Srishti Khanda Extracted Page 458
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-458
Sanskrit Original
विष्णुरुवाच नमोस्त्वनंताय विशुद्धचेतसे स्वरूपरूपाय सहस्रबाहवे । सहस्ररश्मिप्रभवाय वेधसे विशालदेहाय विशुद्धकर्मणे ॥९५॥ समस्तविश्वर्तिहराय शंभवे समस्तसूर्यानलतिग्मतेजसे । नमोस्तु विद्यावितताय चक्रिणे समस्तधीस्थान कृते सदा नमः ॥९६॥ अनादिदेवाच्युतशेखरप्रभो भाव्युद्धवद्धूतपते महेश्वर । मरुत्पते सर्वपते जगत्पते भुवस्पते भुवनपते सदा नमः ॥९७॥ यज्ञेश नारायण जिष्णु शङ्कर क्षितीश विश्वेश्वर विश्वलोचन । शशांक सूर्याच्युत वीरविश्व प्रवृत्तमूर्ते मृतमूर्त अव्यय ॥९८॥ ज्वलद्धताशर्चिनिरुद्धमंडल प्रदेशनारायणविश्वतोमुख । समस्तदेवार्तिहरामृताव्यय प्रपाहि मां शरणगतं तथा विभो ॥९९॥ वक्त्राण्येनकानि विभोतवाहं पश्यामि यज्ञस्य गतिं पुराणम् । ब्रह्माणमीशं जगतां प्रसूतिं नमोस्तु तुभ्यं प्रपितामहाय ॥९००॥ संसारचक्रक्रमणैरनेकैः क्वचिद्धवान् देववराधिदेवः । तत्सर्वविज्ञानविशुद्धसत्व रूपास्यसे किं प्रणमाम्यहं त्वाम् ॥९०९॥ एवं भवंतं प्रकृतेः पुरस्ता द्योवेत््यसौ सर्वविदांवरिष्ठः । गुणान्वितेषु प्रसभं विवेद्यो विशालमूर्तिस्त्विह सूक्ष्मरूपः ॥ १० २॥ भगवान् विष्णु ने कहा-- अनन्त रूप, विशुद्ध अन्तःकरण वाले, आत्मारूप, अनन्त भुजाओं वाले, अनन्ततेजः सम्पन्न, विशालकाय तथा विशुद्ध कर्मो को करने वाले ब्रह्माजी को नमस्कार है ॥९५॥ सम्पूर्ण संसार के कष्ट को विनष्ट करने वाले, कल्याण करने वाले तथा समस्त सूर्य वायु और अग्नि के तेज से सम्पन्न, विद्याओं का विस्तार करने वाले, चक्र धारण करने वाले तथा समस्त ज्ञानो को देने वाले आपको हमारा नमस्कार है ॥९६॥ आप अनादि देव हैं, अपनी प्रतिज्ञा से कभी च्युत नहीं होने वाले होने के कारण अच्युत स्वरूप हैं, आप शङ्कर रूप से शेषनाग का मुकुट धारण करते हैं । हे महेश्वर ! आप ही अतीत एवं अनागत कालों के स्वामी हैं । हे मरुद्रणों के स्वामिन्! सबों के स्वामिन्, जगत् के स्वामिन्, पृथिवी के स्वामिन् तथा भुवनों के स्वामिन् आपको मेरा सदैव ही नमस्कार है॥९७॥ यज्ञेश, नारायण, विष्णु, शङ्कर, पृथिवीश, विश्वेश्वर तथा विश्व लोचन स्वरूप, चन्द्रमा, सूर्य, अच्युत तथा समस्तजगत्शरीरक, अमृतमूर्ति तथा अव्यय स्वरूप, ब्रह्माजी आपको मेरा नमस्कार है ॥९८।॥ आप अपने देदीप्यमान ज्वालाओं से युक्त सम्पूर्ण मण्डल में व्याप्त है । आप नारायण स्वरूप हैं, आपके हर ओर मुख हैं । सभी देवताओं के कष्ट को आप दूर करने वाले हैं, अमृत स्वरूप, अविनाशी आप हैं । आप मेरी रक्षा करें । हे विभो ! मैं आपके शरणागत हुँ ॥९९॥ मैं आपके अनेक मुखों को देख रहा हूँ, आप यज्ञ के आश्रय हैं । आप ही ब्रह्मा, रुद्र तथा जगत् को उत्पन्न करने वाले हैं, प्रपितामह स्वरूप आपको नमस्कार है ॥१००॥ आपने अनेक प्रकार से संसार मण्डल को आक्रान्त कर रखा है । आप कहीं पर तो देवाधिदेव हैं । सभी विशुद्ध बुद्धि वाले पुरुष आपकी उपासना करते हैं, मैं आपको प्रणाम करता हूँ ॥१०१॥ इस प्रकार से जो उपासक आपको प्रकृति से भी परे (श्रेष्ठ) तथा अद्वितीय, ब्रह्म स्वरूप जानता है वही सर्वज्ञं में श्रेष्ठ है । गुणमय पदार्थो में आप विराट् रूप से जानने योग्य हैं ।
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