Srishti Khanda Extracted Page 367

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-367

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Sanskrit Original

नमो देव्यै नमः शांत्यै नमो लक्ष्म्यै नमः श्रियै । नमस्तुष्ट्यै नमः पुष्ट्यै धृत्यै व्युष्ट्यै नमो नमः ॥२७॥ नमो विहंगनाथाय वायुवेगाय पक्षिणे । विषप्रमथनायेति गरुडं चाभिपूजयेत् ॥२८॥ एवं संपूज्य गोविंदमुमापतिविनायकौ । गंधैर्माल्यैस्तथा धूपै भक्ष्यै र्नानाविधैरपि॥२९॥ गव्येन पयसा सिक्तां कृसरामथ पायसम्। सर्पिषा सह भुक्त्वा तु गत्वा स्थानांतरं पुनः॥३०॥ नैयग्रोधं दंतकाष्ठमथवा खादिरं बुधः । गृहीत्वा धावयेहंतानाचांतः प्रागुदङ्मुखः ॥३ १॥ ब्रूयात्सायंतनीं कृत्वा संध्यामस्तमिते रवौ । नमोनारायणायेति त्वामहं शरणं गतः॥३२॥ एकादश्यां निराहारः समभ्यर्च्य च केशवम् । तां रात्रिं सकलां स्थित्वा शेषपर्यकशायिनम् ॥३३॥ सर्पिषा विश्वदहनं हुत्वा ब्राह्मणपुंगवैः । सहैव पुंडरीकाक्षं द्वादश्यां क्षीरभोजनम् ॥३४॥ करिष्यामि यथात्मानं निर्विध्नेनास्तु तच्च मे। एवमुक्त्वा स्वपेद्धूमावितिहासकथां पुनः ॥३५॥ श्रुत्वा प्रभाते संजाते नदीं गत्वा विशांपते । स्नानं कृत्वा मुदा तद्दत्पाषण्डानभिवर्जयेत् ॥३६॥ उपास्य सन्ध्यां विधिवत्कृत्वा च पितृतर्पणम् । प्रणम्य च हृषीकेशं शेषपर्यङ्कशायिनम् ॥३७॥ गृहस्य पुरतो भक्त्या मण्डपं करायेद्बुधः । चतुर्हस्तां शुभां कुयद्विदीमरिनिषूदन ॥३८॥ चतुर्हस्तप्रमाणं तु विन्यसेत्तत्र तोरणम् । मध्ये च कलशं तत्र माषमात्रेण संयुतम् ॥३९॥ छिद्रेण जलसंपूर्णमधः कृष्णाजिने स्थितः । तस्य धारां च शिरसा धारयेत्सकलां निशाम्॥४०॥ घाराभिर्भूरिभिर्भूरि फलं वेदविदो विदुः । यस्मात्तस्मात्कुरुश्रेष्ठ कारयेत्प्रयतो द्विजः ॥४१॥ करके आवाहन के क्रम से पूजन करे दामोदराय नमः इस मन्त्र से श्रीभगवान् के उदर की पूजा करे । पञ्चजनाभाय नमः इस मन्त्र से कटि की पूजा करे ॥२५॥ सौभाग्यनाथाय नमः इस मन्त्र से दोनों ऊरूओं की पूजा करे, भूतधारिणे नमः इस मन्त्र से दोनों घुटनों की पूजा करे । नीलाय नमः इस मन्त्र से दोनों जंघों की पूजा करे, विश्वभुजे नमः इस मन्त्र से दोनों पैरों की पूजा करे ॥२६॥ इसके बाद हाथ जोड़कर प्रार्थना करे देव्यै नमः, शान्त्यै नमः, मोक्षलक्ष्म्यै नमः, श्रियै नमः, तुष्ट्यै नमः, पुष्टयै नमः, व्युष्ट्यै नमः ।।२७॥।। विहङ्गनाथय नमः, वायुवेगाय नमः, पक्षिणे नमः विषप्रमथनाय नमः इन चार मन्त्रों से गरुड की पूजा करे ।।२८।। इस तरह श्रीगोविन्द भगवान् की पूजा करे, शङ्करजी तथा गणेशजी की चन्दन, माला, धूप तथा अनेक प्रकार के भक्ष्य पदार्थो से पूजा करे ॥२९॥ इसके बाद गौ के दूध मे निर्मित खीरान्न का दूसरी जगह जाकर भोजन करे ॥३०॥ उसके बाद बड़ अथवा खैर की दतौन से दाँतों को साफ करे और पूर्वाभिमुख होकर आचमन करे ।।३१॥ सूर्यास्त के समय सायंकाल सन्ध्या करे और कहे, हे नारायण ! आपको नमस्कार है, में आपके शरणागत हुँ ॥३२॥ इसके बाद सङ्कल्प करे कि एकादशी को निराहार रहकर तथा भगवान् केशव की पूजा करके, उस दिन पूरी रात्रि निराहार रहकर, शेषपर्यकशायी श्रीभगवान् की प्रसन्नता के लिए श्रेष्ठ ब्राह्मणों से अग्नि में तथा पुण्डरीकाक्ष भगवान् के भी निमित होम कराकर ब्राह्मणों के साथ क्षीरान्न का भोजन करूंगा । यह आपकी कृपा से निर्विघ्नता पूर्वक सम्पन्न हो जाय। इस तरह से श्रीभगवान् से निवेदन करके पृथिवी पर शयन करे, फिर इतिहास की कथा का श्रवण करके।।३३-३५॥ प्रातःकाल होने पर नदी में जाकर स्नान करे । उस दिन पाषण्डियों से दूर रहे, उन से बात न करे ॥३६॥ फिर सविधि, सन्ध्या तथा तर्पण करके शेषपर्यकशायी भगवान् हृषीकेश को प्रणाम करके ॥३७॥ गृहस्थ को चाहिए कि वह अपने घर के सामने मण्डप का निर्माण करे । हे अरिनिषूदन ! चार हाथ की वेदी बनाये ।।३८।। उस पर चार हाथ का तोरण लगाये । उसके बीच में कलश की स्थापना करके उसमें उतना ही बड़ा छिद्र करे जिसमें उड़द घूस

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