Srishti Khanda Extracted Page 464

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-464

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Sanskrit Original

ब्रह्महत्यादि पापानि इह लोके कृतान्यपि । अकामतः कामतो वा तानि नश्यंति तत्क्षणात्॥९६५॥ इह लोके दरिद्रो यो भ्रष्टराज्योऽथवा पुनः । स्थानेष्वेतेषु वै गत्वा मां पश्यति समाधिना ॥१६६॥ कृत्वा पूजोपहारं च स्नानं च पितृतर्पणम् । कृत्वा पिंडप्रदानं च सो5चिराहु:खवर्जित: ॥१६७॥ एकछत्रोभवेद्राजा सत्यमेतन्न संशय: । इह राज्यानि सौभाग्यं धनं धान्यं वरस्त्रियः ॥१६८॥ भवंति विविधास्तस्य यैर्यात्रापुष्करे कृता। इदं यात्राविधानं यः कुरुते कारयेत वा॥१६९॥ श्ृणोति वा स पापैस्तु सर्वैरेव प्रमुच्यते । अगम्यागमनं येन कृतं जानाति मानवः ॥१७०॥ ब्रह्मक्रियायालोपेन बहुवर्षकृतेन च। यात्रा चेमां सकृत्कृत्वा वेदसंस्कारमाप्रुयात् ॥१७९॥ किमत्र बहुनोक्तेन इदमस्तीह शङ्कर । अप्राप्यं प्राप्यते तेन पापं चापि विनश्यति ॥१७२॥ - सर्वयज्ञफलैस्तुल्यं सर्वतीर्थफलप्रदम्। सर्वेषां चैव वेदानां समाप्तिस्तेन वैकृता ॥१७३॥ यः कृत्वापुष्करे संध्यां सावित्रीं समुपासिता । स्वपत्नी हस्त दत्तेन पौष्करेण जलेन तु ॥१७४॥ भृंगारेण वरेणैव मृण्मयेनापि शङ्कर । आनीय तज्जलं पुण्यं संध्योपास्तिर्दिनक्षये॥९७५॥ समाधिना समाधेया सप्राणायामपूर्विका । तस्यां कृतायां यत्पुण्यं तच्छृणुष्व हराद्यमे ॥१७६॥ तेन द्वादशवर्षाणि भवेत्संध्या सुवंदिता । अश्वमेधफलं स्नाने दाने दशगुणं तथा ॥१७७॥ उपवासे प्यनंतं च स्वयं प्रोक्तं मयानघ। सावित्र्याः पुरतो यस्तु दंपत्योभोजनं ददेत् ॥१७८॥ तेनाहं भोजितस्तत्र भवामीह न संशय: । द्वितीयं भोजयेद्यस्तु भोजितस्तेन केशवः ॥१७९॥ की प्राप्ति होती है ॥१६२-१६३॥ ऐसा करने वाला प्रलयकाल पर्यन्त ब्रह्मलोक में निवास करता है । पुन: सृष्टिकाल के आने पर वह वैराज संज्ञक देवता की योनि में जाता है ।।१६४।। वह यदि इस लोक में ब्रह्महत्या आदि पापों को जानकर अथवा अनजाने में भी किए रहता है, वे सब पाप उसी क्षण विनष्ट हो जाते हैं ॥१६५॥ इस लोक में जो दरिद्र हें अथवा जो राज्यश्रष्ट हो गये हैं वे लोग भी यदि उपर्युक्त स्थानों में जाकर भक्तिपूर्वक मेरा दर्शन करते हैं उपहार समर्पण पूर्वक मेरी पूजा करते हैं तथा स्नान करके पितरों का तर्पण तथा पिण्ड दान करते हैं तो वे शीघ्र ही दुःख रहित हो जाते हैं ॥१६६-१६७॥ ऐसे लोग एकछत्र राजा हो जाते हैं, पुष्करतीर्थ की यात्रा करने वाले लोगों को राज्य, सौभाग्य,धन-धान्य एवं श्रेष्ठ स्त्रियों की प्राप्ति होती है । जो इस यात्रा का विधान करते है, अथवा करवाते हें ॥१६८-१६९॥ अथवा इसका श्रवण करते हैं वे लोग समस्त पापों से मुक्त हो जाते हैं ।ब्रह्मक्रिया का लोप हो जाने के कारण जो मनुष्य अनेक वर्षो तक अगम्यागमन किये रहते हैं वे भी इस पुष्कर तीर्थ की एक बार भी यात्रा करके वैदिक संस्कार को प्राप्त कर लेते हैं ॥१७०-१७१॥ हे शङ्कर ! इस विषय में बहुत अधिक क्या कहना है? यहाँ पर जो व्यक्ति अपनी पत्नी के हाथ से लाये गये पुष्कर तीर्थ के जल से संध्योपासन करके सावित्री देवी की उपासना करता हैं, वह व्यक्ति अप्राप्य वस्तु को भी प्राप्त कर लेता है, उसके सारे पाप विनष्ट हो जाते हैं । यह तीर्थ समस्त यज्ञों के फल को प्रदान करने वाला तथा सभी तीर्थो के फल को प्रदान करने वाला है ॥१७२-१७४॥ हे शङ्कर ! मिट्टी की झारी से पुष्कर का जल लाकर जो व्यक्ति प्रणायाम पूर्वक सायं सन्ध्या उस जल से भक्ति पूर्वक करता है, उसको जिस पुण्य की प्राप्ति होती है, उसे मैं तुम्हे बतलाता हूँ ॥१७६॥ उस संध्या के द्वारा बारह वर्ष पर्यन्त संन्ध्या करने का फल प्राप्त होता है । यहाँ स्नान करके दान करने का फल अश्वमेध यज्ञ के दश गुना अधिक फल देने वाला है ॥१७७॥ हे अनघ ! में स्वयं कहता हूँ कि यहाँ पर उपवास करने का अनन्त फल होता है । सावित्री देवी के समक्ष जो व्यक्ति ब्राह्मण दम्पत्ती को भोजन कराता है ॥१७८॥ उसके द्वारा मुझको ही भोजन कराया

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