि देवराजस्य प्रतिकर्तु महासुरः । तप एव पुनश्चर्तु व्यवस्यत महाबलः ॥४३॥ ज्ञात्वा तस्य तु सङ्कल्पं ब्रह्मा क्रूरतरं पुनः। आजगामत्वरा युक्तोयत्रासौ दितिनंदनः ॥४४॥ ब्रह्मोवाच किमर्थ पुत्रभूयस्त्वं कर्तु नियममुद्यतः। तदहं ते पुनर्दद्ि कांक्षितं पुत्रमोजसा॥४५॥ वञ्रांग उवाच उत्थितेन मया दृष्टा समाधानात्त्वदाज्ञया । त्रासितेंद्रेण मामाह सा वरांगी सुतार्थिनी ॥४६॥ पुत्रं मे तारकं देहि तुष्टो मे त्वं पितामह। ब्रह्मोवाच अलं ते तपसा वीर मा क्लेशे दुस्तरो विश ॥४७॥ पुत्रस्तु तारको नाम भविष्यति महाबलः । देवसीमंतिनीनां तु धम्मिल्लकविमोक्षकः ॥४८॥ इत्युक्तो दैत्यनाथस्तु प्रणम्य प्रपितामहम् । गत्वा तां नंदयामास महिषीं कर्शितांतराम्॥४९॥ तौ दंपती कृतार्थौ तु जग्मतुः स्वाश्रमं तदा । आहितं तु तदा गर्भ॑ वरांगीवरवर्णिनी ॥५०॥ पूर्णवर्षसहसत्रं तु दधारोदर एवहि । ततो वर्षसहस्रांते वरांगी सा प्रसूयत॥५१॥ जायमाने तु दैत्ये तु तस्मिन् लोकभयंकरे। चचाल सर्वा पृथिवी प्रोद्धूताश्च महार्णवाः ॥५२॥ चेलु र्धराधराश्चापि ववुर्वाताश्चभीषणाः । जेपुर्जप्यंमुनिवरानेदुर्व्यालमृगा अपि ॥५३॥ जह कांतिश्चंद्रसूयौ नीहारच्छादिता दिशः। जाते महासुरे तस्मिन्सर्वे चापि महासुराः ॥५४॥ के द्वार इस तरह कहे जाने पर वद्रांग क्रोध से व्याकुल हो गया ॥४२॥ यद्यपि वह स्वयं इन्द्र का प्रतिकार करने में समर्थ था फिर भी उस महाबलवान् ने पुन: तपस्या करने का मन बना लिया ॥४३॥ उसके अत्यधिक क्रूर सङ्कल्प को जानकर ब्रह्माजी उस दैत्य के पास अत्यन्त शीघ्रता से आये ॥४४॥ ब्रह्माजी ने कहा-- पुत्र तुम पुन: तपस्या करने के लिए क्यों तैयार हो गये ? मैं तुम्हें तुम्हारे अभिप्रेत पुत्र को प्रदान कर रहा हूँ । जो महाओस्वी होगा ॥४५॥ चब्राङ्ग ने कहा-- आपकी आज्ञा प्राप्त करके जब मैं समाधि से उठा तो देखा कि मेरी पत्नी वराङ्गी को इन्द्र ने बहुत त्रास दिया है; अब वह पुत्र प्राप्त करना चाहती है ॥४६॥ हे पितामह ! आप प्रसन्न होकर मुझे तारक पुत्र प्रदान कीजिये । ब्रह्माजी ने कहा-- वत्स ! तुम्हें तपस्या करने की कोई आवश्यकता नहीं । अब क्लेश मत उठाओ॥४७॥ तुम्हारा तारक नाम का महाबलवान् पुत्र होगा । वह देवताओं की पत्नियों के केशों को खोलने वाला होगा ॥४८॥ इस तरह कहे जाने पर वद्राङ्ग ने ब्रह्माजी को प्रणाम किया, उसने जाकर अपनी दु:खिनी पत्नी को प्रसन्न किया॥४९॥ उसके बाद कृतार्थ होकर दोनो दम्पत्ती (पति-पत्नी) अपने आश्रम में चले गये जिससे कि सुन्दरी वराङ्ग का गर्भाधान हो सके ॥५०॥ वराङ्गी ने उस गर्भ को एक हजार वर्ष तक अपने गर्भ में ही धारण किया । उसके बाद एक हजार वर्ष पूरा होने पर वराङ्गी ने पुत्र प्रसव किया ॥५१॥ लोक भयङ्कर उस दैत्य के उत्पन्न होते ही सारी प्रथिवी काँप गयी और महार्णवों में तुफान आ गया ॥५२॥ पर्वत डगमगाने लगे और भयङ्कर वायु चलने लगी । श्रेष्ठ मुनिगण मन्त्रों का जप करने लगे और सर्प तथा पशु भी बोलने लगे ॥५३॥ चन्द्रमा और सूर्य की कान्ति क्षीण हो गयी! दिशाओं में कुहरा छा गया । उस महा असुर के उत्पन्न होने पर सभी बड़े-बड़े तथा असुरों की पत्नियाँ वहाँ प्रसन्नतापूर्वक

No translation available yet.

Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know