Srishti Khanda Extracted Page 404

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-404

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Sanskrit Original

अतिप्रहर्षात्तु जगत्त्रयस्य मोहश्च दुःखानि च नाशमीयुः । जगौ च गन्धर्वगणोतिमात्रं भावस्वरै भृर्तुविमिश्रिताश्च ॥६७॥ सुराङ्गनाश्चापि च भावयुक्ता नृत्यंति तत्राप्सरसां समूहाः । तथैव विद्याधरसिद्धसंघा विमानयातै रुदिता भ्रमंति ॥६८॥ वदंति सत्यानृतकार्यनिर्णयं तथा भिरंगं प्रतिदर्शयंति । गायंति गेयं विनिवृत्तरागां मुहुर्मुहु ् दुः खसुखप्रभूताः ॥६९॥ नृत्यांति वै स्वर्गगताश्च ते तु धर्मार्जितंः स्वर्गमितो व्रजंति । इति विगतविषादे निर्मले जीवलोके तिमिर निकर मुक्तां निर्वृतिं प्राप्तुकामाः ॥७०॥ तत्रोचुः केचिदुर्व्यां जयजयभगवन् संप्रहृष्टाश्च केचि च्चेवं प्रोक्तप्रणादैरविरलमनसश्चानुवादै स्तथान्यैः । ध्याततेन्ये निगूढं जननभयजरामृत्युविच्छेदहेतो रित्येवं कृत्स्ममासीज्जगदिदमखिलं सर्वतः संपृहृष्टम् ॥७९॥ परमासाद्य यं विष्णुं ब्रह्माह जगतः कृते। जातोयं भवतामर्थे वामनो यदपीश्वरः ॥७२॥ एष ब्रह्मा च विष्णुश्च एष एव महेश्वरः । एष वेदाश्च यज्ञाश्च स्वर्गश्चैष न संशयः ॥७३॥ विष्णुव्याप्तमिदं सर्व जगत्स्थावरजङ्गमम्। एकः स तु पृथक्त्वेन स्वयंभूरितिविश्रुतः ॥७४॥ यथार्थवर्णके स्थाने विचित्रः स्फटिको मणिः । ततो गुणवशात्तस्य स्वयंभोरनुनर्त्तनम् ॥\७५॥ यथाहि गार्हपत्योग्रिरन्यसंज्ञां पुनर्व्रजेत् । लभेत संज्ञां भगवान् ब्राह्मादिषु तथाह्यसौ॥७६॥ सर्वथा वामनो देवो देवकार्य करिष्यति । एवं चिंतयतां तेषां भवितानां दिवौकसाम् ॥७७॥ ् रहर्षातिरेक के कारण त्रैलोक्य वासियों के शोक एवं दु:ख विनष्ट हो गये । गन्धर्वो ने भाव एवं स्वर से मिश्रित संङ्गीतों का गायन किया ॥६७॥ किञ्च अप्सराओं ने भी भाव भरे नृत्यों को किया और विद्याधर तथा सिद्धों का समूह विमानों पर चढकर अमण किया ॥६८॥ कुछ लोग सत्य तथा अनृत कार्य का निर्णय बतलाने लगे, कुछ लोग अपने अङ्गों का प्रदर्शन करने लगे, कुछ लोग विना राग के ही गीत गाने लगे, कुछ लोग बारम्बार अत्यधिक सुख का अनुभव करने लगे ॥६९॥ कुछ स्वर्ग में विद्यमान जीव नृत्य करने लगे, कुछ लोग धर्म से अजित स्वर्गलोक में जाने लगे । इस तरह जब सम्पूर्ण जीवों का विषाद विनष्ट हो गया । अज्ञान रूपी अन्धकार समूह से रहित जीव मुक्ति रूपी मोती को प्राप्त करने की इच्छा वाले हो गये ॥७०॥ कुछ लोग भूलोक में भी भगवान् का जय-जयकार मनाने लगे, कुछ लोग हर्षातिरेक के कारण गर्जने लगे । कुछ भगवद् भक्त उनके गुणों का गायन करने लगे । कुछ लोग जन्म मृत्यु के भय से रहित होकर मुक्ति प्राप्त करने के लए श्रीभगवान् का ध्यान करने लगे । इस तरह भगवान् वामन के जन्म काल में सम्पूर्ण जगत् हर्षित हो गया ॥७१॥ देवता लोग सोचने लगे कि ब्रह्माजी ने जिन्हें संसार का कल्याण करने के लिए कहा है । वे ही भगवान् विष्णु वामन का रूप धारण करके अवतीर्ण हुए हैं ॥७२॥ इसमें कोई भी संदेह नहीं है कि ये ही व्रह्मा, विष्णु तथा शङ्कर स्वरूप हैं । तथा ये ही वेद, यज्ञ तथा स्वर्ग स्वरूप हैं॥७३।। यह स्थावर जंगम युक्त सम्पूर्ण जगत् भगवान् विष्णु से व्याप्त है । वेद बतलाते हैं कि केवल भगवान् विष्णु ही विभिन्न रूप से प्रतीत होते हैं ॥७४॥ जिस तरह अनेक रूपों वाली वस्तुओं का सन्निध्य प्राप्त करके स्फटिक मणि विभिन्न रूपों वाली प्रतीत होती है, उसीतरह अनेक गुणों वाली माया के सन्निधान से श्रीभगवान् भी अनेक रूपों वाले प्रतीत होते हैं ।।७७५।। जिसतरह एक ही गार्हपत्याग्नि दक्षिणाग्नि इत्यादि अनेक रूपों को धारण करती है, उसी तरह श्रीभगवान् भी ब्रह्मा इत्यादि अनेक नामों को धारण करते हैं ॥७६॥ निश्चित रूप से भगवान् वामन देवताओं का

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