Srishti Khanda Extracted Page 488

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-488

padma-puranasrishti-khandacreation-cosmologypartialpage-extract

Sanskrit Original

निष्कृष्य कोशाद्विमलं शिरश्चिच्छेद राघवः । तस्मिन् शूद्रे हते देवाः सेन्द्राश्राग्रिपुरोगमाः ॥८६॥ साधुसाध्विति काकुत्स्थं प्रशशंसुर्मुहुर्मुहुः । पुष्पवृष्टिश्च महती देवानां ससुगंधिमी ॥८७॥ आकाश द्विप्रमुक्त तु राघवं सर्वतोकिरत्। सुप्रीताश्चाब्रुवन् देवा रामं वाक्यविदांवरम् ॥८८॥ सुरकार्यमिदं सौम्यकृतं ते रघुनदन। गृहाण च वरं राम यमिच्छसि महाव्रत ॥८९॥ त्वत्कृतेन हि शूद्रोऽयं सशरीरोभ्यगाहिवम् । देवानां भाषितं श्रुत्वा राघवः सुसमाहितः ॥९ ०॥ उवाच प्राञ्जलिर्वाक्यं सहस्राक्षं पुरंदरम्। यदि देवाः प्रसन्ना मे वराहो यदि वाप्यहम् ॥९१॥ कर्मणा यदि मे प्रीता द्विजपुत्रः स जीवतु। वरमेतद्धि भवतां कांक्षितं परमं हि में ॥९२॥ ममापराधाद्वालोऽसौ ब्राह्मणस्यैक पुत्रकः । अप्राप्तकालः कालेन नीतो वैवस्वतक्षयम् ॥९३॥ तं जीवयत भद्रं वो नानृतीस्यामहं गुरोः । द्विजस्य संश्रुतोह्मथो जीवयिष्यामि ते सुतम् ॥९४॥ मदीयेनायुषा बालं पादेनार्धेन वा सुराः । जीवेदयं वरो मह्यं वरकोट्यधिको वृतः ॥९५॥ राघवस्य तु तद्वाक्यं श्रुत्वा विबुधसत्तमाः । प्रत्यूचुस्ते महात्मानं प्रीताः प्रीतिसमन्विताः ॥९६॥ निर्वृतो भव काकुत्स्थ ब्राह्मणस्यैकपुत्रकः। जीवितं प्राप्तवान्भूयः समेतश्चापि बंधुभिः ॥९७॥ यस्मिन् मुहूर्ते काकुत्स्थ शूद्रोऽयं विनिपातितः । तस्मिन् मुहूर्ते सहसा जीवेन समयुज्यत ॥९८॥ स्वस्ति प्राप्रुहि भद्रं ते साधयामः परंतपः । अगस्त्यस्याश्रमपदे द्रष्टारः स्म महामुनिम् ॥९९॥ स तथेति प्रतिज्ञाय देवानां रघुनंदनः । आरुरोह विमानं तं पुष्पकं हेमभूषितम् ॥१००॥ इति श्रीपद्ममहापुरणे प्रथमे सृष्टिखंडे शुद्रतापसवधो नाम पंचत्रिंशोऽध्याय: ॥३५॥ —ke— को काट दिया । उस शूद्र के मार दिए जाने पर इन्द्र तथा अग्नि आदि देवता ॥८६॥ बहुत अच्छा, बहुत अच्छा कहकर श्रीराम की बार-बार प्रशंसा किए । देवताओं ने श्रीरामचन्द्र पर सुगन्धित पुष्पों की आकाश से खूब वर्षा की। और प्रसन्न होकर देवताओं ने वाक्यज्ञों में श्रेष्ठ श्रीराम से कहा ॥८८॥ हे सौम्य रघुनन्दन ! आपने यह देवताओं का कार्य किया है । हे महाब्रत श्रीराम ! आप जो चाहें वरदान हमलोगों से माँग लें ॥८९॥ आपके कारण यह शूद्र सशरीर स्वर्ग नहीं जा सका । देवताओं की वाणी सुनकर श्रीरामचन्द्रजी ने ॥९ ०॥ हाथ जोड़कर इन्द्र से कहा यदि देवगण मेरे ऊपर प्रसन्न हैं, और मैं वरदान प्राप्त करने के योग्य हूँ । यदि मेरे इस कर्म से देवता प्रसन्न हुए हैं तो ब्राह्मण का पुत्र जीवित हो जाय । मैं यही अत्यन्त प्रिय वरदान आपलोगों से प्राप्त करना चाहता हूँ ॥९ २॥ मेरे ही पाप के कारण ब्राह्मण का इकलौता पुत्र बिना समय के काल का ग्रास बन गया और यमलोक चला गया ॥९३॥ उसी को आपलोग जीवित कर दें । मैं मृषाभाषी न बनूँ । ब्राह्मण से मैंने कहा है कि मैं आपके पुत्र को जीवित करूंगा।९४॥। मेरे ही चौथाई अथवा आधी आगु से हे देवताओं. वह बालक जीवित हो जाय । यह वरदान मेरे लिए करोड़ों वरदानों से भी बड़ा बरदान है ॥९५॥ श्रीरामचन्द्रजी की वाणी को सुनकर देवताओं ने श्रीराम से प्रसन्न होकर प्रेमपूर्वक कहा ॥९६॥ हे काकुत्स्थ ! ब्राह्मण का इकलौता पुत्र जीवित होकर अपने बांधवों से मिल चुका है ॥९७॥ हे काकुत्स्थ जिस मुहूर्त में आपने इस शूद्र को मारा उसी मुहुर्त में वह बालक सहसा जीवित हो गया ॥९८॥ हे श्रीणमचन्द्र !आपका कल्याण हो, हमलोग जा रहे हैं, हमलोग महर्षि अगस्त्य के आश्रम में जाकर उनका दर्शन करने वाले हैं ॥९९॥ उसके बाद श्रीणमचन्द्रजी ठीक है, यह कहकर उस सुवर्णालङ्कृत विमान पर चढ गये ॥१००॥ इसतरह श्रीपद्ममहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के शूद्रतापसयध नामक पैतीसवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।। ३५।। —— ke

No translation available yet.

Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know