Srishti Khanda Extracted Page 421
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-421
Sanskrit Original
रणभूमिं समासाद्य दैत्याः सर्वे रुरू विना। ततो बलं हतं दृष्ट्वा रुरुर्मायां तदाददे ॥९०॥ तया संमोहिता देव्यो देवाश्चापि रणाजिरे । तामस्या मायया देव्या सर्वमन्यंतमोऽ भवत् ॥९ १॥ ततो देवी महाशक्त्या तं दैत्यं समताडयत्। तया तु ताडितस्याजौ दैत्यस्य प्रगतं तमः ॥९२॥ मायायामथ नष्टायां तामस्यां दानवो रुरुः । पातालमाविशत्तूर्ण तत्रापि परमेश्वरी ॥९३॥ देवीभिः सहिता कुद्धा पुरतोभिमुखीस्थिता । रुरोस्तु दानवेंद्रस्य भीतस्याग्रे गतस्य च ॥९४॥ नखाग्रेण शिरश्छित्वा चमचादाय वेगिता । निष्पपाताथ पातालात्पुष्करं च पुनर्गिरिम् ॥९५॥ कन्या सैन्येन महता बहुरूपेण भास्वता । देवैस्तु विस्मितै दृष्टा चर्ममुंडधरा. रुरोः ॥९६॥ स्वकीये तपसः स्थाने निविष्टा परमेश्वरी । ततो देव्यो महाभागाः परिवार्य -व्यवस्थिताः॥९७॥ याचयामासुरव्यग्रा स्ता तु देवीं बुभुक्षिताः । बुभुक्षिता वयं देवि देहिनो भोजनं वरम्॥९८॥ एवमुक्ता ततो देवी दध्यौ तासां तु भोजनम्। नाध्यगच्छत्तदा तासां भोजनं चिन्तितम्महत् ॥९९॥ तदा दध्यौ ' महादेवं रुद्रं पशुपतिं विभुम् । सोऽपि घ्यानात्ससमुत्तस्थौ परमात्मा त्रिलोचनः॥९००॥ उवाच रुद्रस्तां देवीं किं ते कार्यविवक्षितम्। ब्रूहि देवि महामाये यत्ते मनसि वर्तते ॥१०१॥ शिवदूत्युवाच : छागमध्ये तु वै देवछागरूपेणवर्तसे । एतास्त्वा भक्षयिष्यन्ति भक्ष्यमीप्सितमादरात् ॥१०२॥ भक्षार्थमासां देवेश किंचिद्दातुमिहार्हसि। शूली कुर्वति मामेता भक्षार्थिन्यो महाबलाः ॥९०३॥ 20056 70272 जड sdb तया टील sas EO MSS EDM SUD BO था; इस तरह के कटे हुए रथ, घोड़े, हाथी तथा पैदल सेना संग्राम स्थल में गिर पड़ी ॥८९॥ उसके बाद रुरु को छोड़कर सभी दैत्य रणभूमि में आकर मारे गये । उसके बाद सेना को मारी गयी देखकर रुरु ने माया को अपनाया॥९ ०॥ युद्धस्थल में उसने देवियों तथा देवताओं को मोहित कर दिया । उसकी तामसी माया से सब कुछ घोर अन्धकाराच्छन्न हो गया ॥९१॥ उसके बाद देवी ने महाशक्ति से रुरु को मारा । उस शक्ति के द्वारा रुरु के मारे जाते ही अन्धकार समाप्त हो गया ॥९२॥ तामसौ माया के नष्ट हो जाने पर रुरु नामक दैत्य शीघ्र ही पाताल में प्रवेश कर गया । वहाँ भी परमेश्वरी उन-सभी देवियों के साथ उसके सामने क्रोध पूर्वक खड़ी हो गयी और सामने विद्यमान भयभीत दानव रुरु के शिर को अपने नख के अग्रभाग से काट दिया । और रुरु के शिर तथ चमड़े को लेकर पाताल से बाहर निकलीं । उसके बाद वे पुष्कर के यज्ञगिरि पर आयों ॥९३-९५॥ उनके साथ अनेक देदीप्यमान कन्याओं की सेना थी । रुरु के चमड़े तथा शिर को ली हुयी देवी को देखकर देवता आश्चर्यित हो गये।॥९६॥ उसके बाद परमेश्वरी अपनी तपस्या के स्थान में आकर बैठ गयी । उसके पश्चात् महाभाग देवियाँ उनको चारो ओर से घेर कर खड़ी हो गयीं ॥९७॥ वे भूखी होने के कारण देवी से भोजन माँगने लगीं उन सबों ने कहा-- हे देवि ! हमलोग भूखी हैं, हमलोगों को श्रेष्ठ भोजन दीजिये ॥९८। इस तरह से कहने पर देवी ने उन सबों के भोजन का चिन्तन किया । बहुत अधिक चिन्तन करने पर भी उन्हें भोजन की प्राप्ति नहीं हुयी ॥९९॥ उसके बाद महादेवी ने पशुपति महादेव रुद्र का ध्यान किया । ध्यान करते ही त्रिलोचन भगवान् शङ्कर का ध्यान टूट गथा॥१००॥ उन्होंने देवी से पूछा कि आप क्या कहना चाहती हैं ? हे महामाये देवि ! आपके मन में जो हो उसे आप बतलाइये ॥१० १॥ शिवदूती ने कहा-- हे देव ! छाग के भीतर आप छाग रूप से विद्यमान हैं, ये सभी देवियाँ अत्यन्त अभिप्रेत भक्ष्य होने के कारण आपको खायेंगी ॥१०२॥ हे देवेश ! इन सबों को खाने के लिए आप कुछ दीजिये । ये महाबलवान् देवियाँ भोजन चाहती हैं अतएव मुझको ही दुःख दे रही हैं ॥१०३॥ यदि ऐसा नहीं
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