Srishti Khanda Extracted Page 502
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-502
Sanskrit Original
ततः प्रभृति काकुत्स्थ दंडकारण्यमुच्यते । एतत्ते सर्वमाख्यातं यन्मां पृच्छसि राघव ॥६०॥ संध्यामुपासितुं वीर समयो ह्लातिवर्तते। एतेमहर्षयो रामपूर्णकुंभाः समंततः ॥६९॥ कृतोदका नरव्याघ्रपूजयन्ति दिवाकरम् । सर्वैत्रईषिभिरभ्यस्तैः स्तोत्रे ब्रह्मादिभिः कृतैः ॥६२॥ रविरस्तं गतो राम गत्वोदकमुपस्पृश। ऋषेर्वचनमादाय रामः संध्यामुपासितुम् ॥६३॥ उपचक्राम तत्पुण्यं ससरो रघुनंदनः । अथ तस्मिन्वनोद्देशे रम्ये पादपशोभिते ॥६४॥ नदीपुण्ये गिरिवरे कोकिला शतमंडिते। नाना पक्षिरवोद्याने नानामृगसमाकुले ॥६ ५॥ सिंहव्याघ्रसमाकीर्णे नानाद्विजसमावृते । गृध्रोलूकौ प्रवसितौ बहून्वर्घगणानपि॥६६॥ अथोलूकस्य भवनं गृध्रः पापविनिश्चयः । ममेदमिति कृत्वाऽसौ कलहं तेन चाकोरात् ॥६७॥ राजा सर्वस्य लोकस्य रामो राजीवलोचनः । तं प्रपद्यावहै शीघ्रं कस्यैतद्भवनं भवेत् ॥६८॥ गृघ्रोलूकौ प्रपद्येतां जातकोपावमर्षिणौ। रामं प्रपद्य तौ शीघ्रं कलिव्याकुलचेतसौ ॥६९॥ तौ परस्परविद्देषौ स्पृशतश्चरणौ तथा। अथ दुष्ट्वा राघवेंद्रं गृध्रोवचनमब्रवीत् ॥७०॥ सुराणामसुराणां च त्वं प्रधानो मतो मम । बृहस्पतेश्च शुक्राच्च त्वं विशिष्टो महामतिः ॥७१॥ परावरज्ञो भूतानां मर्त्ये शक्र इवापरः । दुर्निरीक्षो यथा सूर्यो हिमवानिव गौरवे॥७२॥ सागरश्चासि गांभीर्ये लोकपालो यमोहयसि । क्षांत्या धरण्या तुल्योसि शीघ्रत्वे ह्ानिलोपमः ॥७३॥ गुरुस्त्वं सर्वसंपन्नो विष्णुरूपोसि राघव । अमर्षी दुर्जयो जेता सर्वास्रविधिपारगः ॥७४॥ वैसा ही सब कुछ भस्म हो गया ॥५८॥ हे राघव ! उसी के कारण दण्ड विन्ध्य पर्वत का राज्यधर्षण करने पर शुक्राचार्य के द्वारा शापग्रस्त हो गया ॥५९॥ हे काकुत्स्थ उसी समय से यह दण्डकारण्य कहलाने लगा । इसतरह से आपने जो मुझसे पूछा वह सब मैंने बतला दिया ॥६०॥ हे वीर ! सन्ध्या करने की बेला बीत रही है ये सभी महर्षि गण चारो ओर घड़े में जल भरकर ब्रह्मा आदि के द्वारा निर्मित तथा ऋषियों के द्वारा अभ्यस्त किए गये स्तोत्रों से सूर्य की पूजा कर रहे हैं ।॥६१-६२॥ हे राम ! सूर्य अस्त हो गये, तुम भी जाकर जल का आचमन करो । ऋषि की वाणी को सुनकर सन्ध्योपासन करने के लिए श्रीरामचन्द्र भी उस पवित्र सरोवर पर गये, उसके बाद वृक्षों से सुशोभित उस वन प्रदेश में ॥६३-६४॥ नदी से पवित्र बने श्रेष्ठ पर्वत पर अनेक कोकिलाओं, पक्षियों तथा मृगों से मण्डित सिहों तथा व्याघ्रों से परिपूर्ण तथा अनेक पक्षियों से व्याप्त उद्यान में अनेक वर्षों से एक गृध्र तथा एक उल्लू दोनों रहते थे ॥६५-६६। उसके बाद पापी गृध्र उल्लू के निवास स्थान को यह मेरा निवास स्थान है, यह सोचकर उसके साथ कलह किया ॥६७॥ उसने कहा हमदोनों सम्पूर्ण संसार के स्वामी श्रीराम के पास चलें और पूछें कि यह भवन किसका है ?॥६८॥ क्रोध करके गृध्र और उल्लू दोनों कलह से व्याकुल हृदय वाले होकर शीघ्र ही श्रीरामचन्द्रजी के पास गये ॥६९॥ परस्पर में एक दूसरे से विद्वेष करने वाले उन दोनों ने श्रीरामचन्द्रजी के चरणों का स्पर्श किया । इसके बाद श्रीरामचन्द्रजी को देखकर गृध्र ने कहा ॥७०॥ मेरे मतानुसार आप असुरों तथा सुरों में प्रधान हैं, किञ्च आप बृहस्पति तथा शुक्राचार्य दोनों से अधिक बुद्धिमान हैं ॥७१॥ सभी जीवों के परावर तत्त्व के ज्ञाता आप मनुष्यों के इन्द्र के समान प्रशासक हैं । आप सूर्य के समान तेजस्वी होने के कारण दुर्निरीक्ष्य हॅ, और हिमालय के समान गुरुता सम्पन्न हैं ॥७२॥ गाम्भीर्य के विषय में आप सागर के समान हैं और लोकपालों में आप यम हैं ।क्षमा के विषय में आप पृथिवी के समान हैं, शीध्रता करने में आप वायु के समान हैं ॥७३॥ आप गुरुत्व सम्पन्न विष्णु स्वरूप हैं । क्रोध करने पर आपको कोई जीत नहीं सकता है तथा आप समस्त शास्त्रों की विधि के
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