Srishti Khanda Extracted Page 561
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-561
Sanskrit Original
पद्डिशैभिडिपालेश्व परिधैश्चोत्तमायसैः । घातिनीभिश्च गुर्वीभिः शतघ्नीभिस्तथैव च ॥१९२॥ युगैर्यत्रै्च निर्मुक्तै लाङ्गलैरुग्रताडितैः । दोर्भिरायतमानैश्च पाशैश्च परिघादिभिः ॥१९३॥ भुजंगवक्त्रैलेलिहानै विसर्पद्धश्च सायकैः। वज्रैः प्रहरणीयैश्च दाीप्यमानैश्चतोमरैः ॥१९४॥ विकोशैरसिभिस्तीक्ष्णैः शूलैश्च शितनिर्मलैः। दैत्यैः संदीप्यमानैश्च प्रगृहीतशरासनैः ॥१९५॥ ततः पुरस्कृत्य तदा कालनेमिनमाहवे । सा दीप्तशस्तरप्रवरा दैत्यानां रुरुचे चमूः ॥१९६॥ यैर्निमीलितसर्वांगा वनालीवांम्बुदागमे । देवतानामपि चमूर्मुमुदे शक्रपालिता ॥१९७॥ उपेता शिशिरोष्णाभ्यां तेजोभ्यां चंद्रसूर्ययोः । वायुवेगवती सौम्या तारागणपताकिनी॥१९८॥ तोयदाबद्धवसना ग्रह नक्षत्रहासिनी। यमेंद्रधनदैर्गुप्ता वरुणेन च धीमता॥१९९॥ साप्रदीप्ताञ्चिपवना नारायणपरायणा । सा समुद्रौघसदृशी दीप्यमाना महाचमू: ॥२००॥ रराजारस्त्रवतीभीमा यक्षगंधर्वशालिनी । तयोश्चम्बोस्तदानी तु बभूव ससमागमः: ॥२० १॥ द्यावापृथिव्योस्संयोगो यथास्याद्युगपर्यये । तद्युद्दमभवद्धोरं देवदानवसंकुलम् ॥२०२॥ क्षमापराक्रम परं सदर्प विनयस्य च । निक्चक्रमुर्बलाभ्यां तु भीमाभ्यां च सुरासुराः ॥२०३॥ ू र्वापराभ्यां संरब्धाः सागराभ्यामिवांबुदाः । ताभ्यां बलाभ्यां सहृष्टाश्चेरुस्ते देवदानवाः ॥२०४॥ वनाभ्यां पार्वतीयाभ्यां पुष्पिताभ्यां यथानगाः । समाजघ्नुस्तथा भेरीः शंखान्दध्मुरनेकशः ॥२०५॥ ब्रह्मांडं च भुवं चैव दिशश्च समपूरयन् । ज्याघाततलनिर्घोषो धनुषां कूजितानि च ॥२०६॥ तथा काल के समान भयङ्कर मुसलों को फेंककर युद्ध करने योग्य मुसलों । अखों के समान प्रतीत होने वाले पत्थरों, भयङ्कर पर्वतों, पट्टिसों, भिन्दिपलों तथा उत्तम लोहे से निर्मित परिधों । मार डालने वाली भारी शतघ्नियों ॥१९१-१९२॥ युगयंत्र के द्वारा छोड़े जाने वाले हलायुधों, हाथ भर चौड़े, पाशों, परिघों ॥१९३॥ जिनके मुख पर सर्प विद्यमान थे ऐसे बाणों, वज्रों, असो, चमकते हुए तोमरों ॥१९४॥ हाथ में गृहीत कृपाणों जो चमक रहे थे इस प्रकार के त्रिशूलों से युक्त दैत्यों वाली सेना जो धनुष धारण किए हुए थी ।।१९५॥ उसने युद्ध में कालनेमि को आगे किया था । इस प्रकार की दैत्यों की सेना सुशोभित हो रही थी ॥१९६।। देवताओं की भी सेना जिसके सारे अङ्ग सुरक्षित थे, वह इन्द्र के द्वारा संरक्षित होने के कारण प्रसन्न हो रही थी ॥१९७॥ वह सूर्य एवं चंन्द्रमा दोनों के शीत तथा उष्ण तेज से युक्त थी । वायु के वेग से देखने में सुन्दर तारागण ही उसके पताके थे ॥१९८॥ मेघ उसके वस्त्र का काम करते थे । तथा उस सेना रूपी नारी के ग्रह तथा नक्षत्र ही हास के समान थे । उसकी रक्षा यम, इन्द्र तथा वरुण कर रहे थे ॥१९९॥ वह सेना नारायणाश्रित थी, और वह वायु तथा अग्नि से प्रदीप्त हो रही थी । वह महासेना सातो समुद्र के समान देदीप्यमान थी ॥२००॥ अखों से सुशोभित होने वाली वह यक्षों एवं गन्थर्वो से युक्त थी । उन दोनों सेनाओं का जब आमने सामने समागम हुआ ॥२०१॥ उस समय युग की समाप्ति की बेला में होने वाले द्युलोक तथा भूलोक के समागम के समान, प्रतीत हो रहा था । देव तथा दनवों से व्याप्त वह भयङ्कर युद्ध हुआ ॥२०२॥ देवता क्षमा प्रधान थे तथा दैत्य पराक्रम प्रधान थे । मानो उससे नम्रता प्रवाहित हो रही थी । दोनों भयङ्कर सेनाओं सेदेवता और असुर निकले ॥२०३॥ लग मृहा था जैसे पूर्व तथा पश्चिम दोनों समुद्रों के मेघ परस्पर में टकरा रहे हों। उन दोनों सेनाओं में देवता और दानव प्रसन्नता पूर्वक संचरण कर रहे थे ॥२०४॥ वे दोनों पर्वतीय बनों के पुष्पित पर्वतों के समान प्रतीत होते थे । उसी समय भेरी बज उठी, अनेक शङ्क बजने लगे ॥२०५॥ सेनाओं ने ब्रह्माण्ड, भूलोक तथा सभी दिशाओं को धनुष के टङ्कोर की ध्वनि से भर दिया ॥२०६॥ दुन्दुभियों की ध्वनि से दैत्यों की
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