Srishti Khanda Extracted Page 451
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-451
Sanskrit Original
श्रीपद्ममहापुणण चौंतीसवाँ अध्याय भीष्म उवाच कस्मिनूकाले भगवता ब्रह्मणा लोककारिणा । यज्ञियै यष्टुमारब्धं तद्भवान्वक्तुमर्हति॥ १॥ किं नामानो ऋत्विजस्ते ब्रह्मणाये प्रकल्पिताः। का च वै दक्षिणा तेषां दत्ता तेन महात्मना ॥२॥ यथा भूतं यथावृत्तं तथा त्वं मे प्रकीर्तय । सुमहत्कौतुकं जातं यज्ञं पैतामहं प्रति ॥३॥ पुलस्त्य उवाच पूर्वमेव मया ख्यातं यदा स्वायंभुवो मनुः । सृष्टवाप्रजापतीन् सर्वानुक्तः सृष्टिं कुरुष्व वै ॥४॥ स्वयं तु पुष्करं गत्वा यज्ञस्याहत्यविस्तरम् । ससंभारान् समानाय्य वह्णयागारेस्थितो भवत् ॥५॥ गायंति नित्यं गंधर्वा नृत्यंत्यप्सरसां गणा: । ब्रह्मोद्राताहोताध्वर्युश्चत्वारो यज्ञवाहकाः ॥६॥ एकैकस्य त्रयश्चान्ये परिवारा: स्वयंकृता: । ब्रह्मा च ब्राह्मणाच्छंसी पोता चाग्नीश्र एव च ॥७॥ आन्वीक्षिकी सर्वविद्या ब्राह्मी ह्योषा चतुष्टयी। उद्गाता च प्रत्युद्लाता प्रतिहर्ता सुब्रह्मण्यः ॥८॥ चतुष्टयी द्वितीयैषा तूद्वातुश्च प्रकीर्तिता । होता च मैत्रावरुणस्तथाऽच्छावाक एव च ॥९॥ ग्रावस्तुच्चचतुर्थोत्र तृतीया च चतुष्टयी । अध्वर्युश्च प्रतिष्ठाता नेष्टोन्नेता तथैव च ॥१०॥ चतुष्टयी चतुर्थ्येषा प्रोक्ता शांतनुनंदन । एते वै षोडशप्रोक्ता ऋत्विजो वेदचितकैः ॥११॥ ब्रह्माजी के यज्ञ के काल आदि का वर्णन, ब्रह्माजी की आज्ञा से लक्ष्मी सहित विष्णु के द्वारा सावित्री को मनाना, गौरी के साथ शिवजी द्वारा सावित्री देवी की प्रार्थना, सावित्री का ब्रह्माजी के पास आना, गायत्री और सावित्री का संवाद, यज्ञान्त स्नान के द्वारा ब्रह्माजी का सभी देवताओं को वरदान, विष्णुकृत ब्रह्म स्तुति, रुद्र कृत ब्रह्म स्तुति, ब्रह्मा द्वारा अपने निवास स्थान का वर्णन, ब्रह्माजी के स्थान का माहात्म्य, पुष्कर आदि तीर्थो में अनेक प्रकार के दानों की महिमा, पुष्कर तीर्थ में दीक्षा इत्यादि की विस्तृत विधि, ग्रहों के अनुकूल बनाने की विधि का वर्णन तथा श्वेतराजा की कथा भीष्मजी ने कहा-- आप मुझे यह बतलायें कि लोककर्ता ब्रह्माजी ने किस समय याज्ञ करना प्रारम्भ किया?।।१।। उस यज्ञ के ऋत्विजों का नाम क्या था ? जिन सबों को ब्रह्माजी ने ऋत्विज बनाया और उन सबों को ब्रह्माजी ने कौन सी दक्षिणा दी 2॥२॥ उस यज्ञ के समस्त वृत्तान्तों को आप मुझे बतलायें, पितामह ब्रह्माजी के यज्ञ के विषय में मुझे अत्यन्त उत्कण्ठा है ॥३॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- में पहले ही कह चुका हूँ कि जब ब्रह्माजी ने समस्त प्रजापतियों की सृष्टि करके उनसे कहा कि सृष्टि करो ॥४॥ स्वयं वे पुष्कर क्षेत्र में जाकर विस्तार पूर्वक यज्ञ की सारी सामग्रियों को लाकर यज्ञशाला में बैठ गये ॥५॥ उस समय सभी गन्धर्व सङ्गीत कर रहे थे और अप्सरायें नृत्य कर रही थीं, उस यज्ञ का प्रवर्तन करने वाले चार हुए ब्रह्मा, उद्गाता, अध्वर्यु और होता ॥६॥ इन चारों वे दूसरे और तीन-तीन परिवार नियुक्त हुए । ब्रह्मा, ब्राह्मणाच्छंसी, पोता और आग्नीप्र ।ये ब्रह्मा के परिवार हैं ॥७॥ ये सभी आन्वीक्षिकी तथा वेदविद्या में प्रवीण होते हैं । उद्गाता, प्रत्युद्राता, प्रतिहर्ता और सुब्रह्मण्य ॥८॥ ये चारो उद्गाता के परिवार होते हैं । होता, मैत्रावरुण तथा अच्छावाक ॥९॥ ग्रावस्तुत ये चारो तृतीय ऋत्विज होता के परिवार हैं । अध्वर्यु, प्रतिष्ठता, नेष्ट और नेता ॥१०॥ हे शन्तनु नंदन ! ये चारो चतुर्थ, ऋत्विज अध्वर्यु के परिवार हैं । वेद के चिन्तकों ने इन सोलह ऋत्विजों को बतलाया है ॥११॥ ब्रह्माजी ने तीन सौ साठ यज्ञों की सृष्टि की है । इन
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