Srishti Khanda Extracted Page 390
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-390
Sanskrit Original
मरुद्भ्यो लोकपालेभ्यो विधिवद्विश्वकर्मणे । शान्तिसूक्त च रौद्रं च पावमानं च मंगलम् ॥३३॥ जपेच्च पौरुषं सूक्तं पूर्वतो बहवृचः पृथक् । शाक्रं रौद्रं च सौम्यं च कौष्मांडं जातवेदसम् ॥३४॥ सौरं सूक्तं जपेयुस्ते दक्षिणेन यजुर्विदः । वैराजं पौरुषं सूक्तं सौपर्ण रुद्रसंहितम् ॥३५॥ शैशवं पंच निधनं गायत्रं ज्येष्ठसाम च। वामदेव्यं बृहत्सामरौरवं च रथंतरम् ॥३६॥ गवां व्रतं विकीर्ण रक्षोघ्नं च यमं तथा । गायेयुः सामगा राजन् पाश्चिमद्वारमाश्रिताः॥३७॥ आथर्वणाश्चोतरतः शांतिकं पौष्टिकं तथा । जपेयुर्ममसा देवमाश्रिता वरुणं प्रभुम् ॥३८॥ पूर्ेद्युरभितो रात्रावेवं कृत्वाधिवासनम्। गजाश्वरथवल्मीक संगमाद्ब्रजगोकुलात् ॥३९॥ मृदमादाय कुंभेषु प्रक्षिपेदोषधीस्तथा । रोचनां च ससिद्धार्था गंधान् गुगुलुमेव च ॥४०॥ स्नपनं तस्य कर्त्तव्यं पंचगव्यसमन्वितम् । पूर्वं कर्तुर्महामंत्रैरेवं कृत्वा विधानतः ॥४९॥ अतिवाह्य क्षपामेवं विधियुक्तेन कर्मणा । ततः प्रभाते विमले संजाते तु शतं गवाम्॥४२॥ ब्राह्मणेभ्यः प्रदातव्यमष्टषष्ट्यथवा पुनः । पंचाशद्वाथ षट्त्रिंशत् पंचविंशति वा पुनः॥४३॥ ततश्चावसरप्राप्ते शुद्धे लग्ने सुशोभने । वेदशब्दैः सगंधर्वै वद्यैश्च विविधैः पुनः ॥४४॥ कनकालंकृतां कृत्वा जले गामवतारयेत् । सामगाय च सा देया ब्राह्मणाय विशांपते ॥४५॥ पात्रीमादाय सौवर्णी पंचरत्मसमन्विताम् । ततो निक्षिप्य मकरान्मत्स्यादींश्चैव सर्वशः ॥४६॥ धृतां चतुर्भिर्विप्रैश्च वेदवेदांगपारगैः । महानदीजलोपेतां दध्यक्षतविभूषिताम् ॥४७॥ उत्तराभिमुखां न्युब्जां जलमध्ये तु कारयेत्। आथर्वणेन सुस्नातां पुनर्मायां तथैव च ॥४८॥ आपोहिष्ठेति मंत्रेण क्षिप्त्वागत्य च मंडपम् । पूजयित्वा सदस्यान्वै बलिं दद्यात्समंततः ॥४९॥ आहुति देने के बाद इन्द्र, शिव, मरुद्रण, लोकपालों तथा विश्वकर्मा के लिए आहुति प्रदान करे । उस समय मङ्गलमय शान्तिसृक्त, रुद्रसूक्त, पवमानसूक्त ॥३३॥ तथा पुरुषसूक्त का पाठ ऋग्वेदी ब्राह्मण पूर्व दिशा में बैठकर करें। यजुर्वेदियों को दक्षिण दिशा में, शिवसूक्त, रुद्रसूक्त, सोमसूक्त, कूष्माण्ड सूक्त, अग्नि सूक्त ॥३४॥ और सूर्यसूक्त का पाठ करना चाहिए । हे राजन् ! पश्चिम द्वार पर विद्यमान सामवेदी ब्राह्मण वैराजसूक्त, पुरुषसूक्त, सुपर्णसूक्त, रुद्रसूक्त, शैशव सूक्त, पञ्चनिधन सूक्त, गायत्र ज्येष्ठ साम, वामदेव्य बृहत् साम रौरव रथन्तर, गोव्रत सूक्त, विकीर्ण सूक्त, रक्षोघ्न सूक्त तथा यमसूक्त का गायन करें ॥३५-३७॥। उत्तर द्वार पर विद्यमान ब्राह्मण मन से वरुण देव को आश्रय रूप से अपनाकर शान्ति एवं पौष्टिक मन्त्रों का जप करें ॥३८॥ पहले दिन इन सभी कार्यो को सम्पन्न करके रात्रि में अधिवास करें, हाथीशाला, अश्वशाला, वल्मीक, नदियों के संगम स्थल, तथा गोशाला की मिट्टी लाकर कलशों में डाले, फिर ओषधियों, रोचना, पीली सरसो, चन्दन तथा गुग्गुल डाले ॥३९-४०॥ इसके बाद यजमान पञ्चगव्यमिश्रित जल से स्नान (अभिषेक) आपो हिष्ठा मयोभुव: इत्यादि मन्त्रों से करे ॥४१॥ इस तरह विधिपूर्वक कर्मों के अनुष्ठान के द्वारा रात्रि को बिताकर उसके बाद सबेरा होने पर ब्राह्मणों को एक सौ अथवा अड़सठ या पचास या छत्तीस या पच्चीस गायों का दान दे ॥४२-४३॥ उसके पश्चात् शुद्ध लग्न के आ जाने पर, वेदपाठ, सङ्गीत, अनेक प्रकार के वाद्य के साथ गायों को सुवर्ण से अलंकृत करके एक गाय को जल में उतारे और उसको साम गायन करने वाले ब्राह्मण को दान कर दे । ॥४४-४५॥ उसके बाद पञ्चरत्न से युक्त पात्र को लेकर उसमें मकर तथा मत्स्य आदि को रखे ॥४६॥ उस पात्र को वेदों तथा वेदांगों में पारङ्गत चार ब्राह्मण पकड़े । उसमें महानदी के जल दधि तथा अक्षत डाले ॥४७॥ फिर उत्तर की ओर उसका मुख करके जल में डाल दे । उसके बाद आथर्वणिक मन्त्र से मायां पर्यन्त आपो हिष्ठा मयोभुवः इत्यादि मन्त्र से उस पर जल डालकर सबलोग यज्ञमण्डप
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