Srishti Khanda Extracted Page 383
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-383
Sanskrit Original
तस्यां विधाय तत्पद्ममलंकृत्य गुणान्विताम् । कपिलां वस््संयुक्तामतिशीलां पयस्विनीम्॥२४॥ रौप्यखुरां हैमश्ृंगी सवत्सां कांस्यदोहनाम्। दद्यान्मंत्रेण तां धेनुं पूर्वाह्न नातिलंघयेत्॥२५॥ यथैवादित्यशयनमशून्यं तव सर्वदा । कांत्या धृत्या श्रिया पुष्ट्या तथा मे संतु वृद्धयः॥२६॥ यथा न देवाः श्रेयांसं त्वदन्यमनघं विदुः । तथा मामुद्धराशेषदुः खसंसारसागरात् ॥ २७॥ ततः प्रदक्षिणी कृत्य प्रणम्य च विसर्जयेत्। शय्यां गवादितत्सर्वं द्विजस्य भवनं नयेत् ॥२८॥ नैतद्विशीलाय न दांभिकाय प्रकाशनीयं व्रतमिंदुमौलैः । गोविप्रदेवर्षिविकर्मयोगिनां यश्चापि निन्दामधिकां विधत्ते ॥२९॥ भक्ताय दांताय च गुह्यामेत दाख्येयमानंदकरं शिवञ्च । इदं महापातकिनां नराणां अधघक्षयं वेदविदोवदंति ॥३०॥ न बंधुपुत्रै र्नधनै वियुक्तः पत्नीभिरानंदकरः सुराणाम् । नाभ्येतिरोगं न च दुःखमोहं या चापि नारी कुरुतेऽ थ भक्त्या ॥३९॥ इदं वासिष्ठेन पुरार्जुनेन कृतं कुबेरेण पुरंदरेण। यत्कीर्तनादप्यखिलानि नाश मायांति पापानि न संशयोऽत्र ॥३२॥ इति पठति शृणोति वा य इत्थं रविशयनं पुरुहूतवल्लभः स्यात् । अपि नरकगतान् पितृनशेषा नपि दिवमानयतीह यः करोति ॥३३॥ छाता, चामर, आसन, दर्पण, आभूषण, फल चन्दन तथा वस्र भी होना चाहिए ॥२२-२३॥ उस शय्या पर ही उस सुवर्ण कमल को रखकर दान करे । एक सीधी, वस्त्र से अलङ्कृत जिसके सींग सुवर्ण से और खुर चाँदी से मढा हो ऐसी गौ होनी चाहिए । उसके साथ में बछड़ा तथा कांसे का दुग्ध पात्र होना चाहिए । गोदान पूर्वाहण में ही करे। समय का अतिक्रमण नहीं होना चाहिए ॥|२४-२५॥ इसके बाद हाथ जोड़कर प्रार्थना करे-- हे आदित्य ! जिस प्रकार आपकी शय्या कभी भी कान्ति, धृति श्री तथा पुष्टि से खाली नहीं रहती है, उसीतरह मेरी भी वृद्धि निरन्तर होती रहे ॥२६॥ जिस प्रकार देवगण आपसे भिन्न किसी दूसरे को निर्दोष कल्याणकारी नहीं मानते हैं, उसीतरह आप मेरा इस दुःखों के सागर रूपी संसार से उद्धार कीजिये ॥२७॥ उसके बाद ब्राह्मण की प्रक्षिणा करके तथा उन्हे प्रणाम करके विदा करे और शय्या, गौ इत्यादि सारी सामग्री को ब्राह्मण के घर पहुँचवा दे ॥२८॥ भगवान् शङ्कर के इस ब्रत को किसी शीलहीन तथा दम्भी व्यक्ति को नहीं बतलाना चाहिये । किञ्च जो गौ, विप्र, देवता, ऋषि, विशेष, कर्म तथा योगिजन की निन्दा करता हो उसको भी इसे नहीं बतलाना चाहिए ॥२९॥ जो गो भक्त तथा जितेन्द्रिय हो उसको उस आनन्दप्रद और कल्याणकारी व्रत को बतलाना चाहिये । यह बड़े से बड़े पापियों के भी पाप को विनष्ट करने वाला व्रत है, इसतरह से वेदज्ञ पुरुष बतलाते हैं ॥३०॥ इस व्रत को करने वाला व्यक्ति बान्धव, पुत्र तथा धन से सम्पन्न होता है । शरीर त्याग के पश्चात् वह अप्सराओं के साथ विहार करता है । वह कभी रोग, दुःख तथा मोह से ग्रस्त नहीं होता है यदि कोई स्त्री भी भक्ति पूर्वक इस व्रत को करती है तो वह भी इन फलों को प्राप्त करती हे वह भी इन समस्त फलों को प्राप्त करती ॥३१॥ प्राचीन काल में इस व्रत को वसिष्ठ, अर्जुन, कुबेर तथा इन्द्र ने किया था । इस व्रत का कीर्तन करने मात्र से भी सभी पापों का विनाश हो जाता है, इसमें किसी भी प्रकार का सन्देह नहीं है ॥३२॥ जो व्यक्ति इस ब्रत के प्रसङ्ग को पढता है अथवा सुनता है; वह शरीर त्याग के पश्चात् इन्द्र का प्रिय हो जाता है ।अर्थात् स्वर्ग लोक में जाता है जो इस ब्रत को करता है वह अपने नरक में गये हुए समस्त पितरों
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