Srishti Khanda Extracted Page 433

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-433

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Sanskrit Original

हक श्रीपद्ममहापुराण यज्ञै दनिस्तपोभिश्च यत्फलं प्राप्यते द्विजैः । तदत्रस्नानमात्रेण शूद्रैरपि स्वभावजैः ॥९६॥ दर्शनात्पुष्करस्यापि महापातकिनोपि ये। तेऽपि तत्पापनिर्मुक्ताः स्वर्गं यांति तनुक्षये ॥९७॥ तत्रोपवासी यज्ञस्य पुंडरीकस्य यत् फलम् । तत््राप्रोति नरः क्षिप्रमल्पायासेन पुष्करे ॥९८॥ माघमासे तिलान्यस्तु प्रयच्छति च सदिद्ठजे । यथाशक्ति च भक्त्या च सविष्णुभवने वसेत् ॥९९॥ तत्रोपवासं स्नानं च पंचगव्याशनं तथा । यःकरोति नरः सोपि देहांते स्वर्गमाप्नुयात् ॥१००॥ वसंति तत् समीपस्था येपि तस्करजातयः। तेपि तस्यानुभावेन स्वर्यान्ति च न संशयः॥९०२॥ ये पुनः शूदवृत्तिस्थास्त्रिरात्रोपोषिता नराः । प्रयच्छति द्विजेष्वर्थं ब्रह्मशक्तिसमन्विताः ॥१० २॥ ते मृता यानमारूढा: पद्मासनचतुर्भुजाः । ब्रह्मणा सह सायुज्यं प्राप्रुवंत्यपुनर्भवम् ॥१०३॥ गङ्गोद्धेदं यत्र गङ्गा संप्राप्ता सरितांवराम् । सरस्वती द्रष्टुकामा सांत्वार्थे प्रोद्नतांबरात् ॥१०४॥ तत्र गत्वा पयः पूतं सुरसिद्धनिषेवितम् । सारस्वतं च विमलं विद्याधरगणार्चितम् ॥१०५॥ पीतमेकांजलिमितं ये नाप्तं तेन तत्परम्। अवलोक्य दिशं पूर्वामाह गंगे सखि त्वया ॥१०६॥ एकाकिनी वियुक्तास्मि क्व यास्येहमबांधवा । तां विज्ञाय ततो गङ्गा रुदंती शोककर्शिताम् ॥१०७॥ पूर्वदेशात् समायाता द्रष्टुं तां दीनमानसाम्। दृष्ट्वा च तां महाभागा पघ्विज्य तु पीडिताम्॥९०८॥ े त्रे प्रमृज्य चैतस्याः प्राह गङ्गा वचस्तदा । मारोदीस्त्वं महाभागे दुष्करं ते कृतं सखि ॥१०९॥ देवकार्य यदन्येन कर्तुशक्येत नैवहि। एतस्मात्ते महाभागे द्रष्टुं देवाः समागताः॥९१०॥ प्रयास पूर्वक सेवन करना चाहिए ॥९४॥ जो लोग सरस्वती नदी के जल को ही सदा पीते हैं वे इस संसार में भी रहने वाले देवता हैं मनुष्य नहीं ॥९५॥ ब्राह्मण लोग अन्यत्र यज्ञ, दान तथा तपस्या के द्वारा जिस फल को प्राप्त करते हैं, उस फल की प्राप्ति यहाँ शूद्रो कोभी केवल स्नान करने से ही हो जाती है ॥९६।। यदि कोई महापातकी पुष्करों का केवल दर्शन भी करता है तो वह अपने पापों को विनष्ट करके शरीर त्याग करके स्वर्ग में चला जाता हैं।। ९ ७॥ अन्यत्र पौण्डरीक यज्ञ करने से जिस फल की प्राप्ति होती है, उस फल की प्राप्ति पुष्कर में उपवास करने मात्र से मनुष्य प्राप्त कर लेता है ॥९८॥ माघ के महीने में यदि कोई किसी ब्राह्मण को यहाँ अपनी भक्ति तथा शक्ति के अनुसार तिल दान करता है, वह भगवान् विष्णु के लोक में जाता है ॥९९॥ वहाँ पर कोई मनुष्य यदि स्नान करके पञ्चगव्य प्राशन करके उपवास करता है तो वह भी शरीर त्याग के बाद स्वर्ग जाता है ॥१००॥ पुष्कर के सन्निकट में जो चोर जाति के लोग निवास करते हैं वे भी पुष्कर के प्रभाव से स्वर्गलोक में जाते हैं; इसमें किसी भी प्रकार का संशय नहीं है ॥१०१॥ शूद्रवृत्ति से भी रहने वाले जो लोग तीन दिन तक वहाँ रहकर उपवास करते हैं तथा ब्राह्मणों को धन दान करते हैं, वे ब्रह्म शक्ति से सम्पन्न होकर मरने के बाद विमान पर चढकर चार भुजाओं वाले ब्रह्मा बनकर ब्रह्माजी से सायुज्य को प्राप्त करते हैं और पुनः इस संसार में नहीं आते हैं ॥१०३॥ पुष्कर तीर्थ के ब्रह्मोद्भेद नामक तीर्थ में ही गङ्गा नदी श्रेष्ठ सरस्वती से मिलने के लिए आयी थीं, वे आकाश से यहाँ आकर शान्ति प्राप्त कीं ॥१०४॥ वहाँ पर जाकर यदि कोई विद्याधरों से पूजित एवं देवताओं तथा सिद्धों से सेवित सरस्वती नदी के पवित्र जल को ॥१०५॥ एक अंजलि भी पी लेता है तो वह परमपद को प्राप्त कर लेता है । वहीं पर पूर्वाभिमुख होकर सरस्वती ने गङ्गाजी ने कहा सखि ! मैं तुमसे अलग हो रही हूँ; बाँधवों से रहित अकेली मैं कहाँ जाऊंगी ? सरस्वती को रोती हुयी शोक सन्तप्त देखकर पूर्व देश से सरस्वती से मिलने के लिए आयी हुयी गङ्गा ने उसे दुःखी देखकर उसका आलिङ्गन किया और आंखें के आँसू को पोंछकर कहा-- हे महाभागे ! रोओ मत; तुमने

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