Srishti Khanda Extracted Page 551
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-551
Sanskrit Original
सुवर्णवर्ण वपुषं सुपर्णखेचरोत्तमम् । तमन्वयुः सुरगणा मुनयश्च समाहिताः॥४४॥ गीर्भिः परममंत्राभिस्तुष्टुवु्च गदाधरम्। तद्वैश्रवणसंश्लिष्टं वैवस्वतपुरः सरम् ॥४५॥ वारिराजपरिक्षिप्तं देवराज विराजितम् । पवनाबद्धनिर्धोषं संप्रदीप्तहुताशनम् ॥४६॥ विष्णोर्जिष्णोः सहिष्णोश्च भ्राजिष्णोस्तेजसावृतम्। बलंबलवदुद्रिक्ते युद्धाय समवर्तत ॥४७॥ स्वस्त्यस्तुदेवेभ्य इति बृहस्पतिरभाषत । स्वस्त्यस्तुदैत्येभ्य इति उशनावाक्यमाददे ॥४८॥ ताभ्यां बलाभ्यां संजज्ञे तुमुलो विग्रहस्तथा । सुराणामसुराणां च परस्परजयैषिणाम् ॥४९॥ दानवा दैवतैः सार्द्ध नाना ग्रहरणोद्यमाः । समीयुर्युध्यमाना वै पर्वता इव पर्वतैः ॥५०॥ तत्सुरासुरसंयुक्तं युद्धमत्यद्धतं बभौ । धर्माधर्मसमायुक्तं दर्पेण विनयेन च॥५१॥ ततो हयैः प्रजवितै वारणैश्च प्रचोदितैः । उत्पतद्धिश्च गगने सासिहस्तैः समंततः ॥५२॥ क्षिप्यमाणैश्च मुसलैः संपर्ताद्धश्च सायकैः । चापेर्विस्फार्यमाणैश्च पात्यमानैः सुदारुणैः॥५३॥ तद्युद्धमभवद्धोरं देवदानवसंकुलम् । जगतस्त्रासजननं युगसंवर्तकोपमम् ॥५४॥ स्वहस्तमुक्तैः परिधै मुद्ररैश्चैव पर्वतैः । दानवास्समरे जब्नुर्देवानिंद्रपुरोगमान् ॥५५॥ ते वध्यमाना बलिर्भिदानवै जितकाशिभिः । विषण्णवदना देवाजग्मुरार्ति परां मृधे ॥५६॥ ते चाख्रशूलमथिता: परिधैर्भिन्नमस्तकाः । भिन्नोरस्कादितिसुतैः स्त्वद्रक्ता रणे बहु ॥५७॥ सूदिताः शरजालैश्च निर्यत्नाश्च शरैः कृताः। प्रविष्टा दानवीं मायां न शेकुस्ते विचेष्टितुम् ॥५८॥ समान शरीर वाले, पक्षियों में श्रेष्ठ गरुड का अनुगमन देवता और समाहित मुनिगण कर रहे थे ॥४४॥ वे लोग वैदिक मन्त्रों से भगवान् गदाधर की स्तुति कर रहे थे । उसके सुनने से संश्लिष्ट यमराज जिसमें आगे खड़े थे वरुण देवता के द्वारा परिक्षिप्त तथा इन्द्र से सुशोभित, वायु की ध्वनि से युक्त तथा जिसमें अग्नि प्रज्जवलित हो गये थे॥४६॥ विजयी, सहिष्णु तथा देदीप्यमान भगवान् विष्णु के तेज से संरक्षित बलवानों से युक्त देवताओं की सेना के युद्ध करने के लिए उद्यत देखकर ॥४७॥ आचार्य वृहस्पति ने आशीर्वाद दिया-- देवताओं का कल्याण हो । उसके बाद शुक्राचार्य ने कहा दैत्यों का कल्याण हो ॥४८॥ उसके बाद दोनों सेनाओं के बीच भयङ्कर युद्ध होने लगा । देवता और असुर परस्पर में एक दूसरे पर विजय प्राप्त कर लेना चाहते थे । देवताओं की सेना विजय से युक्त धर्मावलम्बिनी थी तथा दैत्यों की सेना दर्प सम्पन्न तथा अधर्मावलम्बिजी थी ॥५१॥ उसके बाद वेग सम्पन्न अश्वों तथा हाथियों के प्रेरित होने के कारण, वीर अपने हाथ में कृपाण लेकर आकाश में उछल रहे थे ॥५२॥ मूसल का प्रहार किया जा रहा था तथा बाण गिर रहे थे । धनुष का टङ्कोर किया जा रहा था तथा भयङ्कर बाण बरसाये जा रहे थे॥५३॥ इस तरह का देवों तथा दानवों से व्याप्त वह भयङ्कर युद्ध हुआ । वह युद्ध संसार को भयभीत कर देने वाला युगान्त कालिक संवर्तक के समान वह युद्ध था ॥५४॥ दानवों ने परिध, मुद्र पर्वत इत्यादि के प्रहार से इन्द्र इत्यादि समस्त देवताओं को मारा ॥५५॥ समर विजयी, बलवान् दानवों के द्वारा मारे जाते हुए देवता दु:खी हो गये और युद्ध में अत्यन्त आर्त बन गये ॥५६॥ असरों तथा शूलों से मथ दिए गये, परिघ के प्रहार से जिनका शरीर फट गया था, दैत्यों ने जिनकी छाती को छेद दिया था, जिनका बहुत अधिक रक्त बह चुका था ॥५७॥ बाण समूह सेमारे गये तथा यत्नहीन बने हुए वे देवता दानवों की माया के अविष्ट होने के कारण कोई चेष्टा भी करने में असमर्थ हो गये ॥५८॥ देवताओं की सेना स्तम्मित तथा निष्प्राण जैसी लगने लगी । दैत्यों ने उनके आयुधों को प्रयत्न हीन
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