Srishti Khanda Extracted Page 384

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-384

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Sanskrit Original

अश्वत्थं च वटं चैवोदुंबरं वृक्षमेव च। नंदीशं जंबुवृक्षं च बिल्वं प्राहु महर्षय: ॥३४॥ मार्गशीर्षादिमासाभ्यां द्वाभ्यां द्वाभ्यामथ क्रमात् । एकैकं दंतधवनं वृक्षेष्वेतेषु कारयेत् ॥३५॥ दद्यात्समाप्ते दध्यन्नं वितानध्वजचामरम् । द्विजानामुदकुं भांश्च पंचरत्नसमन्वितान् ॥३६॥ न वित्तशाठ्यं कुर्वीत कुर्वन्दोषानवाप्रुयात् ॥३७॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टखंडे आदित्यशयनव्रतं नाम पंचविंशोध्यायः ॥२५॥ ie छब्बीसवाँ अध्याय भीष्म उवाच दीर्घायुरारोग्यकुलातिवृद्धिभि युक्तः पुमान् रूपकुलान्वितः स्यात् । मुहुर्मुहुर्जन्मनि येन सम्यक् व्रतं समाचक्ष्व च शीतरश्मेः ॥९॥ पुलस्त्य उवाच त्वया पृष्टमिदं सम्यगक्षयस्वर्गकारकम्। रहस्यं तु प्रवक्ष्यामि यत्पुराणविदो विदुः ॥२॥ रोहिणी चंद्रशयनं नाम व्रतमिहोच्यते। तस्मिन्नारायणस्यार्चामर्चयेदिदुनामभिः ॥३॥ यदा सोमदिने शुक्ला भवेत्पंचदशी क्वचित् । अथवा ब्रह्मनक्षत्रं पौर्णमास्यां प्रजायते॥४॥ तदा स्नानं नरः कुर्यात्पंचगव्येन सर्षपैः । आप्यायस्वेति च जपेद्विद्वानष्टशतं पुनः ॥५॥ को स्वर्ग में पहुँचा देता है ॥३३॥ महर्षियों ने अश्वत्थ, (पिप्पल) बड़, गूलर तथा विल्व इन सभी वृक्षों को शङ्कर स्वरूप बतलाया है ।॥।३४। मार्गशीर्ष (अगहन) तथा पौष इन दोनों मासों से क्रमश: प्रत्येक दो-दो मासों में उपुर्यक्त वृक्षों में से एक-एक वृक्ष की दतौन करे ॥३५॥ इस व्रत के समाप्त हो जाने पर दही, अन्न, चंदोवा, ध्वजा, चामर तथा पञ्चरत्न के साथ ब्राह्मणों को जल भरे घड़ों का दान करे ॥३६॥ इस व्रत को करने में वित्तशाठ्य न करे, जो इस ब्रत में वित्तशाठ्य करता है उसको पाप लगता है ॥३७॥ इस तरह पद्ममहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के आदित्यशयन ब्रत का वर्णन नामक पच्चीसवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।। २५।। re रोहिणी चन्द्रशयन व्रत का विधान भीष्मजी ने कहा-- जिस चन्द्रशयन व्रत का अनुष्ठान करके मनुष्य प्रत्येक जन्मों में दीर्घायु आरोग्य तथा वंश की समृद्धि को बार-बार प्राप्त करता है, उस त्रत की विधि का वर्णन आप करें ॥१॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- आपने बहुत अच्छा प्रश्न किया है । यह ब्रत अक्षय स्वर्ग को प्रदान करने वाला है । मैं इस रहस्यात्मक ब्रत को बतलाता हूँ, जिसको पुराणों के वेत्ता पुरुष ही जानते हैं ॥२॥ इसे रोहिणी चन्द्रशयन व्रत कहते हैं । इस व्रत में चन्द्रमा के नामों से भगवान् नारायण की अर्चा की जाती है ॥३॥ जब शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को सोमवार का दिन आये अथवा सोमवासरीय पूर्णिमा के दिन ब्रह्मनक्षत्र (रोहिणी) आये तो उस दिन मनुष्य को चाहिए कि वह पञ्चगव्य में सरसो मिलाकर उससे स्नान करे । उसके बाद अप्यायस्व इत्यादि मन्त्र का अष्टोत्तर शत जप करे ॥४-५॥

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