Srishti Khanda Extracted Page 409

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-409

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Sanskrit Original

त्वद्वाहुबलाश्रित्य त्रिदिवे मखभागिनः । त्वया क्रतुशतैरिष्टं समाप्तवरदक्षिणैः ॥१३५॥ त्वया च घातितो वृत्रो नमुचिः पाकशासन। त्वदाज्ञाकारिणापूर्वं विष्णुना प्रभविष्णुना ॥१३६॥ हिरण्यकशिपोर्भ्राता हिरण्याक्षोऽपि घातितः । हिरण्यकशिपुयांत्र जङ्घेचारोप्यघातितः ॥१३७॥ वञ्रपाणिनमायांतमैरावतशिरोगतम् । संग्रामभूमौ दृष्ट्वा त्वां सर्वे नश्यंति दानवाः ॥१३८॥ ये त्वया विजिताः पूर्व दानवा बलवत्तराः । सहस्रांशेन तत्तुल्यो न भवामि कथंचन ॥१३९॥ एवंविधोऽसि देवेंद्र मम का गणना भवेत्। मां समुद्धर्तुकामेन त्वयैवागमनं कृतम् ॥१४०॥ करिष्यामि न संदेहो दास्ये प्राणानपि धुवम् । किमर्थं देवराजोक्ता भूमिरेषा त्वया हि मे॥१४१॥ इमे दाराः सुता गावो यच्चान्यद्विद्यते वसु । त्रैलोक्यराज्यमखिलं विप्रस्यास्य प्रदीयताम्॥९१४२॥ अपकोर्तिर्भवेन्मह्यं पूर्वेषां च न संशयः । गृहायातस्य शक्रस्य दत्तं बाष्कलिना न तु॥१४३॥ अन्योपि योर्थी मे प्राप्तः समे प्रियतरः सदा । भवानत्रविशेषेण विचारं मा कृथाः क्वचित्॥९४४॥ बृहत्त्रपा मे देवेंद्र यद्ूमेस्तु पदत्रयम् । ब्राह्मणस्य विशेषेण प्रार्थितं तु त्वया विभो ॥१४५॥ दास्ये ग्रामवरानस्य भवतस्तु त्रिविष्टपम् । अश्वान्गजान् भूमिधनं स्त्रियश्चोद्धित्रचूचुकाः ॥९४६॥ यासां दर्शनमात्रेण वृद्धोपि तरुणायते । तार्त्रियो वसुधां चैतां वामनस्य प्रतिग्रहम्॥९४७॥ प्रतिदास्यामि देवेन्द्र प्रसादः क्रियतां हि मे एतावदुक्ते वचने तदाबाष्कलिना नृप ॥९४८॥ पुरोधास्तूशनाप्राह दानवेंद्रं तदा वचः । भवान् राजा दानवेंद्र ऐश्वर्येष्टविधे स्थितः ॥१४९॥ सब ।।१३४।। आपके ही बाहुबल का सहारा लेकर यज्ञ के भागों को प्राप्त करते है । आपने स्वयं भी श्रेष्ठ दक्षिणा देकर सौ श्रेष्ठ यज्ञों को किया है ॥१३५॥ आपने ही वृत्रासुर, नमुचि तथा पाक नामक दैत्यों को मारा है, आपकी आज्ञा का पालन करने के लिए भगवान् विष्णु भी पूर्वकाल में ॥१३६॥ हिरण्यकशिपु के भाई हिरण्याक्ष को मारे थे और उन्होंने हिरण्यकशिपु को अपने जङ्घो पर रखकर मारा ॥१३७॥ ऐरावत के कन्धे पर बैठकर तथा हाथ में वज्र धारण किए हुए संग्राम भूमि में आते हुए आपको देखकर सभी दानव पलायन कर जाते हैं ॥१३८।। आपने पूर्व काल में जिन दानवों पर विजय श्राप्त किया है, उन सबों के हजारवें हिस्से के भी समान मैं नहीं हूँ ॥१३९॥ हे देवेन्द्र ! आप इस प्रकार के हैं, आपके सामने मेरी कौन सी गणना है । आप तो केवल मेरा उद्धार करने के लिए मेरे यहाँ आये हैं ॥१४०॥ मैं आपकी बातों को मानूँगा, इसमें कोई भी सन्देह नहीं है, में आपको अपने प्राणो को भी दे सकता हूँ । हे देवराज ! आपने यह छोटी सी भूमि ही क्यों मुझसे माँगा ॥१४१॥ पत्नी, पुत्र, गायें तथा दूसरी सम्पत्ति जो मेरी है वह तथा त्रैलोक्य का राज्य आप इस ब्राह्मण को दे दीजिये ॥१४२॥ यदि में ऐसा न करूँ तो मेरा अयश होगा । लोग कहेंगे कि घर आये हुए इन्द्र को वाष्कलि दान नहीं दे सका ॥१४३॥ दूसरे भी अतिथि मेरे पास आते हैं तो वे भी मुझको अधिक प्रिय होते हैं और आप तो उन अतिथियों में विशेष हैं, आप कोई भी विचार नहीं कीजिये ॥१४४॥ हे विभो ! मुझे सबसे अधिक लज्जा इस बात की है कि आप ब्राह्मण को देने के लिए तीन पग पृथिवी मुझसे माँग रहे हें ॥१४५॥ हे देवेन्द्र ! आप मुझ पर कृपा कीजिये; मैं इस वामन ब्राह्मण को श्रेष्ठ ग्रामों, अश्वों, गजों, भूमि, धन, युवति स्त्रिया, जिन सबों को देखकर वृद्ध व्यक्ति जैसे युवक हो जाता है, तथा इस पृथिवी को दूँगा, तथा आपको स्वर्गलोक दूँगा ॥१४६-१४७॥ जिस समय वाष्कलि इसतरह की बातें कर रहे थे ।१४८॥ उसी समय उनके पुरोहित शुक्राचार्य ने उनसे कहा-- हे देवेन्द्र आप राजा हैं आपके पास आठो प्रकार के ऐश्वर्य हैं॥१४९॥ किन्तु आपको उचित अनुचित का ज्ञान नहीं है, मुझे किसको क्या देना चाहिए, इसके विषय में आपको

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